स्मृतियों के झरोखों से गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर

विवेक ओझा

जन्म दिवस विशेष

स्तम्भ: आज 7 मई के दिन ही भारत भूमि की सामाजिक, सांस्कृतिक उर्वरता के नायक रवीन्द्र नाथ टैगोर का जन्मदिवस है। वैसे तो गुरुदेव रवीन्द्र को याद करने और लिखने के लिए शब्दों और संदर्भों की कमी उन्होंने छोड़ी नही है लेकिन सबसे पहले उनकी उपमाओं की बात करते हैं। वे महान मानवतावादी, वैश्विक सद्भाव और समरसता के चिंतक , सृजक थे। तर्क , औचित्य और वैज्ञानिक संवेगों से भरे थे। सबसे पहले मैं उनकी नोबेल पुरस्कार प्राप्त कृति गीतांजलि पर आप सबका ध्यान दिलाना चाहूंगा। गीतांजलि की अद्भुत वैचारिक यात्रा मनमोहक है। 1913 में जब गुरुदेव रवींद्र नाथ टैगोर को गीतांजलि के लिए नोबेल पुरस्कार मिलने वाला था उसके एक वर्ष पहले गीतांजलि की मूल पांडुलिपि उनसे इंग्लैंड की यात्रा करने के दौरान कहीं खो गई।

1912 में इस महान कवि ने लंदन की यात्रा करने का निर्णय किया था ताकि वह कलाकार विलियम रोथेंस्टीन को गीतांजलि की अंग्रेजी पांडुलिपि दिखा सकें जिससे कि रोथेंस्टीन आयरिश कवि डब्ल्यू.बी यिट्स से रवीन्द्र की कविताओं के संग्रह गीतांजलि के लिए इंट्रोडक्शन लिखने के लिए कह सकें। 15 जून , 1912 को गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर ने अपने पुत्र रथिंद्रनाथ और पुत्रवधू प्रतिमा देवी के साथ रोथेंस्टीन से मिलने के लिए डोवर से लंदन के लिए ट्रेन पकड़ी।

रवीन्द्र के पास उनकी पांडुलिपि उनकी एक अटैची में सुरक्षित रखी थी। उनके साथ इस यात्रा में उनके एक मित्र और त्रिपुरा के राजघराने के सम्मानित सदस्य सौमेंद्र देब बर्मन भी थे। लंदन पहुंचने पर इन लोगों ने अंडरग्राउंड ट्रेन पकड़ी और इतने में एक स्टेशन पर वो अपनी अटैची भूल गए और उस होटल की तरफ बढ़ चले जो रोथेंस्टीन ने उनके लिए बुक कराया था। इस बात की पुष्टि विश्व भारती के आर्ट फैकल्टी के डीन और टैगोर की यात्रा वृत्तांतों के विशेषज्ञ अमृतासुधन भट्टाचार्य ने भी की है। रतिंद्रनाथ वर्ष 1902 से ही अपने पिता से छुट्टियां मनाने के लिए कहीं बाहर जाने का निवेदन कर रहे थे और यह इसलिए भी था कि अपनी पत्नी मृणालिनी देवी की मौत के बाद रवींद्रनाथ टैगोर अधिकांश समय शांतिनिकेतन में ही बिताने लगे थे।

1912 को रोथेंसटीन से निर्धारित मीटिंग के तुरंत पहले टैगोर को यह एहसास हुआ की उनकी अटैची कहीं खो गई है। उन्होंने इसे खोजने का अथक प्रयास किया लेकिन कोई परिणाम ना निकला। रथींद्रनाथ लगातार पुलिस को भी फोन कर रहे थे कि इसका पता चल सके जबकि टैगोर ने उन्हें शांत करते हुए कहा कि अमार ओबोस्था ओनू मेयो (तुम मेरी दशा समझ सकते हो)।

नाथ टैगोर ने अपने पुत्र से लंदन ट्यूब रेलवे की लास्ट प्रॉपर्टी ऑफिस में जाकर किस्मत आजमाने की बात कही और रतिंद्रनाथ वहां गए और उन्हें अटैची वहां पर मिल गई जिसमें उनकी पांडुलिपि सुरक्षित पड़ी हुई थी। रतिंद्रनाथ ने वहां पहुंच कर कहां, ” मझे मझे एकटा दुस्वोपनेर मोटो भाई , जोदी इंग्रेजी गीतांजलि अमार ओमोनोजोग- गाफिलोतीर दोरून हारिये जेतो , ताहोले (मुझे लगातार यह दुस्वप्न था कि मेरी लापरवाही की वजह से गीतांजलि का अंग्रेजी संस्करण यदि खो गया होता, तो …..)

इसके बाद अगले दिन रविंद्र नाथ टैगोर इंग्लिश पेंटर और समीक्षक रोथेंसटीन से मिले और विलियम बटलर यीट्स ने गीतांजलि के लिए सुप्रसिद्ध भूमिका लिखी । उस वर्ष नवंबर माह में 103 कविताओं के उनके संग्रह का सीमित संस्करण लंदन इंडिया सोसायटी द्वारा प्रकाशित हुआ था और मार्च, 1913 में गीतांजलि को मैकमिलन द्वारा प्रकाशित किया गया । नवंबर, 1913 में इसे साहित्य के नोबेल पुरस्कार से नवाजा गया।

जहां चित्‍त भय से शून्‍य हो
जहां हम गर्व से माथा ऊंचा करके चल सकें
जहां ज्ञान मुक्‍त हो
जहां दिन रात विशाल वसुधा को खंडों में विभाजित कर
छोटे और छोटे आंगन न बनाए जाते हों
जहां हर वाक्‍य ह्रदय की गहराई से निकलता हो
जहां हर दिशा में कर्म के अजस्‍त्र नदी के स्रोत फूटते हों
और निरंतर अबाधित बहते हों
जहां विचारों की सरिता
तुच्‍छ आचारों की मरू भूमि में न खोती हो
जहां पुरूषार्थ सौ सौ टुकड़ों में बंटा हुआ न हो
जहां पर सभी कर्म, भावनाएं, आनंदानुभुतियाँ तुम्‍हारे अनुगत हों
हे पिता, अपने हाथों से निर्दयता पूर्ण प्रहार कर
उसी स्‍वातंत्र्य स्‍वर्ग में इस सोते हुए भारत को जगाओ

(1931 में प्रकाशित रवीन्द्नाथ टैगोर के कालजयी काव्य संग्रह ‘गीतांजलि’ की एक कविता)


वन्देमातरम जैसा अप्रतिम गान दिया रवीन्द्र ने 

आनंदमठ’ उपन्यास में प्रकाशित बंकिम चंद्र चटर्जी के कालजयी गीत के दो छंद राष्ट्रगीत के रूप में स्वीकार किए गए हैं। इसमें अपनी मातृभूमि की वंदना की गई है। मातृभूमि पर गर्व किया गया है। गीत के प्रथम दो छंद मातृभूमि और उसके उपहारों के बारे में जानकारी देते हैं। रवींद्रनाथ टैगोर ने इस गीत को स्वरबद्ध किया और पहली बार वर्ष 1896 में कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में यह गीत गाया गया। उस समय कांग्रेस के अध्यक्ष रहीमतुल्ला सयानी थे । अरबिंदो घोष ने इस गीत का अंग्रेजी में और आरिफ मोहम्मद खान ने इसका उर्दू में अनुवाद किया था ।

इस गीत पर विवाद होने के चलते वर्ष 1937 में कांग्रेस ने इस पर गंभीर चिंतन किया। जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में कमेटी बनाई गई, जिसमें मौलाना अबुल कलाम आजाद भी शामिल थे। उन्होंने पाया कि इस गीत के शुरुआती दो पद मातृभूमि की प्रशंसा में कहे गए हैं। वही मातृभूमि जिसे मुस्लिम समुदाय के लोग मादरे वतन और अंग्रेज होली लैंड कहते हैं। देश की आजादी के बाद डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने संविधान सभा में 24 जनवरी 1950 में वंदे मातरम को राष्ट्रगीत के रूप में अपनाने संबंधी वक्तव्य को पढ़ा, जिसे स्वीकार कर लिया गया।

संविधान सभा को दिया गया वक्तव्य था

शब्दों व संगीत की वह रचना जिसे जन गण मन से संबोधित किया जाता है, भारत का राष्ट्रगान है, बदलाव के ऐसे विषय, अवसर आने पर सरकार अधिकृत करे और वंदे मातरम गान, जिसने कि भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में ऐतिहासिक भूमिका निभाई है, को जन गण मन के समकक्ष सम्मान व पद मिले। मैं आशा करता हूं कि यह सदस्यों को संतुष्ट करेगा।

जन गण मन के सृजनकर्ता थे रवीन्द्र

जन गण मन अधिनायक जय हे, रवीन्द्र द्वारा सृजित किया गया था। पहली बार 27 दिसंबर, 1911 को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन के दूसरे दिन का काम शुरू होने से पहले इसे गाया गया था। ‘अमृत बाज़ार पत्रिका’ में यह बात साफ़ तरीके से अगले दिन प्रकाशित की गई थी ।

पत्रिका में कहा गया कि कांग्रेसी जलसे में दिन की शुरुआत गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा रचित एक प्रार्थना से की गई। ‘बंगाली’ नामक अख़बार में ख़बर प्रकाशित हुई थी कि दिन की शुरुआत गुरुदेव द्वारा रचित एक देशभक्ति गीत से हुई।  टैगोर का यह गीत संस्कृतनिष्ठ बांग्ला-भाषा में था, यह बात ‘बॉम्बे क्रॉनिकल’ नामक अख़बार में भी प्रकाशित की गईं थी।

गौरतलब है कि ये वही वर्ष था  जब अंग्रेज़ सम्राट जॉर्ज पंचम अपनी पत्नी के साथ भारत के दौरे पर आए हुए थे। तत्कालीन वायसरॉय लॉर्ड हार्डिंग्स के कहने पर जॉर्ज पंचम ने बंगाल के विभाजन को निरस्त कर दिया था और उड़ीसा को एक अलग राज्य का दर्जा दे दिया था। इसके लिए कांग्रेस के अधिवेशन में जॉर्ज की प्रशंसा भी की गई और उन्हें धन्यवाद भी दिया गया।

‘जन गण मन’ के बाद जॉर्ज पंचम की प्रशंसा में भी एक गाना गाया गया था। सम्राट के आगमन के लिए यह दूसरा गाना रामभुज चौधरी द्वारा रचा गया था। उस समय यह भी कहा गया कि रवींद्र ने सम्राट के गुणगान में यह गीत लिखा है । टैगोर ने 1912 में ही स्पष्ट कर दिया कि गाने में वर्णित ‘भारत भाग्य विधाता’ के केवल दो ही मतलब हो सकते हैं : देश की जनता, या फिर सर्वशक्तिमान ऊपर वाला—चाहे उसे भगवान कहें, चाहे देव। टैगोर ने वर्ष 1939 में एक पत्र में फिर लिखा, ”मैं उन लोगों को जवाब देना अपनी बेइज़्ज़ती समझूँगा जो मुझे इस मूर्खता ( सम्राट के गुणगान में जन मन गण की रचना ) के लायक समझते हैं। “

गुरुदेव ने इसी दौरान एक छोटी सी पुस्तक भी प्रकाशित की थी जिसका शीर्षक था ‘नेशनलिज़्म’। यहाँ उन्होंने अपने गीत ‘जन गण मन अधिनायक जय हे’ की तर्ज़ पर यह समझाया कि सच्चा राष्ट्रवादी वही हो सकता है जो दूसरों के प्रति आक्रामक न हो।

गांधी के आलोचक और मुरीद दोनों थे रवींद्रनाथ टैगोर

वर्ष 1915 के मार्च महीने में गांधी और टैगोर की पहली मुलाकात शांतिनिकेतन में हुई थी। महात्मा गांधी को महात्मा की उपाधि रवीन्द्र नाथ टैगोर ने दी थी और रवीन्द्र नाथ टैगोर को गुरुदेव की उपाधि गांधी जी ने दी थी। जिस दौर में गांधी रवींद्र नाथ टैगोर से मिले उस वक्त उनका स्वास्थ्य खराब चल रहा था। डाक्टरों ने उन्हें पूर्ण विश्राम करने का परामर्श दिया था। टैगोर के शुभचिंतक भी चिकित्सकों के परामर्श को मानने के लिए उन्हें कहते रहते थे पर वह अपने आपको काम करने से रोक नहीं पाते थे। संयोगवश उसी दौरान महात्मा गांधी की उनसे मुलाकात हुई। उन्हें भी पता चला कि टैगोर डाक्टरों के कहने के बावजूद आराम नहीं करते।

मिलने पर उन्होंने टैगोर से कहा, ”गुरुदेव, मैं आपके पास भिक्षा मांगने आया हूं और आपको वह देनी ही पड़ेगी। गुरुदेव ने पहले इसे बापू का मजाक समझा। बोले, ”जो स्वयं भिक्षुक हो, वह किसी को क्या दे सकता है? पर गांधी जी की गंभीरता देखकर उन्होंने पूछा, ”आखिर भिक्षा में आपको क्या चाहिए? महात्मा गांधी ने कहा, ”आप भोजन करने के बाद प्रतिदिन एक घंटा पूर्ण विश्राम करेंगे। उस दौरान कोई काम नहीं करेंगे, यही मेरी भिक्षा है।

गुरुदेव वचन में बंध चुके थे। गांधी जी की बात मानने के अतिरिक्त उनके पास कोई चारा नहीं था। सो उन्हें सहमति जतानी पड़ी। अब गुरुदेव प्रतिदिन भोजन करने के बाद एक घंटा पूरी तरह विश्राम करते थे। इस नियम को वह भंग नहीं होने देते थे। उनकी यह दिनचर्या जारी थी। एक दिन अचानक आचार्य क्षितिमोहन सेन उनसे मिलने उनके घर पहुंचे। संयोग से वह समय उनके आराम करने का था। क्षितिमोहन सेन के आने की खबर उन्हें लग गई।

कदमों की आहट पाकर गुरुदेव ने कमरे में बैठे-बैठे पूछा, ”ठाकुर दादा आए हैं क्या? इस पर क्षितिमोहन सेन ने कहा, ”हां, पर आप कमरे में ऐसा क्या कर रहे हैं, जो स्वागत की परंपरा भी भूल गए ? रबींद्रनाथ टैगोर ने कहा, ”दादा, अकारण ही कमरे में नहीं बैठा हूं। इस समय मैं गांधी जी को भिक्षा दे रहा हूं। तब तक क्षितिमोहन सेन उनके कमरे में आ गए। भिक्षा का राज जान कर वह हंस पड़े।

महात्मा गांधी जब दक्षिण अफ्रीका में सत्याग्रह का सफल प्रयोग कर रहे थे, तो उन्हें भारत लाने के लिए सीएफ एन्ड्र्यूज को अफ्रीका भेजने वाले गोपाल कृष्ण गोखले और रवीन्द्रनाथ टैगोर ही थे वर्ष 1934 में गांधी और टैगोर के बीच एक वैचारिक मतभेद दिखा। जब बिहार में भयानक भूकंप आया और बड़ी तबाही हुई। महात्मा गांधी ने तमिलनाडु में एक सार्वजनिक सभा में कहा कि यह दलितों के प्रति छुआछूत के पाप का ईश्वरीय दंड है। टैगोर ने गांधी के इस वक्तव्य को घोर अंधविश्वास का नमूना करार दिया। उन्होंने भूकंप के पीछे के इस तर्क को अवैज्ञानिक करार दिया और एक व्यंग्यपरक लेख लिखा जिसे स्वयं महात्मा गांधी ने 16 फरवरी, 1934 को अपने जवाब के साथ ‘यंग इंडिया’ में प्रकाशित किया।

टैगोर ने लिखा था कि इस तरह का तर्क तो महात्माजी के विरोधियों को ही शोभा देता है। दरअसल, गांधी के इस बयान के बाद सनातनियों की ओर से भी तरह-तरह के बयान आने शुरू हो गए थे। किसी सनातनी ने कहा कि देश में जो सूखे और अकाल पड़ते हैं वे दरअसल गांधी के छूआछूत-विरोधी आंदोलनों के ही दुष्परिणाम हैं।

किसी ने कहा कि इससे पहले कि भूकंप के लिए गांधीजी के आंदोलनों को दोषी ठहराया जाता, उन्होंने सवर्णों को इसके लिए दोषी ठहराकर बढ़त बना ली है।

गांधी ने टैगोर के संबंध में जवाबी लेख भी छापा जिसका शीर्षक था- ‘अंधविश्वास बनाम श्रद्धा’. इसमें उन्होंने लिखा – ‘मेरे इस मंतव्य पर कि बिहार के संकट का संबंध अस्पृश्यता के पाप से है, गुरुदेव ने अभी-अभी जो कुछ कहा है उससे हमारे पारस्परिक स्नेह में कोई अंतर नहीं आ सकता। उनके प्रति जो मेरे मन में अगाध सम्मान है उसके कारण यह स्वाभाविक है कि मैं अन्य आलोचकों की अपेक्षा उनकी आलोचना की ओर और ज्यादा तत्परतापूर्वक ध्यान दूंगा। किंतु उनके वक्तव्य को तीन बार पढ़ जाने के बावजूद मैं इन स्तंभों में लिखी अपनी बातों पर कायम हूं। गांधीजी ने इसी लेख में आगे लिखा- ‘…बड़े-से-बड़े वैज्ञानिक या दार्शनिक का ज्ञान भी धूल के कण जितना ही है…गुरुदेव की तरह मैं भी यह मानता हूं कि ‘अटल विधान को कोई नहीं बदल सकता’। कारण कि ईश्वर और उसका विधान एक ही है। किंतु मुझे स्वीकार करना चाहिए कि उस नियम को या उन नियमों को हम पूरी तरह से नहीं जानते, और जो चीज हमें विपत्ति-सी लगती है, वह वैसी इसलिए लगती है कि हम विश्व-नियमों को भली-भांति नहीं जानते. …बेशक, सनातनियों को भी यह कहने का पूरा अधिकार है कि यह अस्पृश्यता के विरुद्ध मेरे प्रचार करने के अपराध का दंड था. …मैं गुरुदेव की तरह यह नहीं मानता कि ‘हमारे अपने पाप और भूलें चाहे जितनी बड़ी हों, उनमें इतनी शक्ति नहीं है कि वे सृष्टि के ढांचे को नष्ट-भ्रष्ट कर दें। इसके विपरीत, मेरा विश्वास यह है कि हमारे पापों में उस ढांचे को नष्ट कर देने की इतनी शक्ति है जितनी किसी निरे प्राकृतिक व्यापार में नहीं है।

टैगोर ने विदेशी वस्त्रों के बहिष्कार और उन्हें जलाने की गांधी की मुहीम का भी विरोध किया था , उन्होंने असहयोग आंदोलन का भी विरोध किया क्योंकि वे पूरब तथा पश्चिम की आध्यात्मिक एकता के सूत्र तलाश रहे थे।

अंग्रेजी शिक्षा पर गांधी के विचारों को एक अवसर पर पूर्वाग्रही बताते हुए टैगोर ने कहा था कि आधुनिक शिक्षा को तुच्छ ठहराने के अपने अंध-आवेश में महात्मा गांधी ने राममोहन राय जैसे आधुनिक भारत के महान व्यक्तित्वों का जो अपमान किया है, मैं उसका कड़ा विरोध करता हूं। यह दिखाता है कि वे अपने सिद्धांतों के प्रति आत्ममुग्ध होते जा रहे हैं जो कि अहंकार का ही एक खतरनाक रूप है और महान से महान लोग भी कभी-कभी इसका शिकार हो जाते हैं।”

दरसअल 27 अप्रैल, 1921 को ‘यंग इंडिया’ में गांधीजी ने अंग्रेजी शिक्षा पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा था कि मेरी यह सोची-समझी राय है कि अंग्रेजी शिक्षा जिस ढंग से दी गई है उसने अंग्रेजी पढ़े-लिखे भारतीयों को नामर्द बना दिया है। उसने भारतीय विद्यार्थियों के दिमागों पर एक भारी बोझ डाल दिया है और हम लोगों को नकलची बना दिया है। राममोहन राय को यदि अंग्रेजी में सोचने और अपने विचार व्यक्त करने का झंझट नहीं होता तो वे और भी बड़े सुधारक बन सकते थे। यही बाधा यदि लोकमान्य तिलक के आड़े नहीं आती तो वे और भी बड़े विचारक सिद्ध होते। मैं तो मानता हूं कि चैतन्य, कबीर, नानक, गुरू गोबिंदसिंह, शिवाजी और प्रताप हमारे राममोहन राय और तिलक से कहीं बड़े थे।

चरखा और खादी के प्रश्न पर भी गांधी टैगोर के मतभेद स्पष्ट रूप में सामने आए। टैगोर को गांधी का खादी और चरखे का अति महिमामंडन पसंद नहीं आया और उन्होंने इसकी आलोचना करते हुए सितंबर, 1925 में एक लंबा लेख लिखा था जिसका शीर्षक था- ‘दी कल्ट ऑफ चरखा’। अब महात्मा गांधी की बारी थी जवाब देने की और उन्होंने 5 नवंबर, 1925 के ‘यंग इंडिया’ में ‘कवि-गुरु और चरखा’ शीर्षक से एक लेख लिखकर उन आलोचनाओं का जवाब दिया था।

गांधी ने लिखा- ‘…मुझे इतनी बातें इसलिए कहनी पड़ीं कि मैंने ऐसी अफवाह सुनी कि इस आलोचना का मुख्य कारण ईर्ष्या ही है। ऐसी निराधार शंकाएं दुर्बलता और असहिष्णुता की द्योतक हैं। जरा ध्यान से सोचने पर स्पष्ट हो जाएगा कि यह हृदयहीन आरोप बिल्कुल निराधार है। मुझमें ऐसा क्या है जिससे कवि-गुरु मुझसे ईर्ष्या करेंगे। ईर्ष्या के लिए पहले प्रतिद्वंद्विता की संभावना होनी चाहिए। सो मैं तो अपने जीवन में कभी एक तुकबंदी भी नहीं कर पाया हूं।’

रवीन्द्र नाथ टैगोर और आइंस्टीन के मैत्री संबंध

14 जुलाई 1930 को गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर प्रसिद्ध वैज्ञानिक आइंस्टाइन से बर्लिन के पास कापुथ गांव में मिले। जर्मनी उन्हें मानव-धर्म पर बोलने के लिए ऑक्सफर्ड विश्वविद्यालय ने बुलाया था। गुरुदेव से मिलने पर आइंस्टाइन ने गुरुदेव से पूछा, ‘क्या दुनिया से अलग कोई दैवी शक्ति होती है?’ इस सवाल पर टैगोर तुरंत बोले, ‘अलग नहीं। संसार में ऐसा कुछ भी नहीं है जिसे इंसान के व्यक्तित्व में शामिल नहीं किया जा सकता। इस दुनिया का सत्य असल में मानवीय सत्य ही है।’

आइंस्टाइन ने कहा कि आप जो कह रहे हैं, वह दुनिया के बारे में पूरी तरह से मानवीय धारणा है। मगर विज्ञान इसके परे जाकर भी सोचता है। आइंस्टीन के यह कहने पर गुरुदेव मुस्कुराए और बोले, ‘जैसे कोई चीज प्रोटॉन और इलेक्ट्रॉन से मिलकर बनती है, लेकिन उसके बीच में एक खाली जगह भी होती है, जो इन्हें जोड़ती है। वैसे ही मानवता व्यक्तियों का समूह होती है, लेकिन मानवीय संबंध इसे आपस में जोड़े रखते हैं। पूरी दुनिया हर एक शख्स के साथ जुड़कर मानवीय होती है।’

इस पर आइंस्टाइन बोले, ‘तब तो इंसान से अलग कुछ भी नहीं है!’ गुरुदेव ने कहा, ‘बिलकुल, हम सबसे अलग कोई दुनिया नहीं है। सच यही है कि इस दुनिया से इतर किसी और दुनिया का अस्तित्व नहीं है।’ रविबाबू के इस जवाब पर थोड़ा सोचते हुए आइंस्टाइन बोले, ‘मानवीयता के बारे में मैं आपसे सहमत हूं, लेकिन जिसे आप सच कह रहे हैं, उसे मैं नहीं मानता।’

रचनाकार रवीन्द्र

गुरुदेव विश्वविख्यात कवि, साहित्यकार, दार्शनिक और भारतीय साहित्य के एकमात्र नोबल पुरस्कार विजेता हैं। वे एशिया के प्रथम नोबेल पुरस्कार सम्मानित व्यक्ति हैं। वे एकमात्र कवि हैं जिसकी दो रचनाएँ दो देशों का राष्ट्रगान बनीं-भारत का राष्ट्र-गान जन गण मन और बाँग्लादेश का राष्ट्रीय गान आमार सोनार बाँग्ला गुरुदेव की ही रचनाएँ हैं। आँख की किरकिरी, नाव दुर्घटना, घर और बाहर, योगायोग, गोरा, कुलवधू उनके प्रमुख उपन्यास हैं। जीवित और मृत, क्षुधित पाषाण, नष्टनीड़, समाज का शिकार, भिखारिन, काबुलीवाला, पाषाणी, रामकन्हाई की मूर्खता, दीदी, माल्यदान, चोरी का धन, रासमणि का बेटा, विद्रोही, मुन्ने की वापसी उनकी सर्वश्रेष्ठ कहानियां हैं।