संपादकीय

संपादकीय : नवम्बर 2025

उत्तराखंड इस महीने अपनी रजत जयंती मना रहा है। पच्चीस साल पहले जिस मासूम बच्चे ने जन्म लिया था आज वह सुंदर सजीला नौजवान आत्मनिर्भर हो मंद-मंद मुस्कुरा रहा है। किसी भी नए देश या राज्य के सामने अपनी अलग चुनौतियां होती हैं। खासकर अगर वह पर्वतीय राज्य हो तो चुनौतियां और कठिन हो जाती हैं। उत्तराखंड के लिए भी ये सफर आसान नहीं था लेकिन जिस तरह उत्तराखंड के कर्मठ और मेहनतकश लोगों ने इस नए राज्य को सजाने-संवारने और आत्म निर्भर बनाने के लिए प्रयास किए वह इतिहास के पन्नों पर स्वर्ण अक्षरों में दर्ज हो गया है। उत्तराखंड आज देश के प्रगतिशील राज्यों में से एक है। उत्तराखंड के साथ ही छत्तीसगढ़ 1 नवंबर 2000 को और झारखंड 15 नवंबर 2000 को अस्तित्व में आये थे। आंकड़े बताते हैं कि उत्तराखंड आज हर मामले में इन दोनों राज्यों से इक्कीस है। तमाम प्राकृतिक आपदाओं और राजनीतिक अस्थिरता के लंबे दौर से गुजरने के बावजूद उत्तराखंड कभी विचलित नहीं हुआ। जब-जब राजनीतिक स्थिरता आई राज्य ने तरक्की की। मौजूदा दौर में राज्य की बागडोर एक युवा और ऊर्जावान नेता के हाथों में है। पुष्कर सिंह धामी सरकार की नीतियों ने न केवल आर्थिक प्रगति को गति दी, बल्कि युवाओं, पर्यावरण और सामाजिक समरसता को भी मजबूत किया है। राज्य के युवाओं ने हर क्षेत्र में, चाहे वह राजनीति हो, सिनेमा हो या खेल, उत्तराखंड को एक नई पहचान दी। यह पहला मौका है जब राज्य की उपलब्धियों पर चर्चा केवल देश में ही नहीं बल्कि विदेश में भी हो रही है। कई राज्य उत्तराखंड के पदचिन्हों पर चलने के लिए उत्सुक हैं। इसलिए यह रजत जयंती न केवल अतीत व वर्तमान की उपलब्धियों का उत्सव है, बल्कि एक आत्मनिर्भर और सशक्त राज्य की और बढ़ने का संकल्प भी है।

बिहार के विधानसभा चुनाव अंतिम चरण में हैं। बिहार से साफ सुथरे जनादेश की उम्मीद कोई नहीं करता। सत्ता की बागडोर किसके हाथ में रहेगी ये अंत तक एक जटिल वह रहस्यमय प्रश्न बन कर सामने खड़ा रहता है। एनडीए और महागठबंधन, दोनों ने बिहार की जनता से बड़े-बड़े वादे किए हैं। दोनों तरफ के नेता जानते हैं कि करोड़ों लोगों को सरकारी नौकरी देने के वादे व्यवहारिक नहीं हैं। लेकिन बिहार पिछले करीब पांच दशक से इसी तरह की राजनीति का आदी हो चुका है। बिहार के चुनाव राजनीति की एक ऐसी प्रयोगशाला है जहां किसी क्रांतिकारी बदलाव की उम्मीद नहीं की जा सकती। लेकिन इसके नतीजे अन्य राज्यों के लिए एक नज़ीर जरूर पेश करेंगे।

पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट के आये एक फैसले ने देश भर के लाखों पुराने प्राइमरी शिक्षकों को मुश्किल में डाल दिया है। सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश के अनुसार 2011 से पहले नौकरी करने वाले सभी शिक्षकों को अब दो साल के अंदर टीईटी पास करना जरूरी होगा। नौकरी पर खतरा देख देश भर के शिक्षक आंदोलित हैं। हालांकि खुद सुप्रीम कोर्ट ने माना कि शिक्षकों को केवल इस आधार पर सेवा से हटाना कि उन्होंने टीईटी उत्तीर्ण नहीं किया है,थोड़ा कठोर निर्णय है। कानून और इंसाफ़ दो अलग चीजें हैं। देखा जाए तो सुप्रीम कोर्ट का फैसला एक संवैधानिक मजबूरी है जिसका निवारण संविधान से ही संभव है। गेंद अब केंद्र सरकार के पाले में है। पुराने शिक्षकों को तत्कालीन सेवा शर्तों पर नौकरी दी गई थी। 30-40 साल की नौकरी के बाद सेवा शर्तें बदलना प्राकृतिक न्याय के खिलाफ़ है। अंत में उत्तराखंड के रजत जयंती के अवसर पर ‘दस्तक टाइम्स’ की तरफ से समस्त प्रदेशवासियों को हार्दिेक शुभकामनाएं।

Related Articles

Back to top button