
युवा ऊर्जा, साहित्य और संस्कृति का अद्भुत महाकुंभ
काशी की सांस्कृतिक धारा में साहित्य और शिक्षा का नवजागरण
काशी की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक परंपरा के बीच आयोजित बनारस लिटरेचर फेस्टिवल ने इस बार साहित्य, शिक्षा और युवा चेतना का ऐसा संगम प्रस्तुत किया, जिसने शहर को राष्ट्रीय बौद्धिक संवाद के केंद्र के रूप में नई पहचान दिलाई। इस आयोजन की सफलता में सनबीम ग्रुप ऑफ एजुकेशनल इंस्टीट्यूशंस की सक्रिय भागीदारी और इसके चेयरमैन डॉ. दीपक मधोक की दूरदर्शी सोच महत्वपूर्ण रही। वरिष्ठ पत्रकार सुरेश गांधी से विशेष बातचीत में डॉ. मधोक ने स्पष्ट किया कि शिक्षा केवल पाठ्यक्रम तक सीमित न रहकर संस्कृति, संवेदना और व्यक्तित्व विकास से जुड़नी चाहिए। उन्होंने बताया कि फेस्टिवल में विद्यार्थियों और स्वयंसेवकों की व्यापक भागीदारी ने युवाओं में नेतृत्व क्षमता और सामाजिक जिम्मेदारी की भावना को मजबूत किया। कार्यक्रम में बॉलीवुड अभिनेता अनुपम खेर, सांसद एवं भोजपुरी गायक मनोज तिवारी, तथा पद्मश्री मालिनी अवस्थी जैसी विभूतियों की उपस्थिति ने आयोजन को सांस्कृतिक और वैचारिक रूप से समृद्ध बनाया। डॉ. मधोक ने प्रशासनिक सेवा से शिक्षा क्षेत्र में आने के अपने निर्णय को समाज में स्थायी परिवर्तन की दिशा बताया। उन्होंने भविष्य की शिक्षा को तकनीक, नवाचार और सांस्कृतिक मूल्यों के संतुलन पर आधारित बताया। यह साक्षात्कार शिक्षा, साहित्य और युवा शक्ति के माध्यम से समाज निर्माण की संभावनाओं को रेखांकित करता है। प्रस्तुत है बातचीत के कुछ प्रमुख अंश।
–सुरेश गांधी
गंगा की पावन धारा, घाटों की आध्यात्मिक आभा और शताब्दियों पुरानी विद्वता की परंपरा से समृद्ध काशी केवल धार्मिक नगरी ही नहीं, बल्कि ज्ञान और विचारों की वैश्विक राजधानी भी रही है। इसी सांस्कृतिक विरासत को आधुनिक परिप्रेक्ष्य में साकार करते हुए आयोजित बनारस लिटरेचर फेस्टिवल ने इस बार साहित्य, संस्कृति और शिक्षा के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक अध्याय रचा। इस आयोजन की सफलता में जहां देश-विदेश के साहित्यकारों, कलाकारों और विद्वानों की भागीदारी रही, वहीं सनबीम ग्रुप ऑफ एजुकेशनल इंस्टीट्यूशंस की सक्रिय सहभागिता और इसके चेयरमैन डॉ. दीपक मधोक की दूरदर्शी सोच ने इसे नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बनारस लिटरेचर फेस्टिवल की सफलता, युवा पीढ़ी की भागीदारी, शिक्षा के बदलते स्वरूप और सांस्कृतिक मूल्यों के संरक्षण जैसे मुद्दों पर प्रस्तुत है डॉ. दीपक मधोक से वरिष्ठ पत्रकार सुरेश गांधी की विस्तृत बातचीत के कुछ अंश :-
सुरेश गांधी : काशी की सांस्कृतिक पहचान सदियों पुरानी है। ऐसे में बनारस लिटरेचर फेस्टिवल को आप किस दृष्टि से देखते हैं?
डॉ. दीपक मधोक : काशी केवल एक शहर नहीं, बल्कि भारतीय ज्ञान परंपरा का जीवंत प्रतीक है। यहां सदियों से दर्शन, साहित्य और आध्यात्मिक चिंतन का प्रवाह रहा है। बनारस लिटरेचर फेस्टिवल इसी विरासत का आधुनिक स्वरूप है। यह आयोजन साहित्य को केवल पुस्तक या मंच तक सीमित नहीं रखता, बल्कि इसे समाज, संस्कृति और शिक्षा से जोड़ता है। इस फेस्टिवल ने यह सिद्ध किया कि काशी आज भी वैश्विक बौद्धिक संवाद का केंद्र बनने की क्षमता रखती है।
सुरेश गांधी : इस आयोजन की सफलता को आप किन प्रमुख कारणों से जोड़ते हैं?
डॉ. मधोक : इसकी सफलता का सबसे बड़ा कारण इसकी व्यापकता और विविधता रही। इसमें साहित्य, संस्कृति, शिक्षा, कला और समाज के विभिन्न पहलुओं पर संवाद हुआ। देश-विदेश के प्रतिष्ठित साहित्यकारों, कलाकारों और शिक्षाविदों की सहभागिता ने इसे वैश्विक पहचान दी। इसके साथ ही युवाओं की बड़ी भागीदारी ने इस आयोजन को जीवंत और ऊर्जा से भरपूर बना दिया।
सुरेश गांधी : सनबीम ग्रुप की भागीदारी इस आयोजन में काफी प्रभावशाली रही। इसकी प्रेरणा क्या रही?
डॉ. मधोक : सनबीम का उद्देश्य हमेशा शिक्षा को समग्र बनाना रहा है। हमारा मानना है कि शिक्षा केवल परीक्षा और पाठ्यक्रम तक सीमित नहीं होनी चाहिए। जब हमें इस फेस्टिवल से जुड़ने का अवसर मिला तो हमने इसे विद्यार्थियों के व्यक्तित्व विकास और सांस्कृतिक जागरूकता के मंच के रूप में देखा। हमने यह सुनिश्चित किया कि विद्यार्थी केवल दर्शक न रहें, बल्कि सक्रिय भागीदारी करें।
सुरेश गांधी : लगभग 270 विद्यार्थियों की सहभागिता को कैसे देखते हैं?
डॉ. मधोक : यह हमारे लिए गर्व का विषय है। विद्यार्थियों ने विभिन्न साहित्यिक और वैचारिक सत्रों में भाग लेकर अपनी अभिव्यक्ति क्षमता का शानदार प्रदर्शन किया। जब युवा पीढ़ी साहित्य और विचारों से जुड़ती है तो समाज में सकारात्मक परिवर्तन की संभावनाएं बढ़ जाती हैं। इस अनुभव ने विद्यार्थियों के आत्मविश्वास और नेतृत्व क्षमता को मजबूत किया।
सुरेश गांधी : इस आयोजन में 175 छात्र स्वयंसेवकों ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसे आप शिक्षा के संदर्भ में कैसे देखते हैं?
डॉ. मधोक : स्वयंसेवा शिक्षा का सबसे प्रभावशाली माध्यम है। जब विद्यार्थी किसी बड़े आयोजन की जिम्मेदारी निभाते हैं तो वे नेतृत्व, अनुशासन और सामूहिक कार्य की भावना सीखते हैं। यह अनुभव उन्हें जीवन की वास्तविक चुनौतियों के लिए तैयार करता है। सनबीम के विद्यार्थियों ने जिस समर्पण और दक्षता के साथ अपनी जिम्मेदारियां निभाईं, वह अत्यंत सराहनीय है।
सुरेश गांधी : इस फेस्टिवल में अनुपम खेर, सांसद मनोज तिवारी और पद्मश्री मालिनी अवस्थी जैसी हस्तियों की उपस्थिति को आप किस रूप में देखते हैं?
डॉ. मधोक : इन विभूतियों की उपस्थिति इस आयोजन की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक रही। अनुपम खेर ने अपने संघर्ष और अनुभवों के माध्यम से युवाओं को प्रेरित किया। उन्होंने बताया कि सफलता का आधार आत्मविश्वास और निरंतर प्रयास है। मनोज तिवारी ने भोजपुरी भाषा और लोकसंस्कृति के महत्व पर अपने विचार रखे। उन्होंने यह संदेश दिया कि भारतीय भाषाएं और लोक परंपराएं हमारी सांस्कृतिक पहचान का मूल आधार हैं। मालिनी अवस्थी ने भारतीय लोकसंगीत और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण की आवश्यकता पर जोर दिया। उनकी प्रस्तुति ने विद्यार्थियों को अपनी जड़ों से जुड़ने की प्रेरणा दी। इन सभी हस्तियों की उपस्थिति ने इस आयोजन को सांस्कृतिक और वैचारिक रूप से समृद्ध बनाया।
सुरेश गांधी : अस्सी घाट से इस फेस्टिवल की शुरुआत हुई। उस अनुभव को आप कैसे देखते हैं?
डॉ. मधोक : अस्सी घाट काशी की आत्मा है। वहां उद्घाटन समारोह का आयोजन अत्यंत आध्यात्मिक और प्रेरणादायी अनुभव था। गंगा के तट पर साहित्य और संस्कृति का संगम भारतीय सभ्यता की उस परंपरा को दर्शाता है, जहां ज्ञान और आध्यात्मिकता एक-दूसरे के पूरक रहे हैं।
सुरेश गांधी : सनबीम द्वारा संचालित लाइव पॉडकास्ट स्टूडियो भी चर्चा में रहे। इस पहल का महत्व क्या है?
डॉ. मधोक : आज का समय डिजिटल संवाद का है। हमने महसूस किया कि विद्यार्थियों को आधुनिक मीडिया तकनीकों से जोड़ना आवश्यक है। पॉडकास्ट स्टूडियो के माध्यम से विद्यार्थियों ने संवाद, प्रस्तुति और तकनीकी संचालन का व्यावहारिक अनुभव प्राप्त किया। यह पहल उन्हें भविष्य के लिए तैयार करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
सुरेश गांधी : आपने प्रशासनिक सेवा छोड़कर शिक्षा क्षेत्र को चुना। इस निर्णय के पीछे क्या सोच रही?
डॉ. मधोक : प्रशासनिक सेवा में कार्य करते हुए मैंने महसूस किया कि समाज में स्थायी परिवर्तन शिक्षा के माध्यम से ही संभव है। प्रशासन व्यवस्था सुधार सकता है, लेकिन शिक्षा समाज की सोच को बदल सकती है। इसी सोच के साथ मैंने शिक्षा क्षेत्र में आने का निर्णय लिया।
सुरेश गांधी : आज सनबीम ग्रुप शिक्षा के क्षेत्र में मजबूत नेटवर्क बन चुका है। इस यात्रा को आप कैसे देखते हैं?
डॉ. मधोक : यह यात्रा संघर्ष और सीख से भरी रही है। हमने हमेशा शिक्षा को नवाचार और मूल्यों के साथ जोड़ने का प्रयास किया है। हमारा लक्ष्य ऐसे संस्थान विकसित करना है जहां विद्यार्थी ज्ञान के साथ संस्कार और नेतृत्व क्षमता भी विकसित कर सकें।
सुरेश गांधी : आपको कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मान मिले हैं। इन सम्मानों को आप किस रूप में देखते हैं?
डॉ. मधोक : ये सम्मान मेरे लिए व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं हैं। यह पूरी टीम और विद्यार्थियों के प्रयासों की पहचान हैं। ये हमें बेहतर कार्य करने की प्रेरणा देते हैं।
सुरेश गांधी : वर्तमान समय में शिक्षा तेजी से बदल रही है। भविष्य की शिक्षा को आप किस दिशा में जाते हुए देखते हैं?
डॉ. मधोक : भविष्य की शिक्षा बहुआयामी होगी। इसमें तकनीक, अनुभवात्मक अधिगम और वैश्विक दृष्टिकोण का विशेष महत्व होगा। विद्यार्थियों को केवल ज्ञान ही नहीं, बल्कि सामाजिक समझ और संवाद कौशल भी विकसित करना होगा।
सुरेश गांधी : युवा पीढ़ी के लिए आपका क्या संदेश है?
डॉ. मधोक : युवाओं को सीखने की जिज्ञासा बनाए रखनी चाहिए। साहित्य पढ़ें, संस्कृति से जुड़ें और समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाएं। यदि युवा ज्ञान और संवेदनशीलता को अपनाते हैं तो वे देश और समाज को नई दिशा दे सकते हैं।
सुरेश गांधी : आप बनारस लिटरेचर फेस्टिवल को किस रूप में याद करेंगे?
डॉ. मधोक : यह आयोजन मेरे लिए एक सांस्कृतिक और शैक्षिक आंदोलन के रूप में याद रहेगा। इसने यह सिद्ध किया कि जब साहित्य, शिक्षा और युवा शक्ति एक साथ आते हैं तो समाज में सकारात्मक परिवर्तन संभव होता है।
शिक्षा, संस्कृति और युवा शक्ति का नया युग
बनारस लिटरेचर फेस्टिवल केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि विचारों और संस्कृति का ऐसा संगम बनकर सामने आया, जिसने शिक्षा के नए आयाम प्रस्तुत किए। डॉ. दीपक मधोक के नेतृत्व में सनबीम संस्थानों की सहभागिता इस बात का प्रमाण है कि जब शिक्षा को संस्कृति और अनुभव से जोड़ा जाता है, तब वह समाज में सकारात्मक परिवर्तन का माध्यम बनती है। काशी की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक धारा में प्रवाहित यह साहित्यिक महोत्सव आने वाले समय में शिक्षा और साहित्य के क्षेत्र में नई संभावनाओं का मार्ग प्रशस्त करता दिखाई देता है।




