धामी बनाम पूर्व सरकारें: उत्तराखंड की सियासत में बदली शासन की भाषा और राजनीति की दिशा
उत्तराखंड की राजनीति में सरकारें बदलीं, चेहरे बदले, लेकिन शासन की शैली लंबे समय तक लगभग एक जैसी रही। योजनाएं बनीं, घोषणाएं हुईं, फाइलें चलीं और जनता अक्सर इंतजार करती रही। पहाड़ी राज्य की सबसे बड़ी विडंबना यही रही कि सरकार राजधानी में दिखती थी और जनता गांवों में सवालों के साथ खड़ी रहती थी। अब हालात बदले हैं। धामी सरकार ने ‘‘जन-जन के द्वार’’ अभियान में गांव के अंतिम छोर पर बैठे व्यक्ति तक पहुंचने का लक्ष्य रखा, जो काफी हद तक सफल रहा। इस अभियान से जुड़े विभिन्न पहलुओं का विश्लेषण करती ‘दस्तक टाइम्स’ के प्रधान संपादक रामकुमार सिंह की रिपोर्ट।
उत्तराखंड में अब तक की सरकारों का मॉडल मुख्यत: घोषणा-केंद्रित रहा है। नई योजनाएं लॉन्च होती थीं, बजट में प्रावधान होते थे, लेकिन इनके क्रियान्वयन की जिम्मेदारी नीचे के तंत्र पर छोड़ दी जाती थी। जनता को अगर कोई दिक्कत होती, तो उसे तहसील, ब्लॉक और जिला स्तर पर चक्कर काटने पड़ते थे। शिकायतें दर्ज होती थीं, लेकिन समाधान अक्सर वक्त के साथ फाइलों में कहीं गुम हो जाते थे। राजनीति मंचों पर चलती थी और सत्ता, शासन की फाइलों में। लेकिन ‘जन-जन के द्वार’ अभियान में पहली बार कोई सरकार खुद फील्ड में उतरती दिखती है। पिछले करीब दो महीनों में जनसेवा कैंप में लाखों लोगों की भागीदारी और हजारों शिकायतों का निस्तारण किया। आंकड़े इस बात का संकेत हैं कि सरकार केवल सिस्टम पर भरोसा नहीं कर रही,बल्कि खुद उसकी निगरानी भी कर रही है। यही वजह है कि 65 दिन तक चले इस अभियान के दौरान अब तक पांच लाख से अधिक लोग इससे जुड़े। न्याय पंचायत स्तर पर आयोजित 681 शिविरों के माध्यम से करीब 33 हजार जन शिकायतों का त्वरित समाधान किया गया। कोई हैरत की बात नहीं कि धामी के नेतृत्व में संचालित ‘जन-जन की सरकार, जन-जन के द्वार’ कार्यक्रम उत्तराखंड में सुशासन और संवेदनशील प्रशासन का प्रभावी मॉडल बनकर उभरा है। यह अभियान सरकार को सीधे जनता के द्वार तक पहुंचाने की कार्यशैली का जीवंत उदाहरण बन गया, जिसके जरिए प्रदेशभर में रिकॉर्ड स्तर पर नागरिकों को लाभान्वित किया गया है।
सूबे में लंबे समय तक प्रशासनिक संवाद एकतरफा चलते थे। जनता आवेदन देती, गुहार लगाती और सरकार के जवाब का लंबा इंतजार करती थी। धामी सरकार के मॉडल में पहली बार दोतरफा संवाद शुरू हुआ। कैंपों में अफसर जनता की शिकायतें सुनते और मौके पर ही उसके समाधान की पूरी कोशिश करते दिखे। इस अभियान का मकसद ही शासन- प्रशासन और जनता के बीच की दूरी को समाप्त करना था। यानी, किसी भी समस्या का संवाद के जरिये समाधान इसका मूलमंत्र रहा है। यह अभियान सरकार को सीधे जनता के द्वार तक पहुंचाने की कार्यशैली का जीवंत उदाहरण बन गया। पिछले साल 17 दिसंबर को जब गांव के अंतिम छोर पर बैठे व्यक्ति को मुख्यधारा से जोड़ने के मकसद से यह नवोन्मेषी प्रयोग शुरू किया गया, तब शायद किसी ने भी नहीं सोचा था कि यह इतनी बड़ी सफलता अर्जित करेगा। अभियान के तहत न्याय पंचायत स्तर पर आयोजित शिविरों में जिस तरह से जनमानस उमड़ा, उसे देखते हुए अभियान की अवधि 20 दिन बढ़ा दी गई।

नए कानून का दिखा असर
शासन की इसी नई और आक्रामक कार्यशैली ने युवाओं को नकल माफिया जैसी एक बड़ी मुसीबत से राहत दी। भर्ती प्रक्रियाओं में अव्यवस्था और नकल के आरोप युवाओं में गहरी नाराज़गी का कारण बने हुए थे। यह नाराज़गी धीरे-धीरे सरकार विरोधी भावना में बदलती चली गई। उस दौर में या तो इन आरोपों को नकार दिया जाता था या फिर उन्हें तकनीकी खामियों का बहाना देकर टाल दिया जाता था। नकल माफिया और सरकारी तंत्र के गठजोड़ का खामियाजा युवाओं को उठना पड़ रहा था। धामी सरकार ने पहली बार इस चुनौती को स्वीकार किया। और प्रतियोगी परीक्षा (भर्ती में अनुचित साधनों की रोकथाम और निवारण के उपाय) अधिनियम, 2023 जैसा नकल विरोधी कानून लागू करने जैसा सख्त फैसला लिया। यह केवल कानून नहीं था,बल्कि पूर्ववर्ती शासन शैलियों को सीधा जवाब था। संदेश साफ था कि अब व्यवस्था को ढकने छुपाने की नहीं,बल्कि इसे कानून के जरिए बदलने की बात होगी।
उत्तराखंड में इस कानून के लागू होने के बाद भर्ती प्रक्रियाओं में कई सुधार और बदलाव देखे गए। कानून लागू होने के बाद से सभी भर्ती परीक्षाएं अधिक पारदर्शिता के साथ आयोजित की जाने लगीं, जिससे केवल योग्य और परिश्रमी उम्मीदवारों को ही सफलता मिल रही है। पेपर लीर्क ंसडिकेट और नकल माफियाओं के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की गई है। रिपोर्टों के अनुसार, अब तक पेपर लीक रैकेट में शामिल 100 से अधिक व्यक्तियों को जेल भेजा जा चुका है। इस कानून के तहत अपराधों को संज्ञेय, गैर-जमानती और नॉन कंपाउनटेबिल बनाया गया, जिससे दोषियों का बच निकलना कठिन हो गया। नकल माफिया के लिए आजीवन कारावास और 10 करोड़ रुपये तक के जुर्माने का कड़ा प्रावधान किया गया, जिससे पेपर लीक करने वाले संगठित गिरोहों में डर पैदा हो गया।
नकल के माध्यम से अर्जित की गई नकल माफिया की अवैध संपत्ति को जब्त कर उनके घरों पर बुलडोजर तक चले। नया कानून आने के बाद पिछले तीन वर्षों में विभिन्न सरकारी विभागों में करीब 17,000 से अधिक नियुक्तियां प्रदान की गई, और रुकी हुई भर्ती प्रक्रियाओं को सुचारू रूप से आगे बढ़ाया गया है। कानून आने के बाद पिछले तीन वर्षों में लगभग 25,000 युवाओं को सरकारी विभागों में नियुक्तियां दी गई हैं। पहले जिन परीक्षाओं को पूरा होने में 2-3 साल लगते थे, अब वे अक्सर एक वर्ष के भीतर संपन्न होने लगीं। पारदर्शी चयन प्रक्रिया के कारण आर्थिक रूप से कमजोर और मध्यम वर्गीय परिवारों के मेधावी छात्रों के चयन की संभावना बढ़ती जा रही है। यह एक बड़ा बदलाव है। बीते साल 21 सितंबर को आयोजित एक परीक्षा में मोबाइल के जरिए प्रश्न पत्र की फोटो खींचने की घटना सामने आने पर आयोग ने त्वरित कार्रवाई करते हुए परीक्षा रद्द कर दी। आरोपी को तुरंत गिरफ्तार कर कानून के तहत केस दर्ज किया गया। यह दर्शाता है कि अब छोटी सी गड़बड़ी पर भी सख्त कदम उठाए जा रहे हैं।

इसी तरह भूमि कानून, धर्मांतरण और सामाजिक संतुलन से जुड़े मुद्दों पर नए प्रयोग दिखे। पूर्व सरकारें अक्सर इन संवेदनशील मसलों पर संतुलन साधने की कोशिश में अस्पष्ट रुख अपनाती रहीं। धामी सरकार ने इन मामलों में साफगोई चुनी। यह स्पष्टता समर्थन भी लाती है और विरोध भी, लेकिन राजनीति में कई बार यही स्पष्ट रेखा दीर्घकालिक पहचान के लिए ठोस जमीन तैयार करती है। पूर्व सरकारों की एक कमजोरी यह भी रही कि शासन का चेहरा अक्सर मुख्यमंत्री से अलग दिखता था। फैसले होते थे, लेकिन नेतृत्व जनता की रोजमर्रा की समस्याओं से दूर लगता था। धामी सरकार ने नेतृत्व को सीधे अभियानों से जोड़ा है। मुख्यमंत्री का नाम और चेहरा योजनाओं के साथ लगातार सामने आना, सत्ता की जवाबदेही को व्यक्तिगत बनाता है। राजनीति में यह प्रयोग जोखिम से भरा है, लेकिन ज्यादा प्रभावी भी साबित होता है। राजनीतिक दृष्टि से देखें तो धामी बनाम पूर्व सरकारें का अंतर केवल योजनाओं का नहीं, बल्कि शासन की भाषा का है। पहले सरकार बोलती थी, अब सरकार सुनने का दावा कर रही है। पहले जनता दरवाजे पर खड़ी रहती थी, अब सरकार दरवाजे तक पहुंचने की कोशिश कर रही है। बेशक, यह मॉडल पूरी तरह परखा जाना अभी बाकी है।
पहाड़ी भूगोल, संसाधनों की कमी और प्रशासनिक दबाव किसी भी सरकार की सीमाएं तय करते हैं। लेकिन इतना साफ है कि धामी सरकार अपनी तुलना पूर्व सरकारों से केवल आंकड़ों से नहीं, बल्कि अनुभव से करना चाहती है। अगर यह अनुभव जनता के रोजमर्रा के जीवन में भरोसे के रूप में दर्ज होता रहा, तो यह फर्क केवल शासन का नहीं रहेगा। यह उत्तराखंड की राजनीति में एक नए दौर की पहचान बन सकता है। और यही वह प्रस्थार्न बिंदु है, जहां सुशासन धीरे-धीरे चुनावी रणनीति में बदलता दिखाई देता है। उत्तराखंड की राजनीति आज जिस मोड़ पर खड़ी है, वहां सवाल यह नहीं कि कौन-सी सरकार आई थी, बल्कि यह है कि कौन-सी सरकार जनता तक पहुंची। धामी सरकार इसी सवाल को अपने पक्ष में मोड़ने की कोशिश करती दिख रही है और यही उसका सबसे बड़ा राजनीतिक दांव है।




