ट्रंप से पहले भी कई अमेरिकी राष्ट्रपति कर चुके हैं ग्रीनलैंड को खरीदने की कोशिश

वाशिंगटन : अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपने दूसरे कार्यकाल के दौरान दुनिया भर में सुर्खियां बटोर रहे हैं। वेनेजुएला के राष्ट्रपति मादुरो को उनके किले से उठाकर न्यूयॉर्क की अदालत में पेश करवाने वाले ट्रंप का अगला सपना ग्रीनलैंड को अमेरिकी आधिपत्य में लाने का है। यूरोप समेत पूरी दुनिया इसका विरोध कर रही है, लेकिन ट्रंप अपनी जिद पर अड़े हुए हैं। उनका तर्क है कि आर्कटिक क्षेत्र और अमेरिकी धरती की रक्षा के लिए ग्रीनलैंड पर अमेरिकी कब्जा होना बहुत जरूरी है। इस कब्जे के लिए वह साम, दाम, दंड भेद सभी प्रकार की नीति अपनाने के लिए भी तैयार हैं। लेकिन इतिहास उठाने पर पता चलता है कि ग्रीनलैंड का ख्वाब सजाने वाले ट्रंप पहले अमेरिकी राष्ट्रपति नहीं हैं। इसके पहले भी कई राष्ट्रपतियों का मन इसको लेकर ललचा चुका है। हालांकि, किसी को भी यह हासिल नहीं हुआ।
ग्रीन लैंड की जमीन का आधुनिक अमेरिका द्वारा दिखाया गया लालच का पहला उदाहरण वर्ष 1867 में सामने आता है। यह वह समय था, जब संयुक्त राज्य अमेरिका ने रूस से अलास्का को खरीदा था। ऐसे में तत्कालीन अमेरिकी विदेश मंत्री विलियम एच. सिवार्ड ने डेनमार्क को भी लगे हाथ आइसलैंड और ग्रीनलैंड खरीदने का ऑफर दे डाला। अलास्का डील में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले तत्कालीन अमेरिकी ट्रेजरी सचिव रॉबर्ट जे वॉकर ने कहा था कि ग्रीनलैंड अगर अमेरिका के हिस्से में आ जाता है, तो यह बहुत ही ज्यादा फायदेमंद होगा। इससे अमेरिका व्यापारिक दुनिया पर नियंत्रण हासिल कर पाएगा। हालांकि, इस समय पर भी डेनमार्क और ग्रीनलैंड को लोगों ने इस प्रस्ताव का विरोध किया और यह आगे नहीं बढ़ पाया।
लगभग 9 दशक तक अमेरिका ग्रीनलैंड को हासिल करने का सपना मन में दबाए रखा। इस बीच पहला विश्व युद्ध भी समाप्त हो गया। अब बारी आई दूसरे विश्वयुद्ध की। इसमें नाजी जर्मनी ने डेनमार्क पर हमला बोल दिया। ग्रीनलैंड की रक्षा करने की जिम्मेदारी अमेरिका के कंधों पर आ गई। इसी दौर में अमेरिका ने ग्रीनलैंड में अपनी सैन्य उपस्थिति को बढ़ाया और इस आर्कटिक द्वीप की रक्षा की। इसके बाद युद्ध समाप्त हुआ, लेकिन अमेरिका का ग्रीनलैंड प्यार एक बार फिर से जाग गया। वर्ष1946 में जब इस द्वीप को खाली करने की बारी आई, तो अमेरिका ने अपने पैसे की ताकत को दिखाना चाहा। दूसरे विश्वयुद्ध में बर्बाद हो चुके डेनमार्क के लिए 100 मिलियन डॉलर की राशि एक बड़ी बात थी, हालांकि इसके बाद भी डेनमार्क ने इस पेशकश को ठुकरा दिया और अमेरिका को मायूस होकर यहां से हटना पड़ा।
इसके बाद डेनमार्क और ग्रीनलैंड अमेरिका की छत्र छाया में नाटो के तहत शामिल हो गए। अमेरिका को अपनी मनचाही मुराद भी मिल गई। कोल्ड वॉर के समय से ही अमेरिका ने रूस को काउंटर करने के लिए ग्रीनलैंड का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। डेनमार्क ने भले ही ग्रीनलैंड अमेरिका को देने से इनकार कर दिया हो, लेकिन नाटो में शामिल होने के नाते वह अमेरिकी सेना को इसके इस्तेमाल से नहीं रोक सकती थी। ऐसे में अमेरिका ने यहां पर 1943 से संचालित पिटफिक स्पेस बेस को और भी ज्यादा मजबूत कर लिया और यहां पर अपनी सैन्य उपस्तिथि को बढ़ा दिया।
तमाम कोशिशों के बाद भी अमेरिका ग्रीनलैंड को खरीदने में नाकामयाब रहा। हाालंकि, सैन्य बेस स्थापित करने से उसके मनसूबे कुछ हद तक कामयाब होते हुए भी नजर आए। इसके बाद आई 21वीं सदी। अमेरिका के राष्ट्रपति बने डोनाल्ड ट्रंप, अपने पहले कार्यकाल के आखिर में ट्रंप ने खुले तौर पर ग्रीनलैंड को खरीदने की पेशकश की। उनकी यह पेशकश, अमेरिकी सुरक्षा से ज्यादा ग्रीनलैंड की जमीन के नीचे दबी अपार खनिज संपदा को लेकर थी। हालांकि, उस समय पर भी डेनमार्क और ग्रीनलैंड दोनों ने ही इस प्रस्ताव को यह कहकर खारिज कर दिया कि उनका यह क्षेत्र बिकाऊ नहीं है।
इसके बाद ट्रंप को सत्ता से जाना पड़ा और बात आई-गई हो गई। लेकिन 2025 में ट्रंप एक बार फिर से सत्ता में लौटे। इस बार ज्यादा आक्रामक होकर। आते ही उन्होंने ऐलान कर दिया कि अब ग्रीनलैंड को अमेरिका का हिस्सा बनना ही होगा। 2025 में अमेरिकी कांग्रेस के एक संयुक्त सत्र को संबोधित करते हुए ट्रंप ने कहा, “मुझे लगता है कि हम इसे (ग्रीनलैंड) को किसी तरह हासिल कर ही लेंगे। किसी न किसी तरह हम इसे जरूर हासिल करेंगे।”
अमेरिका पैसे की दम पर पिछली दो सदी से ग्रीनलैंड को अपना हिस्सा बनाने की बात कर रहा है। लेकिन हर बार डेनमार्क और ग्रीनलैंड इससे इनकार कर देते हैं। इसबार भी ट्रंप के लिए ग्रीनलैंड को खरीदना आसान नहीं होगा। हालांकि, ट्रंप इस मामले में थोड़ा अलग रुख भी अपना रहे हैं, अभी तक किसी भी अमेरिकी राष्ट्रपति ने ग्रीनलैंड हासिल करने के लिए सैन्य अभियान चलाने की बात नहीं कही है, लेकिन ट्रंप ने यह विकल्प भी खुला रखा है।
आपको बता दें, ग्रीनलैंड की सरकार और डेनमार्क को दरकिनार करते हुएस अमेरिका ने सीधे ग्रीनलैंड की जनता को ही पैसा देने की पेशकश की थी,हालांकि उन्होंने भी इससे इनकार कर दिया। रॉयटर्स के मुताबिक ग्रीनलैंड के लोगों ने इस बात को अपमानजनक माना और पूरी तरह से खारिज कर दिया। राष्ट्रपति ट्रंप भले ही ग्रीनलैंड को जीतने के लिए कुछ भी कर जाने के तैयार दिख रहे हों, लेकिन ग्रीनलैंड की जनता और यूरोपीय देश इस पर राजी नहीं दिखते। ट्रंप के ग्रीनलैंड प्रस्ताव के विरोध में यूरोपीय देश खड़े हुए हैं। प्रतीकात्मक रूप से ही सही लेकिन जर्मनी, फ्रांस, ब्रिटेन जैसे देशों ने अपनी सेना को ग्रीनलैंड में भेजा है। इससे नाराज ट्रंप ने इन देशों के ऊपर 10 फीसदी अतिरिक्त टैरिफ का ऐलान किया है। इतना ही नहीं, यह भी कहा कि अगर यह देश नहीं मानते तो जून से यह टैरिफ 25 फीसदी हो जाएगा।



