उत्तराखंड

मसूरी में बुल्लेशाह के नाम पर ‘अवैध’ मजार, पाकिस्तान में दफन सूफी फकीर उत्तराखंड कैसे पहुंचे?

देहरादून। उत्तराखंड के मसूरी में जंगल क्षेत्र के बीच बनी बुल्लेशाह के नाम की एक मजार को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। सवाल उठ रहे हैं कि जिन सूफी कवि बुल्लेशाह को पाकिस्तान के कसूर में दफन बताया जाता है, उनके नाम से मसूरी में मजार कैसे बन गई। मजार से जुड़ी प्रबंधन समिति अब तक इस सवाल का कोई स्पष्ट जवाब नहीं दे पाई है, जिससे पूरे मामले पर संदेह और गहरा गया है।

चंदे और उर्स के नाम पर लाखों की वसूली का आरोप
स्थानीय सूत्रों के मुताबिक मजार से जुड़े खादिमों ने कुछ स्थानीय हिंदू लोगों को आगे कर एक समिति बनाई है, जो उर्स और धार्मिक आयोजन के नाम पर लाखों रुपये का चंदा इकट्ठा करती है। आरोप है कि इस धन का कोई सार्वजनिक लेखा-जोखा उपलब्ध नहीं कराया जाता। यही कारण है कि मजार की वैधता के साथ-साथ आर्थिक गतिविधियों पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं।

ईसाई स्कूल परिसर में बनी कई कथित मजारें
जिस परिसर में बुल्लेशाह के नाम की मजार बताई जा रही है, वह एक ईसाई स्कूल का क्षेत्र बताया जाता है। खास बात यह है कि यहां एक नहीं बल्कि कई कथित मजारें एक साथ बनी हुई हैं। प्रबंधन समिति ने अब तक यह स्पष्ट नहीं किया है कि ये मजारें किनके नाम पर हैं और कब बनाई गईं। हिंदुत्वनिष्ठ संगठनों का आरोप है कि यह सब समाज को गुमराह करने की कोशिश है।

पाकिस्तान के कसूर में दफन हैं सूफी कवि बुल्लेशाह
इतिहास के अनुसार बुल्लेशाह एक ही सूफी फकीर और रहस्यवादी कवि थे, जिन्हें “पंजाबी ज्ञानोदय का जनक” माना जाता है। उनके आध्यात्मिक गुरु शाह इनायत कादिरी लाहौर के सूफी संत थे। बुल्लेशाह का जीवन कसूर में ही बीता और वहीं उन्हें दफनाया गया। उनका मकबरा आज भी पाकिस्तान के कसूर शहर के मध्य स्थित है, जहां देश-विदेश से श्रद्धालु पहुंचते हैं।

एक ही सूफी फकीर की दो मजारें कैसे?
विवाद का केंद्र यही सवाल है कि जब सूफी परंपरा में किसी फकीर की एक ही मजार या दरगाह होती है, तो बुल्लेशाह के नाम पर मसूरी में मजार कैसे अस्तित्व में आई। हिंदुत्वनिष्ठ संगठनों का कहना है कि जिस स्थान पर यह मजार बताई जा रही है, वहां आसपास एक दर्जन से अधिक अन्य कथित मजारें भी बना दी गई हैं, जिनकी वैधता संदिग्ध है।

आस्था के नाम पर गुमराह करने का आरोप
आरोप है कि मजार पर बैठने वाले खादिम ताबीज, झाड़-फूंक, चादर, अगरबत्ती और अन्य वस्तुओं के जरिए लोगों को आस्था के नाम पर गुमराह कर रहे हैं। बताया जाता है कि यहां मुस्लिम समुदाय की मौजूदगी अपेक्षाकृत कम रहती है, जबकि बड़ी संख्या में स्थानीय हिंदू लोग पहुंचते हैं।

मजार तोड़े जाने के बाद बढ़ा विवाद, जांच में जुटा प्रशासन
कुछ समय पहले हिंदुत्वनिष्ठ संगठनों के कार्यकर्ताओं ने कथित अवैध मजार को तोड़ दिया था, जिसके बाद इलाके में तनाव की स्थिति बन गई और प्रशासन को सुरक्षा तैनात करनी पड़ी। जिला प्रशासन का कहना है कि मामले की जांच की जा रही है कि ये धार्मिक संरचनाएं कैसे बनीं और इनके पीछे कौन जिम्मेदार है।

विहिप और बजरंग दल ने बताया फर्जीवाड़ा
विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल का दावा है कि बुल्लेशाह पाकिस्तान में दफन हैं, ऐसे में मसूरी की मजार पूरी तरह फर्जी है। संगठनों का कहना है कि समिति और खादिम ‘कालनेमि’ की तरह लोगों को भ्रमित कर रहे हैं और देवभूमि उत्तराखंड में ऐसे फर्जीवाड़े को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। उनका कहना है कि प्रशासन को तत्काल कार्रवाई कर इन अवैध संरचनाओं को हटाना चाहिए।

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