Holi Kyu Manate Hain: होलिका दहन की कहानी तो जानते हैं, लेकिन रंगों वाली होली क्यों खेली जाती है? जानिए राधा-कृष्ण से जुड़ी पौराणिक कथा

फाल्गुन माह हिंदू पंचांग में बेहद खास माना जाता है। इसी महीने की पूर्णिमा तिथि को होलिका दहन किया जाता है और अगले दिन रंगों की होली खेली जाती है। होलिका दहन की कथा असुर राजा हिरण्यकश्यप और भगवान प्रह्लाद से जुड़ी है, जिसे अधिकांश लोग जानते हैं। लेकिन रंगों वाली होली की शुरुआत कैसे हुई, इसके बारे में कम ही लोग जानते हैं।
राधा-कृष्ण से जुड़ी है रंगों की होली की परंपरा
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, रंगों से होली खेलने की परंपरा द्वापर युग से चली आ रही है। कहा जाता है कि भगवान कृष्ण सांवले रंग के थे, जबकि राधा बेहद गोरी और आकर्षक थीं। अपने रंग को लेकर बाल स्वरूप में कृष्ण अक्सर मां यशोदा से सवाल करते थे कि उनका रंग सांवला क्यों है और राधा का इतना गोरा।
कृष्ण की मासूम जिज्ञासा पर एक दिन माता यशोदा ने हंसते हुए कहा कि यदि तुम्हें राधा का रंग पसंद है तो तुम भी उनके चेहरे पर अपना रंग लगा दो। मां की बात सुनकर कृष्ण अपनी सखा-मंडली के साथ राधा और उनकी सखियों के पास पहुंचे और उन्हें रंग लगा दिया। मान्यता है कि तभी से रंगों से होली खेलने की परंपरा शुरू हुई। यह पर्व प्रेम, स्नेह और उल्लास का प्रतीक माना जाता है।
होलिका दहन: बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश
होलिका दहन की कथा भक्ति और आस्था का प्रतीक है। असुर राजा हिरण्यकश्यप भगवान विष्णु से घोर द्वेष रखता था, जबकि उसका पुत्र प्रह्लाद भगवान विष्णु का परम भक्त था। पिता ने कई बार प्रह्लाद को भक्ति छोड़ने के लिए दंडित किया, लेकिन वह अडिग रहा।
आखिरकार हिरण्यकश्यप ने अपनी बहन होलिका के साथ मिलकर प्रह्लाद को आग में जलाने की योजना बनाई। होलिका को वरदान मिला था कि वह अग्नि में नहीं जलेगी। वह प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठ गई, लेकिन भगवान विष्णु की कृपा से वरदान का वस्त्र प्रह्लाद को सुरक्षित कर गया और होलिका अग्नि में भस्म हो गई।
तभी से फाल्गुन पूर्णिमा को होलिका दहन और अगले दिन रंगों की होली मनाई जाती है। यह पर्व बुराई पर अच्छाई की जीत, प्रेम, भक्ति और भाईचारे का प्रतीक है।



