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सृजनात्मकता, डिजिटलीकरण और बच्चे

सर्वेश कुमार मौर्य

स्तम्भ: हाल ही में जयपुर जे के लोन चिल्ड्रेन्स हॉस्पिटल के डॉक्टरों ने एक सर्वे किया। 25 मार्च से लेकर मई माह के अंत तक के लॉकडाउन पर आधारित इस सर्वे में लॉकडाउन के दौरान बच्चों के जीवन व व्यवहार में आए बदलावों का अध्ययन किया गया। इस सर्वे में पाया गया कि लॉकडाउन ने बच्चों के जीवन-व्यवहार को बदल दिया है। इस परिघटना ने उनके शारीरिक, मानसिक व भावनात्मक स्वास्थ्य को खासा प्रभावित किया है।

सर्वे में पाया गया कि लॉकडाउन के दौरान बच्चों में इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के प्रयोग में लत की हद तक भारी वृद्धि हुई है। 01 जून से लेकर 15 जून तक चले इस ऑनलाइन सर्वे में कुल 203 सैम्पल लिए गए थे। इसमें जयपुर, जोधपुर, उदयपुर, भीलवाड़ा, अजमेर, अलवर, कोटा, गंगानगर, सीकर, चुरू, नागौर और भरतपुर को राजस्थान राज्य से शामिल किया गया और अन्य राज्यों में दिल्ली, दिल्ली एनसीआर, कोलकाता, मुंबई, आगरा, चंडीगढ़ और लखनऊ को शामिल किया गया। इस सर्वे के परिणाम कई मायने में चौंकाने वाले, चिंताजनक व महत्वपूर्ण हैं।

सर्वे में पाया गया कि 65 प्रतिशत बच्चे लॉकडाउन के दौरान इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के आदी बन गए हैं और 50 प्रतिशत बच्चे तो आधे घंटे के लिए भी इन उपकरणों को छोड़ने के लिए तैयार नहीं हैं। इस लत से उनके स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। बच्चे इनके प्रयोग से ज्यादा जिद्दी और चिड़चिड़े हो गए हैं। उनकी भाषिक कुशलता, आलोचनात्मक शक्ति और विश्लेषणात्मक क्षमता तेजी से घटी है। दो तिहाई अभिभावकों ने माना कि उन्होंने लॉकडाउन के दौरान अपने बच्चों के जीवन-व्यवहार में भारी बदलाव देखे हैं। ज्यादातर बच्चों में अनिद्रा, थकान, सरदर्द, चिड़चिड़ापन, मोटापा व कमरदर्द आदि की शिकायतें बढ़ी हैं।

45 प्रतिशत बच्चों में अनिद्रा की भयंकर शिकायतें देखी गई। 07 प्रतिशत बच्चों में सोने के वक्त बिस्तर में चिड़चिड़ापन महसूस किया गया। 32 प्रतिशत बच्चे अपने गुस्से को काबू कर पाने में अक्षम देखे गए। 33 प्रतिशत अभिभावकों ने कहा कि उन्होंने अपने बच्चों में ऑनलाइन क्लासेस से किसी भी किस्म का इंप्रूवमेंट नहीं देखा। 19 प्रतिशत का कहना था कि इस किस्म की ऑनलाइन क्लासेस का स्तर पहले की स्कूली क्लासरूम वाली शिक्षण पद्धति के मुकाबले काफ़ी नीचे था।

38 प्रतिशत अभिभावकों ने कहा कि उन्होंने अपने बच्चों के लिए ऑनलाइन क्लासेज अटेंड करने के लिए नए इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की खरीद की, जिससे उन पर अतिरिक्त आर्थिक भार पड़ा। सर्वे में यह भी पाया गया कि 50 प्रतिशत स्कूल एकांगी तरीके से पहले से रिकॉर्ड किए गए या पुरातन अध्यापन पद्धति, जिसमें सिर्फ अध्यापक ही बोलते रहते हैं, से लाइव आकर ऑनलाइन क्लासेज चला रहे हैं। 83 प्रतिशत अभिभावकों ने माना कि अपने बच्चों को ऑनलाइन क्लासेज के दौरान उन्होंने खुद सुपरवाइज किया।इस पद्धति में मोबाइल फोन सबसे पसंदीदा माध्यम बनकर उभरा है, जिस पर बच्चे एक घंटे से लेकर आठ घंटे तक शिक्षण प्रशिक्षण के नाम बिता रहे हैं। 

इन सारी स्थितियों के बाद भी दिलचस्प व चौंकाने वाला तथ्य यह है कि 92 प्रतिशत अभिभावकों ने ऑनलाइन क्लासेज के लिए सहर्ष सहमति दी है। अभिभावकों को दुष्प्रभावों के बाद भी यह माध्यम आकर्षित करता है, बेहतर लगता है। कहीं ऐसा तो नहीं कि जो ख़ूबसूरत इमेजिंग रातों-दिन चौबीसों घंटे जनमाध्यमों द्वारा की जा रही है, उसकी चमक दमक उनकी समझ पर भारी पड़ रही है। इस सर्वे में विशेष रूप से यह कहा गया कि अभिभावकों और नीति निर्धारकों को इस बारे में ध्यान देना चाहिए कि कैसे बच्चों को बढ़ती हुई इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की लत से बचाया जाए व ई-लर्निंग को संतुलित किया जाय?

यह भी जोर देकर कहा गया कि ई-लर्निंग परंपरागत पद्धति का विकल्प नहीं हो सकती। (देखें-हिंदुस्तान टाइम्स, 16 जून 2020 की उर्वशी देव रावल की रिपोर्ट) इस रिपोर्ट पर किंचित विस्तार से बात करने का कारण इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के प्रयोग से उपजे दुष्प्रभाव व ई-लर्निग की ओर जाने की सनक की हद तक की ललक से उपजी हाहाकारी गंभीरता है, जिस पर ध्यान देना बहुत जरुरी है। यदि इसे नजरंदाज किया गया तो इसके दूरगामी दुष्प्रभाव होंगे।

यह भी उल्लेखनीय तथ्य है कि शिक्षा का यह डिजिटलीकरण राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005 और प्रस्तावित नई शिक्षा नीति के दिशानिर्देशों के भी विपरीत है। प्रस्तावित नई शिक्षा नीति राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005 को बेहतर रचनात्मक किस्म के सीखने को सुनिश्चित करने के लिए बेहतरीन नीतियों को रेखांकित करने वाला दस्तावेज़ मानती है, जिसकी प्रासंगिकता आज के समय में भी है। यह बताना इसलिए बेहद जरुरी है क्योंकि कुछ विद्वजन यह सवाल उठा सकते हैं कि पंदह वर्ष पुराने दस्तावेज़ का आज के समय में क्या महत्व? इसलिए यह जान लेना ठीक होगा कि यह दस्तावेज़ आज और प्रासंगिक हो गया है, उसमें बताये गए शैक्षिक लक्ष्य आज भी परिणति का इंतजार कर रहे हैं।

राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005 बच्चों के सीखने के संदर्भ में स्कूल को बाहर के जीवन से जोड़ने, पढ़ाई को रटंत प्रणाली से मुक्त करने, पाठ्यपुस्तक केंद्रित शिक्षा के बजाय गतिविधि आधारित सहभागी शिक्षण पर जोर देती है, जहाँ अध्यापक ज्ञान का स्रोत नहीं बल्कि ज्ञान प्राप्ति में सुगमकर्ता, सहायक की भूमिका में होता है, जो ज्ञात से अज्ञात की ओर, मूर्त से अमूर्त की ओर, स्थानीय से वैश्विक की ओर जाने का मार्ग प्रशस्त करता है। बच्चों के सीखने के संदर्भ में कहा गया है- बच्चे आसपास की दुनिया से बहुत सक्रिय रूप से जुड़े रहते हैं, वह खोजबीन करते हैं, प्रतिक्रिया करते हैं, चीजों के साथ कार्य करते हैं, चीजें बनाते हैं और अर्थ ग्रहण करते हैं।

लेकिन यह दुखद सत्य है कि आज भी हमारे शिक्षक सीमित पाठ योजना पर आधारित हैं जिनका लक्ष्य हमेशा परिमेय आचरणों को हासिल करना होता है। इस दृष्टिकोण में बच्चों को गीली मिटटी का लोंदा माना जाता है जिसे अध्यापक जैसा चाहे वैसा बना सकता है। हमारे अधिकांश अध्यापक इसी खुदाई दृष्टिकोण से आज भी परिचालित हैं। इस किस्म की पद्धति में वांक्षित परिणामों पर बहुत जोर दिया जाता है।

इसका दुष्परिणाम यह हुआ है जहाँ अध्यापन में भावनाओं एवं अनुभव को कक्षा में एक निश्चित और महत्वपूर्ण जगह मिलनी चाहिए थी, जहाँ सहभागिता को एक सशक्त कार्यनीति बनाया जाना था, जहाँ बच्चों की सृजनात्मकता को उभरा जाना था, जहाँ शिक्षा को मौजूदा महत्वाकांक्षाओं व जरूरतों के साथ शाश्वत मूल्यों तथा समाज के तात्कालिक सरोकारों के साथ वृहद मानवीय आदर्शों को पूरा करना था, वहां इसे महज खानापूर्ति, कर्मकांड बना दिया गया है।

जहाँ प्रस्तावित नई शिक्षा नीति और राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005 बच्चे की सृजनात्मकता और मौलिकता की वकालत करती है इसके एकदम उलट शिक्षा के डिजिटलीकरण की कवायद तात्कालिकता से ग्रस्त निहायत, अगंभीर, असृजनात्मकता को बढ़ाने वाला फैसला जान पड़ती है। यह नीति भविष्य में रचनात्मकता के बजाय रटनात्मकता को बढ़ावा देनी वाली है। यदि इसे महामारी के दौर में उपजी जरुरत के रूप में देखा जा रहा है तो इससे किसी को भी कोई खास दिक्कत नहीं होनी चाहिए लेकिन जब इसे दीर्घकालिक निर्णय या आने वाले समय में एकमात्र बेहतर विकल्प के रूप में देखा जा रहा है तो यह चिंताजनक है।

ऐसे में जब ढेर सारे विद्वान, चिन्तक, विचारक इसमें संभावनाएँ देखने के बाद भी सीमाओं की ओर संकेत कर रहे हों, इसे शिक्षा के लिए प्रतिकूल मान रहे हों, इसके बावजूद इसे जोर शोर से लाये जाने की तैयारी हो, तो चिंता और बढ़ जाती है। स्वयं प्रख्यात वैज्ञानिक के। कस्तूरीरंगन, प्रस्तावित नई शिक्षा नीति के चेयरमैन, तथा भारत रत्न, प्रोफेसर सी।एन।आर राव भी इस किस्म के ऑनलाइन शिक्षण का समर्थन नहीं कर रहे हैं। उनका स्पस्ट मानना हैं कि अध्यापक और विद्यार्थियों की शारीरिक उपस्थिति, परस्पर मानसिक जुड़ाव और संवाद सीखने के लिए बेहद महत्वपूर्ण होते है। इसीलिए आमने-सामने के संपर्क, बातचीत, विचारों के आदान-प्रदान के पारंपरिक तरीके बेहतर हैं, उनकी शक्ति चुकी नहीं है। (देखें-राष्ट्रमत, दक्षिण भारत, 9 जून 2020)

आज जब हमारे समय का सबसे प्रचलित मुहावरा -क्या फ़ायदा- हो गया है। हमारा जीवन दर्शन स्वकेन्द्रित लाभ हो गया है और आज की पूंजीवादी संस्कृति में हर चीज -माल- बन गयी है। बाज़ार हमारे समय की नियामक शक्ति बन गया है, जहाँ -ज्ञान- को भी प्रोडक्ट या माल की तरह ही बरता जा रहा है। ऐसे समाज में पूंजीवादी बाज़ार केन्द्रित नीतियों से चकित-विस्मित व भ्रमित होने वालों की कमी नहीं बल्कि उसी में मुक्ति देखने वाले दार्शनिकों, चिंतकों की भी एक बड़ी फौज हमारे समय में है। यह अनायास ही नहीं कि पूंजीवादी संस्कृति -सृजनात्मकता- की दुश्मन और -यथास्थितिवाद- की समर्थक होती है।

उसे मुक्त व सृजनात्मक किस्म के विचारों, व्यवहारों, व्यक्तियों, नीतियों और पद्धतियों से भारी दिक्क़त होती है। सृजनात्मकता पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाली स्कूली शिक्षा के डिजिटलीकरण की अतिरिक्त कवायद को भी इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए अन्यथा भारत जैसे देश में जहाँ विद्यार्थियों की भारी संख्या हो, बुनियादी ढांचे की अपर्याप्तता हो, आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक विभेदों की अपार बाधाएँ हों, वहां पूरे देश में -एक नीति- और इस किस्म के फैसले का क्या मतलब निकाला जाय, वह भी तब जब इसकी पर्याप्त आलोचना हो रही हो।

(यह लेखक के निजी विचार हैं। लेखक एनसीईआरटी में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं।)

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