सवर्णों की नाराज़गी अब कैसे होगी दूर?

सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी के विवादित नियमों पर पुनर्विचार की नसीहत देकर केंद्र को राहत और मौका दोनों दिया है
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को यूजीसी के नए नियमों में सुधार करने का एक मौका दिया है। कोर्ट चाहती है कि विवि व कॉलेजों में ऐसे नियम बनें जो सभी विद्यार्थियों पर एकसमान लागू हों और समता का अर्थ केवल एक वर्ग के संरक्षण तक सीमित न रहे। केंद्र सरकार ने सवर्णों के ऐसे देशव्यापी विरोध की कल्पना नहीं की थी। ये नियम केंद्र खुद वापस लेती तो बीजेपी को एक बड़ा राजनीतिक नुकसान हो सकता था। सुप्रीम कोर्ट ने नए नियमों पर स्टे लगाकर केवल छात्रों को ही नहीं, बल्कि केंद्र सरकार को भी राहत दी है। दयाशंकर शुक्ल सागर की रिपोर्ट।
यूजीसी का नया नियम बाइबिल के नए नियम की तरह पवित्र नहीं था वर्ना सुप्रीम कोर्ट को फैसला पलटने की ज़रूरत नहीं पड़ती। हालांकि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग यानी यूजीसी ने इसे ‘समता विनियम-2026’ का नाम दिया था लेकिन यह नियमावली असमानता की सारी हदें पार कर रही थी। साफ दिख रहा था कि एक वर्ग विशेष का वोट हासिल करने के लिए सियासत कितनी नीचे जा सकती है। इसीलिए सबसे बड़ी अदालत ने इन नियमों को न केवल पहली नज़र में अस्पष्ट व दुरुपयोग योग्य माना है बल्कि इसे सामाजिक विभाजन को बढ़ावा देने वाला भी बताया। नए नियमों पर स्टे लगाने के साथ ही सीजेआई सूर्यकांत ने नए फैसलों को लेकर कई तीखी टिप्पणी भी की। कोर्ट ने कहा-75 साल बाद जातिविहीन समाज बनाने के मामले में हमने जो कुछ भी हासिल किया है, क्या हम उल्टी दिशा में जा रहे हैं? हमें जातिविहीन समाज की ओर बढ़ना चाहिए। हमें उस स्टेज पर नहीं जाना चाहिए, जहां हमारे पास अलग-अलग स्कूल हों, जैसा कि USA में है, जहां गोरे बच्चे अलग स्कूलों में जाते हैं। भारत की एकता हमारे शैक्षणिक संस्थानों में दिखनी चाहिए। आप स्कूलों, कॉलेजों को अलग-थलग नहीं रख सकते हैं। अगर कैंपस के अंदर ऐसा माहौल होगा तो लोग कैंपस के बाहर कैसे आगे बढ़ेंगे? यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन (UGC) ने 2026 में कैंपस में उत्पीड़न रोकने के नाम पर ऐसे नए नियम बनाए जिसे लेकर छात्रों का भड़कना स्वाभाविक था। यूजीसी ने इसे Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations, 2026 नाम दिया। कहने को यह नियम यूनिवर्सिटी और कॉलेजों में जातिगत भेदभाव को रोकने के लिए बनाए गए थे लेकिन इसे लेकर देशभर के सवर्ण सड़क पर उतर आए। नियमों के मुताबिक हर यूनिवर्सिटी और कॉलेज में एक इक्विटी कमेटी बनानी होगी। यह कमेटी एससी, एसटी और ओबीसी छात्रों की शिकायतें सुनेगी और तय समय में उनका निपटारा करेगी।
यूजीसी की इस नई नियमावली में सबसे बड़ा विवाद ‘भेदभाव’ की परिभाषा पर था। इसमें भेदभाव की व्याख्या को लगभग पूरी तरह आरक्षित वर्गों-अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और पिछड़ा वर्ग तक सीमित रखा गया। सामान्य श्रेणी के छात्रों के लिए किसी स्पष्ट सुरक्षा का कोई उल्लेख नहीं था। झूठी शिकायतों पर कार्रवाई का प्रावधान न होना और यूजीसी को विश्वविद्यालयों की र्फंंडग रोकने जैसे अधिकार देना विवाद की वजह बना। इन प्रावधानों ने ‘विपरीत भेदभाव’ के डर को जन्म दिया। अदालत ने इर्सी ंबदु पर तीखी प्रतिक्रिया दी। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने पूछा कि ‘क्या हम एक जातिविहीन समाज की ओर बढ़ने के बजाय पीछे जा रहे हैं?’ यह सवाल वास्तव में सरकार और सत्तारूढ़ दल के लिए एक आईना है। सामाजिक न्याय का रास्ता संतुलन के सहारे ही आगे बढ़ सकता है, नए विभाजन पैदा करके नहीं। यह सही है कि सुप्रीम कोर्ट ने 2025 में रोहित वेमुला और पायल तड़वी जैसे मामलों की सुनवाई के दौरान यूजीसी को 8 हफ्तों में नए सख्त नियम बनाने को कहा था। हैदराबाद यूनिवर्सिटी के रोहित वेमुला और मुंबई मेडिकल कॉलेज की पायल तड़वी ने कथित जातिगत उत्पीड़न के बाद सुसाइड कर लिया था। इन मामलों में पीआईएल दाखिल हुई। कोर्ट ने यूजीसी से कहा था कि 2012 के पुराने नियमों को अपडेट करें और भेदभाव रोकने के लिए मज़बूत व्यवस्था बनाएं। लेकिन सरकार ने इस मौके पर राजनीतिक रोटियां सेंकने का पूरा रोडमैप तैयार कर लिया था।

दरअसल अधिकांश राजनेताओं की मान्यता है कि पूर्वजों ने जो जु़ल्म किए उसकी सज़ा सवर्णों की वर्तमान पीढ़ी को दी जानी चाहिए। इसलिए ऐसे तमाम कानून बने हैं जो गैर सवर्णों को अतिरिक्त सुरक्षा व सुविधा देते हैं। देखा जाए तो यह कानून संविधान के समानता के मौलिक अधिकारों का अतिक्रमण करते हुए भेदभाव करते हैं। सिर्फ जाति आधारित ही क्यों? भेदभाव किसी भी आधार पर हो, वह गलत होना चाहिए। आपत्तिजनक टिप्पणी करने का अधिकार किसी को नहीं होना चाहिए। नए नियमों में जातिगत भेदभाव को स्पष्ट रूप से परिभाषित नहीं किया गया था। कहा गया था कि अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और पिछड़ा वर्ग छात्रों के साथ होने वाला किसी भी तरह का प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष या अपमानजनक व्यवहार भेदभाव माना जाएगा। अगर कोई छात्र की गरिमा या शिक्षा में समानता को कम करता है, तो वो भेदभाव माना जाएगा। इस मामले की शिकायत कमेटी को की जा सकती है और दोषी पर सख्त कार्रवाई होगी लेकिन भेदभाव की कोई स्पष्ट परिभाषा नहीं तय की गई थी। नए कानून में जनरल कैटेगरी के छात्रों को भेदभाव का शिकार माना ही नहीं गया था। सवर्ण समाज के लोगों का कहना है कि इन नियमों का फायदा उठाकर कोई भी छात्र सवर्णों को फंसाने के लिए झूठी शिकायत कर सकता है। कोई भी कमेटी यह पहचान कैसे कर सकती है कि कोई शिकायत व्यक्तिगत प्रतिद्वंद्विता के कारण उत्पन्न हुई है या जाति आधारित भेदभाव के कारण।
शिकायतों की जांच के लिए कमेटियां बनाई गईं थी। कहा गया था कि इन कमेटियों में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग, महिलाओं और विकलांग व्यक्तियों का प्रतिनिधित्व होना अनिवार्य है और इन्हें वर्ष में कम से कम दो बार बैठक करना जरूरी है। ईओसी अर्धवार्षिक रिपोर्ट प्रकाशित करेंगे जिनमें परिसर की जनसांख्यिकी, ड्रॉपआउट दरें, प्राप्त शिकायतें और उनकी स्थिति का विवरण होगा, जिससे पारदर्शिता का एक नया स्तर जुड़ेगा। इन नियमों में चौबीसों घंटे चलने वाली इक्विटी हेल्पलाइन, कैंपस के संवेदनशील क्षेत्रों की निगरानी के लिए मोबाइल ‘इक्विटी स्क्वाड’ और हॉस्टलों, विभागों और सुविधाओं में नामित ‘इक्विटी एंबेसडर’ की भी व्यवस्था की गई थी ताकि उल्लंघन से संबंधित मामलों को जल्द से जल्द उजागर किया जा सके। शिकायतों की सूचना मिलने के 24 घंटे के भीतर समिति की बैठक बुलानी थी और संस्थानों को निर्धारित समय सीमा के भीतर कार्रवाई करनी थी। इस मामले में लोकपाल के समक्ष अपील की व्यवस्था थी। सवाल उठ रहे थे कि इन कमेटियों में सवर्ण जातियों को शामिल क्यों नहीं किया गया?

मजे की बात यह है कि यूजीसी के नए कानून को सभी दलों ने मिलकर ड्राफ्ट किया है। इसलिए नहीं कि वे दलित-पिछड़ों को लेकर संवेदनशील हैं बल्कि इसलिए कि ये वर्ग उनका एक बड़ा वोट बैंक है। राजनेता कभी नहीं चाहेंगे कि देश में जाति की दीवार ढह जाए। जातियां रहेंगी तभी वोट की राजनीति संभव हो सकेगी। जाहिरी तौर पर यूजीसी के Equity Rule का सेक्शन 3(C) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, समानता और व्यक्तिगत आजादी जैसे मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है। यह नियम यूजीसी अधिनियम 1956 के विरुद्ध है, और उच्च शिक्षा में समान अवसर देने के अवसर को खत्म करता है। यूजीसी ने सुप्रीम कोर्ट में एक रिपोर्ट सौंपी थी जिसमें जातिगत भेदभाव के आंकड़े दिए गए थे। रिपोर्ट के मुताबिक उच्च शिक्षण संस्थानों में जाति आधारित भेदभाव की शिकायतें 2017-18 में 173 थीं, जो 2023-24 में बढ़कर 378 हो गईं। जबकि इन संस्थानों में गैर सवर्णों की संख्या कोई 25 लाख है। ये आंकड़े यूजीसी के अपने डेटा से हैं, जो पार्लियामेंट कमेटी और सुप्रीम कोर्ट को दिए गए।
रिपोर्ट के अनुसार इनमें आधी शिकायतें झूठी पाई गईं। यानी उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव की दर 0.000001 फीसदी से भी कम है। फिर इस तरह के भेदभाव से भरे कानून की क्या ज़रूरत थी जिससे समाज में वैमनस्य की खाईं और बढ़े। बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट ने इस विवाद का दरवाजा पूरी तरह बंद नहीं किया है। सरकार को अपनी गलतियां सुधारने का एक मौका दिया गया है। केंद्र सरकार के पास अब 19 मार्च तक का समय है। इस दौरान वह यूजीसी नियमों की भाषा और परिभाषा बदल सकती है। शिकायत निवारण तंत्र में संतुलन लाना अब अनिवार्य है। सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि समता का अर्थ केवल एक वर्ग का संरक्षण नहीं है। इसमें पूरे शैक्षणिक समुदाय की सुरक्षा शामिल होनी चाहिए। यदि सरकार नियमों को सर्व-समावेशी बनाने में सफल रहती है, तो वह राजनीतिक नुकसान को टाल सकती है। ल्ल



