संपादकीय

संपादकीय : जनवरी 2026

नए साल में युवा मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने उत्तराखंड में नए प्रयोगों से सुशासन का एक नया अध्याय लिख दिया है। पहाड़ों से घिरा यह हरा-भरा राज्य उत्तराखंड सुशासन की नई प्रयोगशाला बन गया है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के इस प्रयोग का मकसद शासन-प्रशासन को सीधे जनता के बीच ले जाना है ताकि दूरस्थ और सीमांत क्षेत्रों के लोगों को अपनी समस्याओं के समाधान के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर न काटने पड़ें। प्रदेश के सभी 13 जिलों की तमाम न्याय पंचायतों और ग्राम सभाओं में आयोजित विशेष कैंपों में भारी भीड़ जुट रही है। इन कैंपों में एक ही छत के नीचे 23 विभागों की सेवाओं के लिए लोग अर्जी लगा रहे हैं। अफसरों को राजधानी के दफ्तर से निकल कर दूर पहाड़ों पर जनता के बीच जाना पड़ रहा है। छोटी-छोटी समस्याओं का तत्काल निस्तारण हो रहा है। यह एक शानदार पहल है। लेकिन जरूरी है कि समय-समय पर इस तरह के कैंप दूर दराज के इलाकों में भी लगाए जाएं। ताकि छोटी-छोटी सरकारी ज़रूरतों के लिए आम जनता हैरान परेशान न होना पड़े।

ये कोई अकेली पहल नहीं है। धामी के नेतृत्व में राज्य में कई ऐसी नीतियां और योजनाएं बनीं जो पहले नहीं थी। समान नागरिक संहिता, सख्त नकल विरोधी एक्ट, धर्मांतरण विरोधी एक्ट जैसे नए कानून बने जो मील का पत्थर साबित हो रहे हैं। इससे उत्तराखंड राज्य तरक्की की सीढ़ियां चढ़ता जा रहा है। देश के अन्य तमाम राज्यों के मुख्यमंत्री इसी तरह के प्रयोग अब अपने राज्यों में शुरू कर चुके हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश को जिस नए भारत का सपना दिखाया है ये उसी सपने को पूरा करने का एक प्रयास है। नई ऊर्जा और नए जोश के साथ मुख्यमंत्री धामी इन योजनाओं के जरिए गुड गर्वनेंस की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। जो किसी भी राज्य की जनता के लिए सुखद है। बेशक मुख्यमंत्री इसके लिए साधुवाद के पात्र हैं। नि:संदेह बीजेपी को इसके अच्छे नतीजे भी देखने को मिलेंगे क्योंकि सरकार जनता के जितने करीब होगी जनता भी सरकार के उतने नजदीक आएगी।

देश की सबसे पुरानी पर्वतमाला अरावली को लेकर इन दिनों पूरे देश में बहस छिड़ी हुई है। सवाल सिर्फ़ एक परिभाषा का नहीं, बल्कि उत्तर भारत के भविष्य, पर्यावरण और जीवन का है। आरोप लग रहे हैं कि अरावली की नई परिभाषा बदलकर खनन को आसान बनाया जा रहा है, जिससे न केवल आने वाले वर्षों में ये पहाड़ पूरी तरह खत्म हो सकते हैं बल्कि इसके दूरगामी नतीजे दिल्ली और उत्तराखंड जैसे राज्यों को उठाने पड़ सकते हैं। देश भर में विरोध के बाद सुप्रीम कोर्ट ने अरावली पहाड़ी की विवादित परिभाषा पर रोक लगा दी है। कोर्ट ने एक नई समिति बनाने का आदेश दिया और 21 जनवरी को अगली सुनवाई तय की है, जिससे अरावली की सुरक्षा पर चिंता और बहस जारी है। इस गंभीर विषय पर इस अंक में विस्तार से चर्चा की गई है।

दीवार में एक खिड़की रहती थी। वह जागती आंखों में सपने बुनती थी। वह खिड़की अब हमेशा के लिए बंद हो गई। हिंदी साहित्य में जादुई यथार्थवाद के चितेरे विनोद कुमार शुक्ल नहीं रहे। उन्होंने अपने जादुई उपन्यासों के माध्यम से लोकआख्यान, स्वप्न, स्मृति, मध्यवर्गीय जीवन और मनुष्य की जटिल आकांक्षाओं को एक विशिष्ट कथा-शिल्प में रूपांतरित किया। साधारण पात्रों की असाधारण कथा कहने वाले शुक्ल ने हिंदी उपन्यास और कविता को एक नया आयाम दिया। आज वह नहीं हैं, लेकिन उनके जादुई शब्द हमें याद दिलाते रहेंगे कि साधारण व सादगी भरे जीवन में भी असाधारणता की एक खिड़की हमेशा खुली रहती है। इस अंक में हम श्री शुक्ल के साक्षात्कारों पर आधारित एक लेख छाप रहे हैं। नया साल शुरू हो चुका है। 2026 संभावनाओं और उम्मीदों से भरा साल है। ‘दस्तक टाइम्स’ के सम्मानित पाठकों को नए साल की हार्दिक शुभकामनाएं।

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