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असमंजस में सत्ता और संगठन, सिंधिया की सुने या संघ की !, अघोषित तरीके से सिंधिया समर्थकों को बाहर करने की मुहिम

भोपाल: भाजपा और संघ के बारे में एक प्रचलित कहावत है-अपना काम बनता…भाड़ में जाए जनता। यानी भाजपा और संघ में किसी व्यक्ति का महत्व तभी तक है, जब तक उसकी जरूरत है। मप्र भाजपा में इनदिनों सिंधिया समर्थक मंत्रियों की स्थिति कुछ ऐसी ही हो गई है। इसलिए संघ ने एक विशेष रणनीति के तहत सिंधिया समर्थक मंत्रियों को मंत्रिमंडल से बाहर करने का टास्क सत्ता और संगठन को दे दिया है। इस टास्क के पहले टारगेट पर हैं बिसाहूलाल सिंह। उधर सत्ता और संगठन इस उलझन में हैं कि सिंधिया की सुने या संघ की।

सूत्रों का कहना है कि 2018 में भाजपा के सत्ता से बाहर होते ही संघ ने कांग्रेस की सरकार को अस्थिर करने का षड्यंत्र रचना शुरू किया और मार्च 2019 में उसमें सफलता पाई। उस समय भाजपा ने सिंधिया के साथ आए समर्थकों को जोड़े रखने के लिए उपचुनाव भी लड़वाया और जुरूरत के आंकड़े के लिए 19 को ही जीतवाया। उसके बाद 12 सिंधिया समर्थकों को मंत्री बनाया है। यानी 30 सदस्यीय मंत्रिमंडल में केवल 18 मंत्री ही भाजपाई पृष्ठभूमि के हैं। यह बात संघ को अच्छी नहीं लग रही है। इसलिए सत्ता और संगठन पर मंत्रिमंडल विस्तार के लिए दबाव बनाया जा रहा है और मंत्रियों के कार्यों की समीक्षा की जा रही है।

भाजपा सूत्रों का कहना है कि संघ ने सिंधिया समर्थक 12 मंत्रियों में आधे से अधिक को मंत्रिमंडल से बाहर करने का निर्देश दिया है। इसी के तहत विधायकों से वन-टू-वन, कार्यसमिति और राष्ट्रीय संगठन महामंत्री बीएल संतोष की बैठकें हुई हैं। संघ चाहता है कि सिंधिया समर्थकों को बाहर करने के लिए वाजिब कारण बताया जाए, ताकि सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे। इसलिए हर एक मंत्री की परफॉर्मेंस रिपोर्ट बनाई जा रही है।

प्रदेश में सम्मान और अपमान की राजनीति पर मचे बवाल पर भाजपा से जुड़े एक आदिवासी नेता कहते हैं कि एक तरफ बिरसा मुंडा के जन्मदिवस को जनजातीय गौरव दिवस मनाने, आदिवासी रानी कमलापति के नाम पर रेलवे स्टेशन का नामकरण कर और आदिवासी हीरो टंट्या भील के नाम कई स्थानों का नामकरण कर आदिवासियों को बहुप्रचारित सम्मान दिया जा रहा है वहीं दूसरी तरफ एक आदिवासी मंत्री के एक बयान पर उससे हाथ जोड़ कर सार्वजनिक माफी मंगवाना कहां तक उचित है? यह ठीक बात है कि मंत्री ने एक जाति विशेष का उल्लेख करके किसी भी दृष्टि से सही नहीं किया। लेकिन बिसाहूलाल से सार्वजनिक माफी मंगवाना उचित नहीं था।

भाजपा के एक आदिवासी नेता कहते हैं कि पार्टी और संघ की नीति समझ से परे है। वह कहते हैं कि एक तरफ मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और प्रदेश अध्यक्ष वीडी शर्मा बिसाहूलाल सिंह को बुलाकर माफी मंगवाते हैं और दूसरी तरफ संघ के इशारे पर करणी सेना लगातार प्रदर्शन कर रही है। जब मंत्री ने अपनी गलती पर माफी मांग ली है तो विरोध क्यों? हैरानी की बात तो यह है की करणी सेना मंत्री को बर्खास्त करने पर अड़ी हुई है। इससे साफ जाहिर होता है कि इसके पीछे सोची-समझी रणनीति है।

भाजपा से ही जुड़े एक अन्य आदिवासी नेता कहते हैं कि मंत्री बिसाहूलाल सिंह पहले नेता नहीं हैं जिन्होंने किसी समाज या जाति के बारे में गलत बोला है। अभी हाल ही में प्रदेश भाजपा प्रभारी मुरलीधर राव ने कहा था कि हमारी एक जेब में ब्राह्मण और दूसरी में बनिया है तो उस पर पार्टी चुप्पी साधे रही। इससे पहले भी राव और अन्य नेताओं ने जातियों के बारे में उटपटांग बयान दिया है, लेकिन न तो सरकार और न ही संगठन ने उन्हें तलब किया। फिर बिसाहूलाल को अपमानित करने की जल्दीबाजी क्यों की गई।

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