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पंजाब में अपनी छवि सुधारने की कोशिश में भाजपा, शामिल कर रही सिख चेहरे

चंडीगढ़: मनप्रीत बादल भी आखिर भाजपा में शामिल हो गए। उनके कांग्रेस छोड़ते ही जयराम रमेश और अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग से लेकर प्रताप सिंह बाजवा तक ने ऐसा शुक्र मनाया मानो वह कांग्रेस पर बोझ हों। उनके बयान भी ऐसे ही थे-बादल छंट गए, बढ़िया हुआ चले गए। लेकिन किसी चुनाव के नजदीक न होने के बावजूद कांग्रेसी भाजपा का रुख क्यों कर रहे हैं, इस पर कांग्रेस कोई चिंतन नहीं कर रही। पंजाब से पूर्व मुख्यमंत्री, पूर्व प्रधान और 6 मंत्री व कई पूर्व विधायक अब तक भाजपा में जा चुके हैं मगर कांग्रेस ऐसे चल रही है मानो उसे कोई फर्क ही नहीं पड़ रहा।

इस सबके बीच एक बड़ी चर्चा पर्दे के पीछे यह चल रही है कि नेताओं की सैद्धांतिक विचारधारा कहां चली गई, क्या नेताओं के विरोधी दलों से मतभेद खत्म हो चुके हैं। नेता पार्टी छोड़ने और नई पार्टी ज्वाइन करने में अब कोई झिझक महसूस नहीं कर रहे। वैसे मनप्रीत बादल के लिए भाजपा ही सबसे ज्यादा मुफीद है क्योंकि उनकी कार्यशैली व्यापारिक रही है जिसमें बाजार हावी होता है और यही कारण है कि उन्होंने सब्सिडियों का पुरजोर विरोध किया है। भाजपा की नीतियां इसी कारण मनप्रीत के मन के करीब हैं। वैसे भाजपा के इस कांग्रेसीकरण से पार्टी के वह कार्यकर्ता हताश हैं जिन्होंने लंबे अरसे से पार्टी की सेवा की है। अब हाल ही में बनी पंजाब की नई टीम में इन ‘बाहरी’ नेताओं का दबदबा इतना बढ़ गया है कि पार्टी ने उन्हें प्रदेश में उपाध्यक्ष, महासचिव और सचिव के अलावा जिला प्रधान तक के पदों से नवाजने में कोई कसर नहीं छोड़ी। भाजपा में इन नेताओं की आमद से पार्टी चाहे ऊपर से मजबूत दिखाई देती हो मगर सच यह है कि पार्टी की नींव पुराने वर्करों को नजरअंदाज करने से हिलने लगी है।

सिख चेहरे लाकर मजबूत होना चाहती है भाजपा
भाजपा की छवि देशभर में अल्पसंख्यक विरोधी मानी जाती है लेकिन पंजाब में वह अपनी इस छवि को धोने की कोशिश में जुटी है। पंजाब में भाजपा के पास सिख चेहरों की हमेशा से कमी रही है और अब वह इसकी भरपाई कांग्रेस से नेताओं को लाकर कर रही है। पार्टी चाहती है कि ज्यादा से ज्यादा सिख चेहरे भाजपा का हिस्सा बनें। इसका कितना फायदा उसे मिलेगा, यह तो फिलहाल साफ नहीं हुआ है मगर यह तय है कि भाजपा आगे भी सिख चेहरों से अपना ‘परिवार’ बढ़ाना जारी रखेगी।

भाजपा नेतृत्व को पता है कि पंजाब में केवल हिंदू नेताओं के बलबूते वह कभी सत्ता में नहीं आ सकती। पिछले चुनाव में स्थापित दलों और उनके दिग्गजों को जो पटखनी मतदाता ने दी है, उसमें भाजपा सपना देख रही है कि उसे भी सत्ता की चाबी हासिल हो सकती है, बशर्ते मतदाताओं की नाराजगी अकाली दल और कांग्रेस के प्रति बरकरार रहे। भाजपाई तो कहते भी हैं कि अगले चुनाव में आम आदमी पार्टी और भाजपा में ही मुकाबला देखने को मिलेगा। इसकी कसरत उसने लोकसभा चुनाव के मद्देनजर केंद्रीय मंत्रियों के पंजाब में दौरे बढ़ाकर शुरू भी कर दी है। अमित शाह की स्थगित हुई 29 जनवरी की पटियाला रैली में भी कई सिख नेताओं को भाजपा में शामिल करने की योजना थी, जो धरी रह गई।

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