बांग्लादेश में चुनाव से पहले भारतीयों पर हमले का खतरा! डिप्लोमैट्स को लेकर उठाए बड़े कदम

नई दिल्ली: बांग्लादेश में शेख हसीना की सरकार के पतन के बाद से यूनुस सरकार में हिंदुओं के खिलाफ हिंसा जारी है. बांग्लादेश में छात्रों के प्रदर्शन के दौरान भारतीय दूतावास को भी निशाना बनाया गया है. अब 12 फरवरी को बांग्लादेश में चुनाव है. चुनाव से पहले बांग्लादेश में रह रहे भारतीयों पर हमले की आशंका है. इस हमले की आशंका के मद्देनजर भारत सरकार ने बड़ा कदम उठाया है. बांग्लादेश में भारतीय जगहों पर हिंसा के खतरे के बीच भारत सरकार ने देश में भारतीय डिप्लोमैट और अधिकारियों के परिवारों को भारत लौटने की सलाह दी है. भारत ने अपने डिप्लोमैट्स के लिए बांग्लादेश को नॉन-फैमिली पोस्टिंग बनाने का फैसला किया और बांग्लादेश में मिशन और पोस्ट अधिकारियों के डिपेंडेंट्स को घर लौटने की सलाह दी. वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार यह कदम एहतियात के तौर पर उठाया गया है, क्योंकि पड़ोसी देश में सांप्रदायिक घटनाएं बढ़ रही हैं, जिससे अल्पसंख्यकों की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ गई है.
सूत्रों ने कहा कि एहतियात के तौर पर, हमने हाई कमीशन और चार असिस्टेंट हाई कमीशन के अधिकारियों के डिपेंडेंट्स को भारत लौटने की सलाह दी है.” पिछले महीने चटगांव में विरोध के मद्देनजर भारत सरकार ने यह फैसला लिया है. एक्सट्रीमिस्ट और रेडिकल एलिमेंट्स की धमकियों ने डिप्लोमैट्स और उनके परिवारों की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ा दी है. बांग्लादेश हिंदू बुद्धिस्ट क्रिश्चियन यूनिटी काउंसिल के मुताबिक, दिसंबर से बांग्लादेश में हिंदू कम्युनिटी के लगभग सात लोग मारे गए हैं, लेकिन इस स्थिति के बावजूद, बांग्लादेश में सभी पांच डिप्लोमैटिक मिशन पूरी स्ट्रेंथ के साथ काम करते रहेंगे. खास तौर पर, हाई कमीशन और चार दूसरी पोस्ट पूरी स्ट्रेंथ के साथ काम करते रहेंगे. चटगांव, खुलना, राजशाही और सिलहट पोस्ट खुले रहेंगे.
हालांकि, इस बारे में कोई जानकारी नहीं है कि डिप्लोमैट्स के परिवार कब लौटने की उम्मीद है. सुरक्षा चिंताओं के कारण, बांग्लादेश में डिप्लोमैट्स की संख्या के बारे में जानकारी नहीं मिल सकी. सोमवार को, अंतरिम सरकार के मुख्य सलाहकार ने सोशल मीडिया पर पिछले साल के पुलिस रिकॉर्ड की एक ऑफिशियल रिव्यू रिपोर्ट शेयर की, जिसमें अल्पसंख्यक समुदायों के सदस्यों से जुड़ी 645 घटनाओं का डॉक्यूमेंटेशन किया गया था. बयान में कहा गया था कि 71 घटनाओं की पहचान सांप्रदायिक तत्वों के रूप में की गई, जबकि 574 घटनाओं को गैर-सांप्रदायिक प्रकृति का माना गया.



