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ए गाँव के लफंगे-लतख़ोर…

सुमन सिंह

स्तम्भ: “हरे ये पिंटुआ! हमनियों के देबे पेप्सिया की कुल ओहि लड़िकवन में बाँट देबे…आँय।” होठों को अजब अंदाज़ में तानते हुए और भारी-भरकम शरीर को झुमाते हुए एक स्त्री कंठ ने पिंटुआ को पिछुआया।

“आ रहे हैं ताई जी..आ रहे हैं उधरो आ रहे हैं। हाथ में पेप्सी की दो लीटर वाली बोतल थामे भीड़ में राह बनाते पिंटुआ अपने साथी के साथ ताई जी के पास पहुँचता है और बहुत ही मुस्तैदी से गिलास भर-भर के पेप्सी महिलाओं में बाँटने लगता है।

“का हो पिंटू एह साल भी तोहार बियाह हो जाइ कि ना?।” शहर से आई भौजी ने चुहल की। पिंटू की आँखे रूहआफजा हो आईं।

“अरे कहाँ ए भाभी अबहिं त दुइ गो बहीन और एक ठो भाई कुंआरे हैं…इनकर बारी त बाद में न आई।” एक गाँव की चाची जी मज़ाक करती हैं। पिंटुआ मुस्कराता हुआ आगे बढ़ जाता है।

“सुनले रहलिन कि एकर बहिनिया पढ़े गइल रहे अउर उंहवें से भाग गइल।” शहर वाली भाभी अब गाँव का हाल-चाल जानने को उत्सुक हो रही हैं। गाँव से उनका रिश्ता-नाता शादी-ब्याह और साल भर का राशन समेटने तक रह गया है।

पिंटुआ की तरह गाँव में अब वही लड़के बचे रह गए हैं जो शहर जाकर एम.ए, बी.ए कर आये और अब बेकारी में सरकार की शैक्षिक नीतियों को गरियाते नहर किनारे या तालाब के एकांत में बैठ कर सस्ते और देर तक टिके रहने वाले नशे की किस्मों पर शोध करते हैं।

शादी-ब्याह वाले घरों में इन लड़कों का इस्तेमाल मुफ़्त की बैरागिरी के लिए किया जाता है। अपनी बहू-बेटियों को इनकी नज़रों से मीलों दूर रखने वाले सगे-संबंधी ऐसे अवसरों पर अत्यंत उदार हो जाते हैं। सब्ज़ी, मसाला, दूध-पनीर, राशन, पत्तल-पुरवा तक बाजार से लाने। हलवाई, टेंट वाले, बैंड-बाज़ा वाले सबका इंतज़ाम इनके जिम्मे छोड़ दिया जाता है। कुछ दिनों तक ये बाबू-भैया, बचवा बने रहते हैं। घरातियों-बरातियों को दौड़-दौड़ कर खिलाना-पिलाना। आदर-सत्कार सब इनके जिम्मे। जिस दिन आयोजन स्थल से टेंट उखड़ा उस दिन इनसे मुँह फेर लिया जाता है।

उस दिन से एक बार फिर से ये लफंगे और लतख़ोर हो जाते हैं। बहू-बेटियों को इनकी कुदृष्टि लगने लगती और कहा जाने लगता कि सारे नसेड़ी और लोफ़र लड़के अब गाँवों में बचे रह गए हैं। तीस-पैंतीस साल के हो जाने पर भी तिलकहरू दुआर नहीं झांक रहे। कौन इन बेकारों को अपनी बेटियाँ देगा? गलत सोहबत में पड़कर ये चोरी-चकारी कर रहे हैं और राह चलती लड़कियों को छेड़ रहे हैं। यह सब इनको कहा जाता है पर आड़ लेकर, सामने ये बाबू-बचवा ही बने रहते हैं। समृद्ध घरों के बूढ़ों को इनकी हमेशा जरूरत रहती है क्योंकि उनके क़ाबिल बच्चे शहरों में जा बसे हैं और बहुत बुलाने पर भी नहीं आ पाते।

( लेखिका हिंदी एंव भोजपुरी साहित्य में नवीन प्रतिमान स्थापित कर रही हैं।)

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