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कालाष्टमी 2026, 10 अप्रैल को रखा जाएगा व्रत, शनि-राहु के दोषों से मुक्ति दिलाएगी काल भैरव की पूजा

नई दिल्ली : कालाष्टमी हिंदू धर्म का एक महत्वपूर्ण पर्व है, जो हर महीने कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है. इस दिन भगवान शिव के रौद्र रूप काल भैरव की पूजा की जाती है. मान्यता है कि काल भैरव की उपासना से जीवन की परेशानियां दूर होती हैं, भय खत्म होता है और नकारात्मक ऊर्जा से मुक्ति मिलती है. वैशाख मास की कृष्ण पक्ष अष्टमी तिथि की शुरुआत 9 अप्रैल रात 9 बजकर 18 मिनट से होगी और इसका समापन 10 अप्रैल रात 11 बजकर 14 मिनट पर होगा. उदयातिथि और गृहस्थ जीवन को ध्यान में रखते हुए कालाष्टमी का व्रत 10 अप्रैल 2026, शुक्रवार को रखना उचित माना जा रहा है.

कालाष्टमी का दिन भगवान काल भैरव की पूजा के लिए बेहद खास माना जाता है. धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस दिन श्रद्धा से पूजा करने पर नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है और मन को शांति मिलती है. जो लोग मानसिक तनाव, डर या किसी अनजाने भय से परेशान रहते हैं, उनके लिए यह व्रत काफी लाभकारी माना गया है. साथ ही, काल भैरव की कृपा से शत्रुओं से रक्षा होती है और जीवन में आत्मविश्वास बढ़ता है. ऐसा भी कहा जाता है कि कालाष्टमी का व्रत करने से पूर्व जन्म के पापों का प्रभाव कम होता है और जीवन में सुख-शांति आती है.

इस बार की कालाष्टमी ज्योतिष के लिहाज से भी खास मानी जा रही है. इस दिन शनि मीन राशि में अस्त हो रहे हैं, जबकि राहु कुंभ राशि में स्थित हैं. ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, इन दोनों ग्रहों का सीधा असर व्यक्ति के मन, सोच और जीवन की दिशा पर पड़ता है. ऐसे में काल भैरव की पूजा करने से शनि और राहु के नकारात्मक प्रभाव को कम किया जा सकता है. इससे मानसिक स्थिरता मिलती है और भ्रम व तनाव में कमी आती है.

कालाष्टमी के दिन पूजा की शुरुआत सुबह से ही कर देनी चाहिए. ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें और साफ-सुथरे कपड़े पहनें. इसके बाद घर में भगवान शिव और माता पार्वती की विधि-विधान से पूजा करें. माना जाता है कि काल भैरव भगवान शिव के ही अंश हैं, इसलिए शिव पूजा का विशेष महत्व होता है.

रात के समय काल भैरव की पूजा करना अधिक शुभ माना जाता है. इसके लिए रात 9 बजे से 11 बजे के बीच का समय उपयुक्त रहता है. जरूरी नहीं कि पूजा आधी रात को ही की जाए, आप अपने अनुसार इस समय के बीच कभी भी पूजा शुरू कर सकते हैं. पूजा करते समय सबसे पहले गंगाजल से भगवान का अभिषेक करें, फिर तिलक लगाएं और अक्षत अर्पित करें. इसके बाद फूल चढ़ाएं और दीपक जलाकर आरती करें. पहले भगवान शिव की आरती करें और फिर काल भैरव की आरती करें. यदि समय हो तो शिव चालीसा और भैरव चालीसा का पाठ भी करना लाभकारी माना जाता है.

काल भैरव की पूजा में कुछ विशेष चीजों का अर्पण करना शुभ माना जाता है. इसमें काला उड़द, सरसों का तेल, कच्चा दूध और मीठी रोटी शामिल हैं. कच्चे दूध से अभिषेक करना विशेष फलदायी माना गया है. इसके अलावा काल भैरव की सवारी कुत्ता मानी जाती है, इसलिए इस दिन काले कुत्ते को भोजन कराना भी बहुत शुभ माना जाता है.

कालाष्टमी के दिन दान का भी विशेष महत्व बताया गया है. इस दिन दूध, काले कपड़े, सरसों का तेल, जूते-चप्पल और भोजन सामग्री का दान करना शुभ माना जाता है. हालांकि, दान हमेशा अपनी क्षमता के अनुसार ही करना चाहिए.

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, कालाष्टमी का व्रत और पूजा करने से जीवन के कई कष्ट दूर हो सकते हैं. इससे रोगों में राहत मिलती है, मानसिक शांति प्राप्त होती है और भय खत्म होता है. साथ ही, शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने में भी मदद मिलती है और व्यक्ति का जीवन सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ता है.

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