उत्तर प्रदेश

कई और जिलों में केले में पाया गया पनामा विल्ट का संक्रमण

लखनऊ: केले जैसी नकदी फसल उगाने वाले किसान अपेक्षाकृत अधिक सावधान रहते हैं क्योंकि वे जानते हैं की इस फसल की बीमारियां बहुत घातक हैं और जरा सा असावधानी उनका मुनाफा ख़तम  कर सकती है. विशेष तोर पर पनामा विल्ट जैसी घातक बीमारी प्रति  एकड़ लाखों का नुकसान कर सकती है. केले की व्यापारिक खेती एक लाभकारी उद्यम के तौर पर प्रदेश में बहुत पुरानी नहीं है.  प्रदेश के कई जिलों में किसानों ने इसको मुख्य व्यवसाय के रूप में अपना लिया है. कई स्थानों पर निरंतर पौधों के तने के सड़ने, पीले होने और उपज के कम हो जाने के कारण किसानों में चिंता व्याप्त है. यह बीमारी व्यापक रूप से फैल कर करोड़ों का नुकसान कर सकती है.

केले की फसल ख़राब होने से बढ़ी किसानो की समस्या

केन्द्रीय उपोष्ण बागवानी संस्थान, रहमानखेड़ा, लखनऊ की पहल के चलते किसानों के पास मोबाइल होने से केले की खेती की महत्वपूर्ण जानकारियों के आदान-प्रदान में काफी योगदान दिया है. क्योंकि केला उत्तर प्रदेश की पारंपरिक फसल नहीं थी और जी-नाइन के टिश्यू कल्चर पौधों  की करोड़ों की संख्या  में उपलब्ध होने के कारण केले के उत्पादन में लगभग 10 गुना वृद्धि हुई है. किसानों का मोबाइल एवं व्हाट्सएप द्वारा निरंतर आपस में विचारों को साझा करना कई सारी समस्याओं को सुलझाने में मददगार रहा है. अब किसान अपनी समस्याओं को सुलझाने के लिए अनुभवी किसान जैसे बहराइच के जय सिंह और सोहावल के श्री आप्टे सरीखे अनुभवी लोगों से सलाह लेते हैं.

जब जय सिंह के सामने पौधों के सूखने और निरंतर  मरने की संख्या में वृद्धि तथा उपज में कमी हो जाने की समस्या सोहावल के किसानों ने विभिन्न एजेंसियों से इस समस्या के निराकरण के लिए सहायता हेतु परामर्श किया गया. किसानों ने कई कृषि रसायन एजेंसियों द्वारा  सुझाए गए उपायों को भी अपनाया परंतु सफलता नहीं मिली. जय सिंह ने इजराइल तथा अन्य स्थानों से वैज्ञानिकों से संपर्क किया और इस बीमारी के लक्षणों से कई मिलती-जुलती बीमारियों का भ्रम होने के कारण सही मार्गदर्शन ना मिल पाया. अंततः किसानों ने  लखनऊ में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के वैज्ञानिकों द्वारा इस  समस्या के निदान के लिए प्रयास किए.

पहली रिपोर्ट सोहावल (अयोध्या) से थी मिली, किसानों और आईसीएआर अनुसंधान दल ने बीमारी को प्रभावी ढंग से प्रबंधित किया.

प्रदेश में पनामा विल्ट बीमारी की पहली रिपोर्ट सोहावल (अयोध्या) से आई थी और इस बीमारी ने अयोध्या जिले के सोहावल के किसानों को गंभीर रूप से खतरे में डाल दिया. अब मुख्य तने के सड़ने से सैकड़ों पौधे सूखने लगे और फलों की पैदावार में भारी कमी आई. किसानों ने इस समस्या के नियंत्रण के उपायों की खोज में कोई कसर नहीं छोड़ी. फिर आईसीएआर-सीएसएसआरआई, आरआरएस और आईसीएआर-सीआईएस के बीच एक सहयोगी परियोजना इस से केले के की इस बीमारी को सफलतापूर्वक नियंत्रित करने में मदद मिली. किसानों और आईसीएआर अनुसंधान दल से जुड़े दृष्टिकोण ने इस बीमारी को प्रभावी ढंग से प्रबंधित किया. इस बारे में आईसीएआर-सीएसएसआरआई के प्रधान वैज्ञानिक डॉ.टी.दामोदरन ने सीआईएस के प्रधान वैज्ञानिक डॉ.पीके शुक्ला के साथ मिलकर विभिन्न जागरूकता और प्रबंधन कार्यक्रम शुरू किए।

वर्तमान में इस बीमारी का प्रकोप सोहावल के अलावा महराजगंज, अंबेडकर नगर, संत कबीर नगर, गोरखपुर, बाराबंकी और सीतापुर जिलों में फैला है लेकिब केले के महत्वपूर्ण नकदी फसल होने के चलते किसान इसे आसानी से छोड़ने  के लिए तैयार नहीं हैं. सोहावल में किसानों ने अपने क्षेत्र में भी इसी तरह के हस्तक्षेप के लिए आईसीएआर संस्थानों से संपर्क करना शुरू किया. माटी फाउंडेशन, एक किसान आधारित संगठन है, जो पूर्वी उत्तर प्रदेश के दूरस्थ और पिछड़े क्षेत्रों के किसानों को आईसीएआर संस्थानों की प्रौद्योगिकियों से जोड़कर उन्नत तकनीक प्रदान करता  है, जिन्होंने अपने रोग क्षेत्र को बचाने के लिए आईसीएआर टीम से संपर्क किया.  लखनऊ की आईसीआर वैज्ञानिकों एवं माटी फाउंडेशन के सहयोग से कुछ स्थानों पर इस बीमारी के रोकथाम के लिए कार्य प्रारंभ किया गया और आशातीत परिणाम मिलने के कारण किसान उत्साही है साथी साथ में चाहते हैं कि अधिक क्षेत्र में आईसीएआर-फ्यूजीकांट टेक्नोलॉजी का प्रयोग करके इस रोग से मुक्ति दिलाई जाए.

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