आया राम गया राम एक बार फिर से

ज्ञानेन्द्र शर्मा

प्रसंगवश

चुनाव में प्रदेश की जनता ने कांग्रेस को सरकार बनाने के लिए वोट दिया। चुनाव के जो परिणाम आए उनमें जनमत स्पष्टतया कांग्रेस के पक्ष में था इसलिए कांग्रेस सेे भिन्न किसी दल को सरकार बनाने का अधिकार नहीं मिल सकता।

सन् 1967 में मध्य प्रदेश में हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने जीत दर्ज की और चाणक्य कहे जाने वाले द्वारका प्रसाद मिश्रा के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार बनी लेकिन कुछ ही महीने बीते थे कि उनके खिलाफ कांग्रेस में विद्रोह हो गया और एक पूर्व आईसीएस अधिकारी व स्वतंत्रता संग्राम सेनानी गोविंद नारायन सिंह के नेतृत्व में 36 कांग्रेसी विधायकों ने अलग गुट बना लिया। कांग्रेस सरकार अल्पमत में आ गई। तब द्वारका प्रसाद मिश्रा ने एक अभिनव चाल चली।

उन्होंने कहा कि अभी अभी हुए चुनाव में प्रदेश की जनता ने कांग्रेस को सरकार बनाने के लिए वोट दिया। चुनाव के जो परिणाम आए उनमें जनमत स्पष्टतया कांग्रेस के पक्ष में था इसलिए कांग्रेस सेे भिन्न किसी दल को सरकार बनाने का अधिकार नहीं मिल सकता। इससे भिन्न दल या दलों के समूह की सरकार यदि बनती है तो वह पूरी तरह से ‘जनमत-भिन्न’ सरकार होगी और उसे लोकप्रिय सरकार नहीं माना जा सकता। यह मत व्यक्त करके उन्होंने कांग्रेस के बाकी विधायकों और जनसंघ के विधायकों से मिलकर संयुक्त विधायक दल की सरकार के बनाए जाने के प्रयासों के सामने रोड़ा अटकाने की कोशिश की हालाॅकि बात बनी नहीं।

द्वारका प्रसाद मिश्रा ने माॅग की कि चूॅकि जनता द्वारा चुनी गई सरकार शासन चलाने में असमर्थ हो रही है अत: नए सिरे से चुनाव कराए जाएं और जनता की राय जानने के लिए चुनाव के जरिए जनमत जाना जाये। उनके मंत्रिमण्डल ने इस आशय का एक प्रस्ताव केन्द्र को भेज दिया लेकिन वहाॅ बैठे केन्द्रीय गृहमंत्री यशवंत राव चव्हाण ने उसे अस्वीकार कर दिया।

दिल्ली में इंदिरा गाॅधी की सरकार थी लेकिन श्री चव्हाण इंदिरा-विरोधी खेमे- सिंडीकेट के प्रमुख सदस्य थे। श्री मिश्रा इन्दिरा गाॅधी के खास सलाहकार माने जाते थे और सिंडीकेट विरोधी खेमे में थे अतः चव्हाण ने वह पेंतरा चला जो द्वारका प्रसाद मिश्रा के खिलाफ पड़ा और मध्य प्रदेश में संविद सरकार बन गई।

आज भी यह बात मानी जाती है कि यदि द्वारका प्रसाद मिश्रा का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया गया होता और जनता द्वारा चुनी गई सरकार गिर जाने पर मध्यावधि चुनाव करा दिया गया होता तो दल बदल का जो नंगा नाच तब से अभी तक लगातार चला रहा है, वहीं रुक जाता। मध्यावधि चुनाव का यदि डर होता तो दल बदल का सिलसिला शुरू ही नहीं हुआ होता।

मध्यावधि चुनाव की तलवार सामने लटका दी गई होती तो पाला बदलकर सरकारें गिराने और वैकल्पिक सरकार बनाने का का विकल्प वहीं बंद हो जाता और किसी दल-बदल कानून की भी जरूरत न पड़ती।

मध्यप्रदेश के नाटकीय खेल के बाद हरियाणा का नम्बर भी तुरंत आ गया। 10 मार्च 1967 को चुनाव में भगवत दयाल शर्मा की कांग्रेस सरकार बनी तो लेकिन 12 विधायकों के विद्रोह और दलबदल के चलते सरकार अल्पमत में आ गई और उसका पतन हो गया।

दल बदल करने वाले विधायकों ने यूनाइटिड फ्रंट बना लिया और इसके साथ ही 81 सदस्यों की विधानसभा में संयुक्त विधायक दल के विधायकों की संख्या 48 हो गई और 24 मार्च 67 को राव वीरेन्द्र सिंह के नेतत्व में सरकार बन गई। हसनपुर क्षेत्र से चुने गए विधायक गया लाल ने एक दिन में 9 घंटे में तीन बार दल बदल और वहाॅ से ‘आयाराम गया राम’ का सिलसिला शुरू हो गया। राव सरकार भी ज्यादा दिन नहीं चली और 1968 में वहाॅ फिर से चुनाव की नौबत आ गई।

कुछ साल बाद 1979 में विधानसभा चुनाव में हरियाणा में जनता पार्टी को बहुमत मिला और भजन लाल मुख्यमंत्री बने। लेकिन जब 1980 में केन्द्र में इंदिरा गाॅधी की सरकार फिर वापस आ गई तो हरियाणा में कमाल ही हो गया। भजन लाल अपने सारे विधायकों को लेकर कांग्रेस में शामिल हो गए और पूरे देश में कांग्रेस शासन का नया दौर शुरू हो गया। तब भजन लाल को ‘आया राम गया राम’ का पुरोधा मान लिया गया था।

बहुत कोशिशें हुईं लेकिन दल बदल का दौर खत्म नहीं हुआ। 1984 में राजीव गाॅधी के नेतृत्व में कांग्रेस को लोकसभा चुनाव में 400 सीटें मिल गईं और उसके बाद उन्होंने दल-बदल रोकने के लिए 1985 में 52-वाॅ संविधान संशोधन पारित कराया लेकिन उसकी तोड़ लोगों के निकाल ली और राज्यपालों और स्पीकरों के माध्यम से उसमें पलीता लग गया। केन्द्र की सरकार के इशारे पर कई राज्यों में दल-बदल के खेल हुए और कई सरकारें पलट गईं। जिन्हें चुनाव के जरिए जनमत नहीं मिला था, वे सत्ता में आ गए और दल-बदलुओं को ससम्मान मंत्री-पद से सुशोभित किया जाने लगा। कर्नाटक और मध्यप्रदेश सबसे ताजे उदाहरण हैं।

मध्य प्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंह ने कांग्रेस से बगावत कर दी, खुद राज्यसभा की सीट हथिया ली और अपने समर्थक 22 विधायकों को लेकर भाजपा में शामिल हो गए। फिर जब शिवराज सिंह के नेतृत्व में भाजपा की सरकार वापस लौटी तो सिंधिया समर्थक 22 में से 18 विधायकों को मंत्री बना दिया गया। उन्होंने ‘मलाईदार’ विभाग भी हथिया लिए।

ये दल-बदल का खेल था कि दलबदलुओं ने जो मांगा, उन्हें मिल गया। बताया जाता है कि सिंधिया अपने समर्थकों को मलाईदार विभाग दिलाने पर अड़ गए थे और मुख्यमंत्री को, जो संविधानिक तौर पर सरकार का मुखिया होता है, अपनी मर्जी को किनारे करके उनकी बात माननी पड़ी। इस तरह एक मुख्यमंत्री की सरकार में वे मंत्री शामिल थे और उनके पास वे विभाग थे, जो मुख्यमंत्री ने उन्हें अपनी मर्जी से नहीं दिए थे।

बाद में एक और सजातीय कांग्रेसी विधायक को उमा भारती अपने साथ भाजपा में ले आईं और उसका भी ये जलवा था कि भाजपा में आने के कुछ ही घंटे बाद उसे मंत्री का दर्जा दे दिया गया। यह था भाजपा का दल-बदल से प्रेम का ताजा सोपान।

राजस्थान में अभी यह खेल चल रहा है हालाॅकि भाजपा यहाॅ दूसरे कई राज्यों जैसी आशातीत सफलता नहीं पा सकी है क्योंकि उसके नेता किसी गैर-भाजपाई को मुख्यमत्री पद देने के पक्ष में नहीं हैं। फिलहाल दल-बदल एक्सप्रैस को भाजपा को राजस्थान में हाल्ट करना पड़ा है।

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और अंत में, एक बात मुझे कभी समझ नहीं आई
कि वे जो गरीबों के हक में लड़ते हैं
वे यह लड़ाई लड़ते—लड़ते
अमीर कैसे हो जाते हैं !!

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं पूर्व सूचना आयुक्त हैं।)