
नई दिल्ली। मुख्यमंत्री और उपराज्यपाल के बीच अधिकार की लड़ाई के साथ-साथ ‘दिल्ली का बिग बॉस कौन’ पर छिड़ी जंग में दिल्ली सरकार को झटका लगा है। दिल्ली हाईकोर्ट ने गुरुवार को अपने ऐतिहासिक फैसले में कहा कि उपराज्यपाल दिल्ली सरकार के इशारों पर काम करने को बाध्य नहीं है।
कोर्ट ने अपने अहम फैसले में आगे कहा है कि उपराज्यपाल दिल्ली सरकार के हर सुझाव-परामर्श व आदेश को मानने के लिए बाध्य नहीं है।
दिल्ली में उप राज्यपाल और मुख्यमंत्री के बीच की लड़ाई अधिकार की लड़ाई को लेकर गुरुवार को दिल्ली हाईकोर्ट में अलग-अलग याचिकाओं पर सुनवाई हुई। ये याचिकाएं दिल्ली सरकार के अधिकारों, केंद्र सरकार के अधिकारों और उपराज्यपाल के अधिकारों को साफ करने को लेकर दायर की गई थीं।
दिल्ली की हुकूमत को लेकर चल रही है जंग
23 सितंबर 2015 को मुख्य न्यायाधीश जी रोहिणी व न्यायमूर्ति जयंत नाथ की खंडपीठ ने सीएनजी फिटनेस घोटाले की जांच के लिए गठित न्यायिक आयोग को चुनौती देने, उपराज्यपाल द्वारा दानिक्स अधिकारियों को दिल्ली सरकार के आदेश न मानने, एसीबी के अधिकार को लेकर जारी केंद्र सरकार की अधिसूचना व डिस्कॉम में निदेशकों की नियुक्ति को चुनौती समेत अन्य समेत कुल एक दर्जन मामलों में रोजाना सुनने का फैसला किया था। इस पर आज फैसला आएगा।
गौरतलब है कि इससे पहले सुप्रीम कोर्ट से अरविंद केजरीवाल सरकार को बड़ा झटका लग चुका है। कोर्ट ने उस याचिका को खारिज कर दिया था, जिसमें दिल्ली सरकार ने दिल्ली हाई कोर्ट को दिल्ली सरकार और केंद्र सरकार के बीच शक्तियों की व्याख्या पर फैसला देने से रोकने की अपील की थी। दिल्ली सरकार ने कहा था कि हाईकोर्ट को एलजी और दिल्ली सरकार के मसले सुलझाने का अधिकार नहीं है। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने दखल देने से इनकार कर दिया था।
ये है LG-CM में विवाद
तबादलों पर भिड़े थे केजरीवाल-उपराज्यपाल
उपराज्यपाल नजीब जंग से केजरीवाल सरकार का विवाद तो पिछली आप की सरकार के ही समय से है। संयोग आसा बन रहा है कि जो विवाद शुरू हो रहा है उसका समादान हुए बिना ही नया विवाद शुरू हो जा रहा है। अधिकारियों के तबादले आदि पर चला विवाद अदालत से ही सुलझेगा, लेकिन इस विवाद ने दिल्ली के अधिकारियों को एक दूसरे का विरोधी बना दिया।
दो-दो एसीबी पर भिड़ंत
– आज के फैसले से दो-दो एसीबी(भ्रष्टाचार निरोधक शाखा) के प्रमुख का विवाद सुलझेगा। एक तरफ मीणा नए हेल्प लाइन की घोषणा करते हैं दूसरे तरफ सरकार ऐसा करने पर उनके खिलाफ कारवाई करने की चेतावनी दे रहा था।
– दिल्ली महिला आयोग का विवाद भी उसी तरह का है। बिना उपराज्यपाल की मंजूरी के स्वाती मालीवाल को दिल्ली महिला आयोग के अध्यक्ष पर विवाद होने पर दो दिन बाद सरकार ने जिस तरह से उप राज्यपाल की मंजूरी के लिए नाम भेजा था।
यह भी है मुद्दा
आजादी के बाद मार्च 1952 में महज दस विषयों के लिए 48 सदस्यों वाली दिल्ली को विधान सभा दी गई थी।1955 में राज्यपुर्नगठन आयोग बनने के बाद दिसल्ली की विधान सभा भंग कर दी गई। 1958 में दिल्ली नगर निगम अधिनियम के तहत दिल्ली में नगर निगम बनी।
प्रशासनिक सुधार आयोग की 1966 में रिपोर्ट आने के बाद 61 सदस्यों वाली महानगर परिषद बनी जिसे 1987 में भंग करके दिल्ली को नया प्रशासनिक ढांचा देने के लिए बनी बालकृष्ण कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर 1993 में पुलिस और जमीन के बिना विधान सभा दी गई। तभी इस पर गंभीरता से चर्चा होनी चाहिए थी कि आखिर चुनी हुई सरकार बनने के बाद मुख्यमंत्री के बजाए उप राज्यपाल का शासन क्यों होना चाहिए। जो लोग दिल्ली सरकार को बनाते हैं वे कुछ चीजों के लिए किसी और को जिम्मेदार क्यों मानें।