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स्वस्थ रहना है तो अपनाए प्राकृतिक जीवन शैली

डॉ. योगी रवि

प्राकृतिक चिकित्सक

नई दिल्ली

नई दिल्ली, 25 जून 2021, (दस्तक टाइम्स) :  आधुनिक जीवन शैली में विश्राम और नींद की बिगड़ती स्थिति तथा योग का समाधान वर्तमान समय में विश्राम का संतुलन भी बिगड़ चुका है। आज व्यक्ति उचित समय पर उचित विश्राम पाने में असमर्थ है। विश्राम के सबसे महत्वपूर्ण दो क्षेत्र हैं- मानसिक विश्राम एवं निद्रा।

इस भौतिकतावादी समाज में तनाव होना स्वभाविक है। हमारा मन आवश्यकता से अधिक कार्य करता है, या यूँ कहें कि रचनात्मक रूप से सक्रिय न होकर अनावश्यक थकता रहता है। यदि तनाव को दूर करना हो तो जीवन के मूल सार को समझकर अपनी सोच को सम्यक बनाना होगा। सम्यक निद्रा भी तनाव को दूर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। सम्यक निद्रा के लिए निद्रा से सम्बंधित दो महत्वपूर्ण प्रश्नों पर विचार करना होगा-कितना सोयें और कब सोयें।

हालांकि उच्च कोटि के योगी लगभग चार घण्टे या इससे भी कम समय में अपनी नींद पूरी कर लेते हैं, परन्तु सामान्य व्यक्ति के लिए छः से आठ घण्टे की नींद अनिवार्य है। यदि लम्बे समय तक लगातार छः घण्टे से कम या आठ घण्टे से अधिक नींद ली जाए तो स्वास्थ्य की हानि होती है तथा व्यक्ति लगातार कमजोरी एवं थकान अनुभव करने के साथ साथ मानसिक रूप से भी अस्वस्थ रहता है। वर्तमान समय में प्रायः छः से आठ घण्टे शयन करने पर भी व्यक्ति स्वस्थ अनुभव नहीं करता। इसका कारण है कि हम निद्रा के लिए उपयुक्त समय को भूल चुके हैं।

यद्यपि अपनी बातों में हम “मध्य रात्रि” का उपयोग बहुत करते हैं फिर भी आज बहुत से व्यक्तियों की रात्रि मध्य रात्रि के बाद ही शुरू होती है। यदि मध्य रात्रि के अनुसार अपनी निद्रा का समय व्यवस्थित किया जाए तो छः घण्टे की निद्रा का समय रात्रि नौ बजे से सुबह तीन बजे तक सबसे उत्तम है, उसी प्रकार आठ घण्टे की नींद रात्रि नौ बजे से प्रातः पांच बजे तक हो जायेगी।

आयुर्वेद के अनुसार निद्रा का सर्वश्रेष्ठ समय है सूर्य छिपने के दो घण्टे बाद। यदि सूर्य छः बजे छिपता है तो आठ बजे तक सो जाना, परन्तु वर्तमान समय में बहुत से व्यक्तियों के लिए, विशेषतौर पर शहरी जीवनचर्या में ऐसा करना बहुत कठिन है। अतः यदि रात्रि दस बजे से सुबह पांच या छः बजे तक शयन किया जाए तब भी उचित है। ध्यान रहे इस संतुलन से जितनी दूर निद्रा का समय निर्धारित होगा, स्वास्थ्य की उतनी ही अधिक हानि होगी।

वयस्कों की तुलना में बच्चों को नींद की अधिक आवश्यकता होती है। चौदह वर्ष से कम आयु के बच्चों को निद्रा के आधार पर तीन श्रेणी में बांटा गया है, नवजात शिशु से चार वर्ष, चार से आठ वर्ष एवं आठ से चौदह वर्ष। इन तीनो श्रेणियों में बच्चों की निद्रा की आवश्यकता अलग-अलग हैं। नवजात शिशु से चार साल के बच्चों के लिए सोलह घण्टे की नींद आवश्यक है, चार से आठ वर्ष के बच्चों को जहाँ बारह से चौदह घण्टे की नींद चाहिए है तो वहीं आठ से चौदह वर्ष के बच्चों के लिए लगभग दस घण्टे की निद्रा नितांत आवश्यक है। बच्चों की निद्रा पूरी न होने पर उन्हें वयस्कों से अधिक हानि होती है क्योंकि ऐसा होने पर उनके स्वभाव में चिड़चिड़ापन एवं गुस्सा बढ़ने लगता है।

यह स्थिति लगातार बने रहने से बच्चे अपने अभिभावकों की बात नहीं सुनते/मानते क्योंकि उनके मानसिक विश्राम में कमी के कारण उन्हें सीख देने वाला व्यक्ति अपना शत्रु लगने लगता है। सामान्यतः घरों में दिखने वाली बच्चो की यह शिकायत/समस्या जो प्रयाप्त निद्रा न मिलने के कारण उत्पन्न होंती है, वह इतनी सामान्य हो गयी है कि हम इसे उचित महत्त्व भी नहीं देते। यदि सामान्य बुद्धि से देखा जाए तो अगर बच्चे अभिभावकों की बात ही नहीं समझेंगे तो उनके जीवन की दिशा किसी भी ओर जा सकती है और अधिक संभावनाएं तो सर्वथा गलत दिशा में बढ़ने की ही होती है। आज की हमारी जीवन शैली जिसमे देर रात तक जागना और देरी से उठना शामिल हो गया है,वह मूल भारतीय जीवन शैली तो कदापि नहीं है।

यह जीवन शैली पश्चिमी देशों की देन है और यदि उन्ही देशों (अमेरिका एवं यूरोपीय देश) के अपराधों के आंकड़े एकत्र किये जाएँ तो उनमे 65 से 70 प्रतिशत अपराधी बाल अपराधी होते हैं। उनकी जीवन शैली की वजह से अधिकांश बच्चों की नींद पूरी नहीं होती। आयुर्वेद की भाषा में कहा जाए तो उनका कफ बिगड़ा हुआ है और यही बिगड़ा हुआ कफ अपने मानसिक प्रभावों को दिखता हुआ उन्हें अपराधी तक बना देता है। विडम्बना यह है कि आज हम भारतीय लोग अपनी सम्रद्ध जीवन शैली को भूलकर उन्ही पश्चिमी देशों की जीवन शैली को अपना रहे हैं जिसने अपने बच्चों को तो अपराधी बनाया ही है, हमारे बच्चों में चिड़चिड़ापन, गुस्सा एवं आज्ञा की अवहेलना आदि आरम्भ कर चुकी है।

यदि आज हम अपने सोने के समय को देखें तो वह देर रात तक टेलीविजन देखने या यो कहें कि समय बर्बाद करने के कारण बहुत बिगड़ चुका है। इससे हमारे स्वास्थ्य पर दुष्प्रभाव तो पड़ता ही है उससे अधिक हानि हमारे बच्चों को हो रही है क्योंकि उनकी निद्रा की आवश्यकता को पूरी न करने के साथ-साथ हम उन्हें भी एक दूषित जीवन शैली सिखा रहे हैं जो उन्हें शारीरिक एवं मानसिक रूप से अस्वस्थ ही बनाने वाली है। अतः स्वयं तथा बच्चों के प्रति अपने कर्तव्य को समझते हुए टी० वी० रुपी बाधा को दूर कर उचित समय पर सोने का नियम बनायें।

उपयुक्त समय के साथ ही अच्छी नींद भी आवश्यक है, परन्तु आज मानसिक तनाव के कारण बहुत से व्यक्ति अनिद्रा से ग्रसित हो गए हैं। यदि हम निद्रा के लिए उचित समय निकाल लें, तब भी मन इतना अधिक क्रियाशील है कि वह न तो स्वयं विश्राम करता है अपितु शरीर के विश्राम में भी बाधा उत्पन्न करता है। अच्छी निद्रा के लिए आवश्यक है कि शयन करते समय मन भी शांत हो। अनिद्रा को दूर करने, या यों कहें कि अच्छी निद्रा के लिए सिर की दिशा दक्षिण अथवा पूर्व की ओर करके सोयें तथा सोते समय नासारंद्रों में देसी गाय के दूध से बना घी गुनगुना करके एक एक बूँद अवश्य डालें। इन दोनों उपायों से अनिद्रा में अप्रत्याशित लाभ प्राप्त होते हैं। योग मार्ग पर आगे बढ़ते हुए तो मन स्वयं ही शांत होने लगता है तथा अनिद्रा कोसो दूर हो जाती है।

उपयुक्त समय के साथ ही अच्छी नींद भी आवश्यक है, परन्तु आज मानसिक तनाव के कारण बहुत से व्यक्ति अनिद्रा से ग्रसित हो गए हैं। यदि हम निद्रा के लिए उचित समय निकाल लें, तब भी मन इतना अधिक क्रियाशील है कि वह न तो स्वयं विश्राम करता है अपितु शरीर के विश्राम में भी बाधा उत्पन्न करता है। अच्छी निद्रा के लिए आवश्यक है कि शयन करते समय मन भी शांत हो। अनिद्रा को दूर करने, या यों कहें कि अच्छी निद्रा के लिए सिर की दिशा दक्षिण अथवा पूर्व की ओर करके सोयें तथा सोते समय नासारंद्रों में देसी गाय के दूध से बना घी गुनगुना करके एक एक बूँद अवश्य डालें। इन दोनों उपायों से अनिद्रा में अप्रत्याशित लाभ प्राप्त होते हैं। योग मार्ग पर आगे बढ़ते हुए तो मन स्वयं ही शांत होने लगता है तथा अनिद्रा कोसो दूर हो जाती है।

कुछ अन्य भौतिक कारक भी निद्रा पर प्रभाव डालते हैं जिन्हें समझना अच्छी निद्रा के लिए उपयोगी है। शयन के लिए अधिक मुलायम गद्दे हितकर नहीं, क्योंकि ये शरीर को पूरा आराम नहीं दे पाते। निद्रा के लिए पारंपरिक रुई के गद्दे उत्तम हैं। मच्छरों को भगाने के लिए आल आउट आदि रसायनों का उपयोग करने से ये वायु में फैलकर हमारी श्वास के साथ-साथ भीतर जाते हैं और कुछ मात्रा में सही, हमारे लिए हानिकारक सिद्ध होते हैं। इन रसायनों को समय के साथ-साथ और अधिक जहरीला बनाया जाता है क्योंकि एक समय के बाद मच्छरों पर निश्चित रसायन का प्रभाव समाप्त होने लगता है। मच्छर से बचने का सर्वोत्तम उपाय मच्छरदानी है, जो हानिरहित तरीके से १०० प्रतिशत मच्छरों को आपसे दूर रखती है। सोने से कम से कम दो घंटे पूर्व भोजन करना एवं आधे घंटे पहले दूध अवश्य पीना भी निद्रा की गुणवत्ता को बढाता है।

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