हिंदी पत्रकारिता : विचारों की सिकुड़ती जगह, राष्ट्रीयता का अभाव

-प्रो.संजय द्विवेदी

स्तम्भ : हिंदी पत्रकारिता की गर्भनाल आजादी के आंदोलन से जुड़ी है तो इसका नेतृत्व हिंदी साहित्य के निर्माताओं के हाथ में रहा है। एक तरफ लोकमान्य तिलक, महात्मा गांधी, बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर जैसे अनेक राष्ट्रनायक पत्रकारिता के माध्यम से लोकजागरण में लगे थे तो दूसरी ओर भारतेंदु हरिश्चंद्र, महावीर प्रसाद द्विवेदी, बाबूराव विष्णु पराड़कर, माखनलाल चतुर्वेदी जैसे हिंदी के निर्माता भाषा की अलख जगा रहे थे।

साथ निभाना साथिया में मुख्य किरदार निभाने वाले हर्ष नागर ने सीखी गुजराती

समाचारों के साथ विचार इनकी पत्रकारिता का मूल पिंड था। विचारों के माध्यम से समाज सुधार, सामाजिक आंदोलन, भाषा का विकास और देश के लोगों को संकट भी सामने आते थे। यह यात्रा आगे चलकर भी जारी रही जब सच्चिदानंद हीरानंद वात्सायन अज्ञेय, रघुवीर सहाय, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, धर्मवीर भारती,राहुल बारपुते, राजेंद्र माथुर, प्रभाष जोशी, माणिकचंद्र वाजपेयी, अटलबिहारी वाजपेयी, भानुप्रताप शुक्ल, वचनेश त्रिपाठी, रामबहादुर राय, प्रबाल मैत्र, राजेंद्र शर्मा, जयकिशन शर्मा और जयकृष्ण गौड़ जैसे अनेक यशस्वी संपादक सामने आते हैं।

समाचारों के साथ विचार का पृष्ट हिंदी अखबारों का यश बढ़ाता रहा और समाज को विमर्श के बिंदु देता रहा। राष्ट्रीय भावना के साथ लोकमंगल इस दौर की पत्रकारिता का मूल्य रहा है। राष्ट्रीय भाव से भरी पत्रकारिता और देश के नवनिर्माण का स्वप्न ही पत्रकारिता का लक्ष्य रहा है। राष्ट्रीय आंदोलन के भावों से अनुप्राणित यह पत्रकारिता हमें प्रेरित, प्रोत्साहित और आंदोलित करती रही है।

उदारीकरण के बाद आए बदलाव

1991 के बाद उदारीकरण की आंधी ने अखबारों और पत्र-पत्रिकाओं को पूरी तरह बदल दिया। हिंदी अखबार जो अपनी वैचारिक चिंताओं से समाज में नए विमर्शों के वाहक बनते थे अचानक रंगीन और सुदर्शन तो हो उठे। उनकी पृष्ठ संख्या बढ़ गयी किंतु वहां विचारों के लिए, साहित्य के लिए, संस्कृति के जगह सिकुड़ गयी। अपने ही भाषा के प्रति हीन भाव इतना कि हिंदी के अखबार हिंग्लिश परोसने लगे और पूरे के पूरे एक वाक्य में कई अंग्रेजी शब्दों के प्रयोग से उन्हें कोई हिचक नहीं थी। यह एक नया अखबार था जो बाजार की बाधाएं हटा रहा था, अंग्रेजी न जानने के हीनताबोध से भरे पाठक को हिंग्लिश पढ़ाकर ‘स्मार्ट’ बना रहा था।

भाषा विचारों की वाहक होती है। भाषा और संस्कृति के साथ हो रहे व्यवहार से एक नई दुनिया बन रही थी जिसमें साहित्य, संस्कृति और भाषा की दुनिया के बड़े नाम अखबारों से दूर हो रहे थे। वहीं मूलतः अंग्रेजी में लिखने वाले लेखक और सेलिब्रिटीज संपादकीय पन्नों और फीचर पन्नों पर छपने लगे थे। विचार दारिद्रय और आत्मविश्वास से हीनता का इससे बड़ा उदाहरण शायद ही मिले। वहां भी विचार की श्रेष्ठता के आधार पर नहीं, लोग नामों और बिकाउपन के नाम पर छापे जा रहे थे। विचार के पन्ने पर नाम बड़े पर दर्शन थोड़े सा हाल हो गया।

विचारों की विविधता का अकाल

संकट यह है कि आज हिंदी जैसी महान भाषा में ज्ञान-विज्ञान के अनेक अनुशासनों पर हिंदी में मूल लेखन करने वालों का अकाल है। पर्यावरण, वन्य जंतु, खगोल शास्त्र, वैमानिकी, जलवायु परिर्वतन, जलसंकट, विज्ञान लेखन, आर्थिक मुद्दों जैसे अनेक विषयों पर हमें गँभीर लेखकों की जरूरत है। किंतु हिंदी में राजनीति और उससे उपजे संकटों पर लिखने वालों की तो भरमार है, किंतु वास्तविक मुद्दों पर कलम चलाने वाले बहुत कम नजर आते हैं। विचारों की यह दरिद्रता हमारे भाषा के अखबारों को बहुत पीछे खड़ा कर देती है। जबकि साज-सज्जा, प्रस्तुति और छाप-छपाई में वे दुनिया के बड़े अखबारों से कमतर नहीं हैं।

क्या कारण है कि हमारे हिंदी अखबारों में विचार अक्षमता साफ देखी जा रही है और भाषा के क्षरण के तो वे वाहक ही बन गए हैं। हमारी हिंदी पत्रकारिता का भाषाबोध कहां है बताने की जरूरत नहीं है। अपने जीवन और रोजगार की भाषा के ऐसी लापरवाही शायद ही किसी अन्य भाषा में मिले। जब हम भाषा के प्रति लापरवाह हो जाते हैं और हमारा व्यवहार अराजक हो जाता है तो उस भाषा में गंभीर शोध और अध्ययन ही नहीं विचार अभिव्यक्ति भी असंभव हो जाती है। अपने व्यापक प्रचार-प्रसार और लोक व्याप्ति के बाद भी अगर आप अपनी भाषा के प्रति सचेत नहीं हैं, उसे बरतना आपको नहीं आता तो आप विचार अभिव्यक्ति क्या करेंगे। शायद इसीलिए लाखों का प्रसार वाले अखबार भी वह असर नहीं छोड़ते जो बहुत सीमित प्रसारित दूसरी भाषा के अखबार छोड़ पाते हैं। साफ-सुथरी भाषा और उसके सौंदर्यबोध से अवगत हुए बिना आप बेहतर अभिव्यक्ति कर ही नहीं सकते।

हिंदी पत्रकारिता पर आरोप लग रहे हैं कि वह अपने समय के सवालों से कट रही है। उन पर बौद्धिक विमर्श छेड़ना तो दूर, वह उन मुद्दों की वास्तविक तस्वीर सूचनात्मक ढंग से भी रखने में विफल पा रही है तो यह सवाल भी उठने लगा है कि आखिर ऐसा क्यों है। अखबार अब पढ़े जाने के बजाए पलटे ज्यादा जा रहे हैं। पाठक एक स्टेट्स सिंबल के चलते घरों में अखबार तो बुलाने लगा है, किंतु वह इन अखबारों पर वक्त नहीं दे रहा है।

क्या कारण है कि ज्वलंत सवालों पर बौद्धिकता और विमर्शों का सारा काम अब अंग्रेजी अखबारों के भरोसे छोड़ दिया गया है? कम पाठक, सीमित स्वीकार्यता के बजाए अंग्रेजी के अखबारों में हमारी कलाओं, किताबों, फिल्मों और शेष दुनिया की हलचलों पर बात करने का वक्त है तो हिंदी के अखबार इनसे मुंह क्यों चुरा रहे हैं।

ज्वलंत मुद्दों पर खामोशी

आखिर हमारे हिंदी अखबारों के पाठक को क्यों नहीं पता होना चाहिए कि उसके आसपास के परिवेश में क्या घट रहा है। हमारे पाठक के पास चीजों के होने और घटने की प्रक्रिया के सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक पहलुओं पर विश्लेषण क्यों नहीं होने चाहिए? क्यों वह गंभीर विमर्शों के लिए अंग्रेजी या अन्य भाषाओं पर निर्भर हो? हिंदी क्या सिर्फ सूचना और मनोरंजन की भाषा बनकर रह जाएगी? अपने बौद्धिक विश्लेषणों, सार्थक विमर्शों के आधार पर नहीं, सिर्फ चमकदार कागज पर शानदार प्रस्तुति के कारण ही कोई पत्रकारिता लोकस्वीकृति पा सकती है?

आज का पाठक समझदार, जागरूक और विविध दूसरे माध्यमों से सूचना और विश्वेषण पाने की क्षमता से लैस है। ऐसे में हिंदी के अखबारों को यह सोचना होगा कि वे कब तक अपनी छाप-छपाई और प्रस्तुति के आधार पर लोगों की जरूरत बने रहेंगें। यह सोचने की जरूरत है कि आखिर हिंदी भाषी समाज को बौद्धिक रूप से दरिद्र बनाकर क्या हम इस महादेश की चिंताओं का समाधान कर पाएंगें? ज्ञान-विज्ञान के सभी अनुशासनों की अभिव्यक्ति में समर्थ हिंदी को कब तक हम सूचना, मनोरंजन और वोट मांगने की भाषा बनाकर रखेंगें? जरूरत इस बात की है कि हिंदी को सिर्फ लोकप्रिय बनाने के जतन के बजाए बौद्धिक विमर्शों की भाषा में बदल दिया जाए। यह काम सबसे अधिक पत्रकारिता के माध्यम से हो सकता है। क्योंकि पत्रकारिता ही ‘लोक’ तक बौद्धिक विमर्शों को ले जाती है साथ ही किसी समाज को जीवंत, प्राणवान और लोकतांत्रिक बनाती है।

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(लेखक भारतीय जनसंचार संस्थान, नई दिल्ली के महानिदेशक हैं)