
बजट 2026 : भविष्य गढ़ें या नीति, पूंजी, ग्रीन और ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था बनाएं
भारत आज सिर्फ़ एक बजट नहीं, बल्कि एक दिशा की प्रतीक्षा कर रहा है। तीसरी बार सत्ता में लौटी मोदी सरकार के सामने बजट 2026 एक सामान्य वित्तीय अभ्यास नहीं, बल्कि राजनीतिक विश्वसनीयता और आर्थिक दृष्टि की अग्निपरीक्षा है। दस वर्षों में सरकार ने इंफ्रास्ट्रक्चर, डिजिटल भुगतान और वैश्विक मंच पर भारत की साख को मज़बूत किया है, लेकिन ज़मीनी सच्चाई यह भी है कि आम आदमी आज भी महंगाई, रोजगार और भविष्य की असुरक्षा से जूझ रहा है। ऐसे में सवाल साफ़ है, क्या यह बजट सिर्फ़ राजकोषीय अनुशासन का पाठ पढ़ाएगा, या जनता और उद्यम की साझी उम्मीदों को आगे बढ़ाएगा? प्रस्तुत है इन्हीं सवालों पर सीनियर चार्टर्ड एकाउंटेंट सुदेशना बसु, जो वाराणसी ब्रांच ऑफ आईसीएआई की पूर्व चेयरमैन और इंडो-अमेरिकन चैंबर ऑफ कॉमर्स की पूर्व चेयरमैन रह चुकी हैं, से वरिष्ठ रिपोर्टर सुरेश गांधी की खास बातचीत पर आधारित एक विस्तृत रिपोर्ट. जो सिर्फ बजट की अपेक्षाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत के भविष्य की आर्थिक रूपरेखा पर एक गहन विमर्श है।
–सुरेश गांधी
फिरहाल, भारत आज जिस आर्थिक चौराहे पर खड़ा है, वहां सवाल सिर्फ़ विकास दर का नहीं, बल्कि विकास की दिशा का है। दुनिया जब हरित ऊर्जा, डिजिटल शिक्षा और टेक्नोलॉजी आधारित रोजगार की ओर बढ़ रही है, तब भारत के लिए यह तय करना ज़रूरी हो गया है कि वह सिर्फ़ उपभोक्ता बनेगा या इन क्षेत्रों में नेतृत्व करेगा। ऐसे समय में पेश होने वाला केंद्रीय बजट 2026 नीति, पूंजी और भरोसे, तीनों की कसौटी है।
प्रश्न : बजट 2026 को आप किस रूप में देखती हैं, एक नियमित वित्तीय दस्तावेज़ या टर्निंग पॉइंट?
सुदेशना बसु : बजट को अब सिर्फ़ आय-व्यय का दस्तावेज़ मानना भूल होगी। बजट 2026 एक रणनीतिक टर्निंग पॉइंट हो सकता है, क्योंकि भारत इस समय तीन बड़ी चुनौतियों और तीन बड़े अवसरों के बीच खड़ा है। चुनौतियां हैं : महंगाई, रोजगार और वैश्विक अनिश्चितता। और अवसर हैं, ग्रीन एनर्जी, डिजिटल शिक्षा और युवा जनसंख्या। अगर बजट इन अवसरों को सही नीति समर्थन देता है, तो भारत अगले दशक में सिर्फ़ तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था नहीं, बल्कि सस्टेनेबल और नॉलेज-ड्रिवन इकॉनमी बन सकता है।
प्रश्न : इलेक्ट्रिक वाहन को अक्सर पर्यावरण से जोड़कर देखा जाता है। क्या यह आर्थिक रूप से भी उतना ही महत्वपूर्ण है?
सुदेशना बसु : बिलकुल। ईवी अब सिर्फ़ “ग्रीन विकल्प” नहीं रहा, यह आर्थिक अनिवार्यता बन चुका है। भारत हर साल भारी मात्रा में कच्चा तेल आयात करता है। ईवी का विस्तार मतलब : ऊर्जा आयात पर निर्भरता कम, चालू खाते के घाटे में राहत, स्थानीय मैन्युफैक्चरिंग और रोजगार. लेकिन समस्या यह है कि नीति और फाइनेंस के स्तर पर ईवी को अभी भी मुख्यधारा का दर्जा नहीं मिला है।
प्रश्न : ईवी सेक्टर की सबसे बड़ी बाधा क्या है?
सुदेशना बसु : सबसे बड़ी बाधा है महंगा और जटिल फाइनेंस। ईवी लोन को प्रायोर्टी सेक्टर लेंडिंग (पीएसएल) में शामिल किया जाना चाहिए। अगर ऐसा होता है तो बैंकों को सस्ता फंड मिलेगा, ब्याज दरें घटेंगी, आम आदमी, ऑटो ड्राइवर, डिलीवरी पार्टनर भी ईवी खरीद पाएंगे. यह फैसला ईवी को शहरों से निकालकर गांव-कस्बों तक ले जाएगा। ईवी फाइनेंस में एनबीएफसी और बैंकों का डर भी एक बड़ा फैक्टर है। अगर सरकार ईवी के लिए क्रेडिट गारंटी स्कीम लाती है, तो जोखिम कम होगा और लेंडिंग बढ़ेगी। यह वही मॉडल है, जिसने एमएसएमई सेक्टर में चमत्कार किया था।
प्रश्न : बैटरी पासपोर्ट को आप कितना व्यवहारिक मानती हैं?
सुदेशना बसु : यह एक गेम-चेंजर आइडिया है। ईवी की असली संपत्ति बैटरी है, लेकिन आज उसकी उम्र, क्षमता और उपयोग का कोई विश्वसनीय रिकॉर्ड नहीं है। ‘बैटरी पासपोर्ट’ से : सेकेंड-हैंड ईवी मार्केट विकसित होगा, फाइनेंस कंपनियों का भरोसा बढ़ेगा, बैटरी रीसाइक्लिंग को बढ़ावा मिलेगा, अगर बजट 2026 में इस पर नीति आती है, तो यह भारत को सर्कुलर इकॉनमी की दिशा में मजबूत कदम होगा।
प्रश्न : बजट 2026 – 27 को “आर्थिक दिशा की अग्निपरीक्षा” क्यों कहा जा रहा है?
सुदेशना बसु : क्योंकि यह बजट ऐसे समय आ रहा है जब एक ओर भारत तेज़ आर्थिक वृद्धि का दावा कर रहा है, वहीं दूसरी ओर आम आदमी महंगाई, बेरोज़गारी और आय के दबाव से जूझ रहा है। यह बजट तय करेगा कि विकास सिर्फ़ आंकड़ों में रहेगा या ज़मीनी हकीकत में भी दिखेगा।
प्रश्न : शिक्षा तकनीक को आप भारत के भविष्य से कैसे जोड़ती हैं?
सुदेशना बसु : भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी युवा आबादी है, लेकिन यह ताकत तभी काम आएगी जब शिक्षा और स्किलिंग मजबूत हों। एड-टेक सेक्टर यहां क्रांतिकारी भूमिका निभा सकता है, बशर्ते उसे धैर्यशील पूंजी और नीति समर्थन मिले। शिक्षा में निवेश का रिटर्न तुरंत नहीं आता। बजट 2026 में : एड-टेक स्टार्टअप्स को ग्रांट, रिसर्च आधारित मॉडल्स को इंसेंटिव, सरकारी स्कूलों के साथ पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप, इन पर फोकस होना चाहिए।
प्रश्न : क्या जीडीपी ग्रोथ के मजबूत आंकड़े आम लोगों की स्थिति सुधारने के लिए पर्याप्त हैं?
सुदेशना बसु : नहीं। मजबूत जीडीपी आंकड़ों के बावजूद महंगाई, शिक्षा-स्वास्थ्य खर्च और सीमित रोज़गार ने आम आदमी की जेब हल्की की है। इसलिए बजट से अपेक्षा है कि वह आर्थिक वृद्धि को आम जीवन से जोड़े।
प्रश्न : मध्यम वर्ग को बजट 2026 से 27 से सबसे बड़ी उम्मीदें क्या हैं?
सुदेशना बसु : मध्यम वर्ग आयकर स्लैब में वास्तविक सुधार, स्टैंडर्ड डिडक्शन बढ़ाने, नई कर व्यवस्था को सरल बनाने और शिक्षा-स्वास्थ्य खर्च पर कर राहत की उम्मीद कर रहा है, ताकि उसकी क्रय शक्ति बढ़ सके।
प्रश्न : महंगाई आज सिर्फ़ आर्थिक नहीं, सामाजिक मुद्दा क्यों बन गई है?
सुदेशना बसु : क्योंकि दूध, दाल, सब्ज़ी, दवा और शिक्षा जैसी ज़रूरी चीज़ें महंगी हो चुकी हैं, लेकिन आमदनी उसी अनुपात में नहीं बढ़ी। इससे जीवन स्तर और सामाजिक संतोष दोनों प्रभावित हो रहे हैं।
प्रश्न : बजट में महंगाई नियंत्रण के लिए क्या अपेक्षित है?
सुदेशना बसु : आवश्यक वस्तुओं पर कर भार कम करना, आपूर्ति श्रृंखला को मज़बूत करना और ईंधन व परिवहन लागत नियंत्रित करने के ठोस उपाय बजट की प्राथमिकता होने चाहिए।
प्रश्न : युवा भारत के लिए बजट 2026 – 27 क्यों निर्णायक माना जा रहा है?
सुदेशना बसु : क्योंकि भारत की सबसे बड़ी आबादी युवा है, लेकिन नौकरी की कमी बड़ी चुनौती बनी हुई है। यह बजट तय करेगा कि युवा शक्ति अवसर में बदलेगी या असंतोष में।
प्रश्न : रोज़गार सृजन में सबसे बड़ी बाधा क्या रही है?
सुदेशना बसु : अब तक योजनाओं की घोषणाएं तो हुई हैं, लेकिन एमएसएमई, मैन्युफैक्चरिंग और स्थानीय उद्योगों को ज़मीनी स्तर पर उतना समर्थन नहीं मिला, जितना बड़े पैमाने पर रोज़गार के लिए ज़रूरी है।
प्रश्न : किसान और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को बजट का केंद्र क्यों माना जा रहा है?
सुदेशना बसु : क्योंकि भारत की मांग और सामाजिक स्थिरता की जड़ गांवों में है। किसान की आय बढ़ेगी तो शहरों की अर्थव्यवस्था भी मजबूत होगी।
प्रश्न : किसानों के लिए बजट से क्या ठोस अपेक्षाएं हैं?
सुदेशना बसु : कृषि निवेश बढ़ाना, सिंचाई और भंडारण पर ज़ोर, फसल बीमा और समर्थन मूल्य को मजबूत करना तथा ग्रामीण बुनियादी ढांचे का विस्तार।
प्रश्न : महिलाओं को “अर्थव्यवस्था की अनदेखी ताकत” क्यों कहा गया है?
सुदेशना बसु : क्योंकि जब महिलाएं आर्थिक रूप से सशक्त होती हैं, तो पूरा परिवार और समाज आगे बढ़ता है। महिला उद्यमिता और स्वयं सहायता समूह अर्थव्यवस्था को नई गति दे सकते हैं।
प्रश्न : स्वास्थ्य और शिक्षा को खर्च नहीं, निवेश क्यों माना जाना चाहिए?
सुदेशना बसु : क्योंकि कोविड ने दिखा दिया कि कमजोर स्वास्थ्य व्यवस्था पूरी अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचा सकती है। शिक्षा के बिना कौशल और रोजगार की कल्पना भी संभव नहीं।
प्रश्न : उद्योग जगत बजट से रियायत से ज़्यादा क्या चाहता है?
सुदेशना बसु : उद्योग स्थिर, स्पष्ट और दीर्घकालिक नीति चाहता है, ताकि निवेश, उत्पादन और रोजगार की योजना भरोसे के साथ बनाई जा सके।
प्रश्न : इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश को इतना अहम क्यों माना जा रहा है?
सुदेशना बसु : क्योंकि सड़क, रेलवे, लॉजिस्टिक्स और ऊर्जा में निवेश से सीधे रोजगार पैदा होते हैं और अर्थव्यवस्था में बहुगुणक प्रभाव आता है।
प्रश्न : एमएसएमई सेक्टर को बजट में राहत क्यों जरूरी है?
सुदेशना बसु : एमएसएमई देश की रीढ़ हैं, लेकिन कर्ज़ और नियमों के बोझ से दबे हैं। अगर इन्हें राहत मिली, तो बड़े पैमाने पर रोजगार और स्थानीय विकास संभव है।
प्रश्न : राजकोषीय संतुलन सरकार के लिए सबसे बड़ी कसौटी क्यों है?
सुदेशना बसु : क्योंकि सरकार को एक तरफ़ राहत और विकास के लिए खर्च करना है, वहीं दूसरी ओर घाटा भी नियंत्रित रखना है। यही संतुलन वित्तीय समझदारी की परीक्षा है।
प्रश्न : बजट 2026 – 27 की सफलता का अंतिम पैमाना क्या होगा?
सुदेशना बसु : यह कि क्या यह बजट आम आदमी की राहत, युवाओं के रोजगार, किसानों की मजबूती और उद्योग के भरोसे, इन चारों को एक साथ साध पाता है या नहीं।
प्रश्न : डिजिटल शिक्षा की सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
सुदेशना बसु : डिजिटल डिवाइड। आज भी गांवों में : इंटरनेट कमजोर है, डिवाइस नहीं हैं, प्रशिक्षित शिक्षक नहीं हैं, अगर बजट डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर को शिक्षा नीति के साथ नहीं जोड़ता, तो एड-टेक सिर्फ़ शहरी सुविधा बनकर रह जाएगा। डेटा सुरक्षा और एआई के मामले में एड-टेक में बच्चों का डेटा सबसे संवेदनशील विषय है। बजट 2026 में : सख्त डेटा प्रोटेक्शन, एआई आधारित लर्निंग प्लेटफॉर्म के लिए स्पष्ट गाइडलाइंस, आउटकम-आधारित मूल्यांकन, इन पर नीति बननी चाहिए।
प्रश्न : क्या सरकार के पास इतना वित्तीय स्पेस है?
सुदेशना बसु : यही असली परीक्षा है। लेकिन ईवी और एड-टेक पर खर्च खर्च नहीं, निवेश है। ईवी भविष्य की ऊर्जा सुरक्षा है और एड-टेक भविष्य की उत्पादकता। अगर सरकार आज यहां निवेश नहीं करती, तो कल उसे बेरोजगारी और पर्यावरण संकट पर कई गुना खर्च करना पड़ेगा।
प्रश्न : वाराणसी, कानपुर, आगरा, पटना, मुंबई जैसे शहरों के लिए इसका क्या मायने है?
सुदेशना बसु : इन शहरों के लिए यह बजट निर्णायक हो सकता है। ईवी से : लोकल ट्रांसपोर्ट, ई-रिक्शा, डिलीवरी इकोनॉमी को मजबूती मिलेगी। एड-टेक से : ग्रामीण प्रतिभा को मंच, पलायन में कमी, स्थानीय रोजगार मिलेगा.
प्रश्न : क्या दिशा तय करेगा बजट 2026?
सुदेशना बसु : बजट 2026 सिर्फ़ आंकड़ों का खेल नहीं है। यह तय करेगा कि भारत : प्रदूषण कम करेगा या आयात बढ़ाएगा, युवाओं को स्किल देगा या सिर्फ़ डिग्री, नीति में साहस दिखाएगा या इंतजार, ईवी और एड-टेक अगर इस बजट में प्राथमिकता बनते हैं, तो यह दशक भारत का हो सकता है। वरना अवसर हाथ से निकलने में देर नहीं लगती। फिरहाल, देश, उद्योग और युवा तीनों की निगाहें अब बजट पर टिकी हैं। क्योंकि इलेक्ट्रिक वाहन (ईवी) और एड-टेक जैसे सेक्टर इस बजट की असली कसौटी हैं। ये न केवल पर्यावरण और शिक्षा से जुड़े हैं, बल्कि रोज़गार, आत्मनिर्भरता और भारत की वैश्विक प्रतिस्पर्धा से भी सीधे जुड़े हैं। अगर सरकार इन क्षेत्रों में साहसिक और दूरदर्शी फैसले लेती है, तो बजट 2026 इतिहास में “भविष्य का बजट” कहलाएगा। और अगर अवसर चूका, तो यह वही पुरानी कहानी होगी, बड़े वादे, सीमित असर।
प्रश्न : क्या आप कहना चाहती है बहुमत मिला है, बहाना नहीं?
सुदेशना बसु : मोदी सरकार को आज किसी गठबंधन की बैसाखी नहीं चाहिए। बहुमत स्पष्ट है, जनादेश मज़बूत है, तो फिर बजट में संकोच क्यों? अब समय है कि सरकार लोकप्रियता नहीं, नेतृत्व दिखाए। ईवी और एड-टेक ऐसे सेक्टर हैं जहाँ आधे-अधूरे फैसले काम नहीं आएंगे। यहां नीति में स्पष्टता, फंडिंग में साहस और क्रियान्वयन में गति चाहिए।
प्रश्न : बजट 2026 की असली परीक्षा क्या है?
सुदेशना बसु : सरकार ने इलेक्ट्रिक मोबिलिटी को लेकर बड़े लक्ष्य तय किए हैं, लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि : ईवी आज भी आम आदमी की पहुंच से बाहर है, लोन महंगे हैं, चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर असमान है. अगर मोदी सरकार सच में ईवी को जनआंदोलन बनाना चाहती है, तो बजट 2026 में तीन फैसले निर्णायक होंगे.
फैसला आज, असर दशकों तक
बजट 2026 नरेंद्र मोदी सरकार के लिए सिर्फ़ एक वित्तीय दस्तावेज़ नहीं, बल्कि यह तय करने का क्षण है कि भारत आने वाले दस वर्षों में किस राह पर चलेगा। यह बजट या तो : साहस दिखाकर भारत को ग्रीन और ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था बनाएगा या फिर अवसर गंवाकर वही पुरानी शिकायतें छोड़ेगा, महंगाई, बेरोज़गारी और असमानता। जनता ने सरकार को ताकत दी है। अब बारी सरकार की है, दृष्टि दिखाने की। देश देख रहा है।



