छोटे और मध्यम उद्योग संकट में, ईरान युद्ध से फिरोजाबात का कांच उद्योग भी प्रभावित

नई दिल्ली : फिरोजाबाद में करीब 200 छोटे और मध्यम उद्योगों का अस्तित्व गैस संकट के कारण खतरे में हैं। कई फैक्ट्रियों ने उत्पादन कम कर दिया है या बंद कर दिया है। इससे हजारों कामगारों की रोजी-रोटी पर असर पड़ रहा है। ब्लूमबर्ग की यह रिपोर्ट बताती है कि फिरोजाबाद का संकट कैसे पूरे देश की कई इंडस्ट्रीज को प्रभावित कर रहा है।
बेंगलुरु की कंपनी Mossant Craft Kombucha के को-फाउंडर शिशिर साथ्यान पिछले एक महीने से अपने प्रीमियम ड्रिंक्स के लिए कांच की बोतलें जुटाने में परेशान हैं। उनका कहना है कि बाजार में अब कांच के फ्लास्क मिल ही नहीं रहे हैं, जबकि गर्मियों में कोल्ड ड्रिंक की मांग सबसे ज्यादा होती है। बढ़ती लागत को संभालने के लिए कंपनी अब मार्केटिंग और डिस्काउंट बजट में कटौती करने पर मजबूर हो गई है।
देश में कांच की कमी की सबसे बड़ी वजह गैस संकट है। अमेरिका-ईरान युद्ध के कारण एनर्जी सप्लाई प्रभावित हुई है। सरकार ने घरेलू उपभोक्ताओं को प्राथमिकता देते हुए LPG और LNG की सप्लाई फैक्ट्रियों से हटाकर घरों की ओर मोड़ दी है। इसका सीधा असर कांच बनाने वाले उद्योगों पर पड़ा है, जो गैस पर निर्भर होते हैं।
पिछले 400 साल से कांच उद्योग का केंद्र रहा उत्तर प्रदेश का फिरोजाबाद इस संकट का सबसे बड़ा शिकार बना है। यहां के कारखाने नेचुरल गैस से चलते हैं। कांच बनाने की भट्टियां 1500°C तापमान पर लगातार चलती रहती हैं। अगर ये ठंडी पड़ जाएं तो दोबारा चालू करने में हफ्तों का समय और अरबों रुपये का खर्च लगता है।
गैस सप्लाई कम होने के कारण कई कंपनियों को उत्पादन 50% तक घटाना पड़ा है। कांच की कीमतें 20% तक बढ़ गई हैं। कई कंपनियों ने नए ऑर्डर लेना बंद कर दिया है और विस्तार योजनाएं रोक दी गई हैं। ग्लोबल कंपनियों को सप्लाई करने वाले उद्योग भी इस संकट से जूझ रहे हैं।
कांच की कमी का असर सिर्फ बोतलों तक सीमित नहीं है। दूध की बोतलें, जैम के जार, दवाइयों की शीशियां, कॉस्मेटिक पैकेजिंग, सबकी सप्लाई प्रभावित हुई है। कुछ कंपनियों को पैकेजिंग लागत 30% तक बढ़ानी पड़ी है। एस आर ग्लास के प्रबंध निदेशक प्रांजल मित्तल को उम्मीद है कि कांच उत्पादन में यह रुकावट महीनों तक चलेगा। उनका कहना है, “अगर युद्ध एक सप्ताह बढ़ता है, तो हमारा कारोबार एक महीने के लिए गड़बड़ा जाता है। इसका मतलब है कि अभी अगले चार महीने बिगड़ चुके हैं।”
भारत अपनी गैस जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है। लगभग 50% नेचुरल गैस आयात होती है। करीब 40% LNG सिर्फ कतर से आता है। LPG का लगभग 90% आयात मिडिल-ईस्ट से होता है। यही वजह है कि वैश्विक संकट का सीधा असर घरेलू उद्योगों पर पड़ रहा है।
रेस्टोरेंट और शादी सीजन भी प्रभावित: गैस की कमी का असर सिर्फ उद्योगों तक सीमित नहीं है। रेस्टोरेंट, ढाबे और छोटे फूड बिजनेस भी LPG की कमी से जूझ रहे हैं। इसका असर शादी सीजन और रोजमर्रा की जिंदगी पर भी दिख रहा है।
जल्दी राहत की उम्मीद कम: हालांकि सीजफायर की घोषणा हुई है, लेकिन एक्सपर्ट्स का मानना है कि हालात जल्द सामान्य नहीं होंगे। ग्लास इंडस्ट्रीज से जुड़े कारोबारी मानते हैं कि अगर युद्ध एक हफ्ता भी बढ़ता है, तो इसका असर कई महीनों तक चलता है।



