
सियासत अब चुनावी मोड में
उत्तराखंड/ उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 की आहट
नए साल की शुरुआत के साथ उत्तर भारत के दो महत्वपूर्ण राज्य यूपी और उत्तराखंड की सरकारें चुनावी मोड में आ गई हैं। इन दोनों राज्यों में विधानसभा चुनाव अगले साल जनवरी फरवरी में होने वाले हैं। इसलिए इस चुनाव पूर्व साल में सरकार और उसकी मशीनरी दोनों ने विकास के इंजन को चुनावी पटरी पर दौड़ाना शुरू कर दिया है। कोई हैरत की बात नहीं कि दोनों राज्यों के सालाना बजट, चुनावी बजट कहे जा रहे हैं। ‘दस्तक टाइम्स’ के प्रधान संपादक रामकुमार सिंह की उत्तराखंड से रिपोर्ट और यूपी में योगीराज का आकलन कर रहे हैं लखनऊ से वरिष्ठ समीक्षक संजय सक्सेना।
उत्तराखंड में 2027 में होने वाले विधानसभा चुनाव भले ही अभी एक साल दूर हों, लेकिन राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। सीएम पुष्कर सिंह धामी अपने भाषणों और जनसभाओं में लगातार ऐसे मुद्दों को उठा रहे हैं, जिन्हें चुनावी दृष्टि से निर्णायक माना जा रहा है। धामी विकास, विरासत, सुशासन और डेमोग्राफिक बदलाव से जुड़े मुद्दों का जिक्र करते हुए घुसपैठ, अतिक्रमण और कानून-व्यवस्था के मामलों पर भी खुलकर बात कर रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि मुख्यमंत्री का प्रयास हिन्दुत्व की पिच पर बड़ा दांव खेलने के साथ-साथ विकास के एजेंडे को मजबूत करना है, ताकि 2027 में फिर सत्ता वापसी की राह आसान की जा सके और उत्तराखंड में बीजेपी लगातार तीसरी बार जीत की हैट्रिक लगाकर नया इतिहास रचे।
राजनीतिक स्थिरता
उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए धामी सरकार ने कमर कस ली है। बीजेपी लगातार नौ साल से सत्ता में है। इस प्रयोग ने उत्तराखंड को न केवल राजनीतिक स्थिरता दी बल्कि सरकार को दलीय कोर एजेंडे को अपनी पूरी चमक के साथ सामने लाने और जनविमर्श का हिस्सा बनाने का समय मिला। वर्ष 2014 के बाद राजनीतिक अस्थिरता से जूझते उत्तराखंड में परिस्थितियां तेजी से बदली हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जन अपेक्षाओं को डबल इंजन के साथ जोड़कर राजनीति का टर्निंग प्वाइंट बना दिया। वर्ष 2017 और वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव परिणाम इसकी बानगी हैं। वर्ष 2017 में प्रदेश के 81 प्रतिशत और वर्ष 2022 में लगातार दूसरी बार भाजपा ने एंटी इनकंबेंसी को मात देकर 67 प्रतिशत से अधिक सीट पर कब्जा बरकरार रख हर पांच वर्ष बाद सरकार बदलने के मिथक को तोड़ दिया।
डबल इंजन का यह रूप अब प्रदेश में सत्ता के समीकरणों में संतुलन की कहानी भी बयां कर रहा है। सत्ता के लिए संघर्ष हो या मंत्रिमंडल में स्थान पाने की चाह, बीजेपी के भीतर महत्वाकांक्षाएं, जब भी गुटीय खींचतान का कारक बनीं तो हाईकमान तुरंत सक्रिय हुआ। अंदरूनी समस्याओं को आरंभिक स्तर पर ही निस्तारित करना अब बीजेपी हाईकमान की प्राथमिकता बन चुकी है। हाल ही में ऊधर्मंसह जिले के गदरपुर से बीजेपी विधायक अर्रंवद पांडे से जुड़े भूमि विवाद ने तूल पकड़ा। इसी दौरान केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह भी उत्तराखंड के दौरे पर थे। विधायक के समर्थन में प्रदेश में बीजेपी के कुछ बड़े नेताओं के साथ आने की भनक लगते ही केंद्रीय स्तर से हस्तक्षेप हुआ। परिणामस्वरूप मामला ठंडा पड़ गया।

केंद्र और धामी की जुगलबंदी
केंद्र सरकार और मुख्यमंत्री धामी की जुगलबंदी प्रदेश में राजनीति के डबल इंजन के पर्याय के रूप में भी दिखाई दी है। समान नागरिक संहिता का क्रियान्वयन और धर्मांतरण, लव जिहाद व लैंड जिहाद के विरुद्ध कड़े कानून और भर्तियों में नकल को लेकर उपजे कड़े प्रतिरोध से निपटने में केंद्र व राज्य में यह समन्वय बड़ा आधार बना है। डबल इंजन के सामने अब बड़ी चुनौती अगले विधानसभा चुनाव की है। इन सबके बीच, समन्वय का एक पक्ष कुछ कमज़ोर पड़ा है। धामी मंत्रिमंडल ने जब कार्यभार संभाला तो मंत्रिमंडल में तीन पद रिक्त थे। वहीं अब रिक्त पदों की संख्या बढ़कर पांच हो गई है और चुनाव में लगभग एक वर्ष का समय शेष रह गया है। उत्तराखंड की राजनीति यह संकेत देती है कि आने वाला चुनाव केवल सड़क, बिजली और पानी के सवालों तक सीमित नहीं रहेगा। पहचान, संस्कृति, सामाजिक संतुलन और वैचारिक दिशा चुनावी विमर्श का स्थायी हिस्सा बन चुके हैं। धामी की राजनीतिक रेखा से यह स्पष्ट है कि वे इस चुनाव को प्रशासनिक रिपोर्ट कार्ड से आगे बढ़ाकर एक वैचारिक जनादेश में बदलना चाहते हैं। राज्य की राजनीति अब अधिक स्पष्ट ध्रुवों और गहरे विमर्श की दिशा में आगे बढ़ चुकी है।
सख्त पर संवेदनशील छवि
अगले साल होने वाले चुनाव में धामी का राजनीतिक व्यक्तित्व अहम भूमिका निभाने जा रहा है। पहले कार्यकाल के दौरान उन्हें एक विनम्र, संतुलित और संगठन-निष्ठ नेता के रूप में देखा जाता था। लेकिन समय के साथ उनकी सार्वजनिक छवि, निर्णयों की प्रकृति और राजनीतिक प्रतिक्रियाओं में स्पष्ट बदलाव दिखा है। अब वे पहले से अधिक मुखर, तेज प्रतिक्रिया देने वाले और वैचारिक मुद्दों पर स्पष्ट पक्ष रखने वाले नेता के रूप में उभरे हैं। यह परिवर्तन केवल उनकी व्यक्तिगत शैली का विकास नहीं, बल्कि उस राजनीतिक परिदृश्य का परिणाम है जहां चुनाव केवल स्थानीय समस्याओं पर नहीं, बल्कि पहचान और विचारधारा पर भी लड़े जा रहे हैं। जैसा कि नकल विरोधी कानून लागू करते वक्त धामी की छवि सख़्त निर्णय लेने वाले नेता की बनी। एक सुलझे हुए और संवेदनशील नेता के रूप में वे उस वक्त भी चर्चा में आए जब वह बिना लाव-लश्कर के आंदोलकारी छात्रों के बीच पहुंचे और उनका आंदोलन खत्म कराया।
समान नागरिक संहिता इस पूरी राजनीतिक यात्रा का पहला निर्णायक पड़ाव रहा। यह केवल कानूनी ढांचे में बदलाव नहीं था, बल्कि एक प्रतीकात्मक कदम भी था जिसने यह संदेश दिया कि सरकार उन विषयों को भी नीति के स्तर पर ले जाने को तैयार है जिन्हें लंबे समय तक विवादास्पद या टाले जाने योग्य माना जाता रहा। इस फैसले ने धामी को राष्ट्रीय विमर्श में स्थापित किया और राज्य स्तर पर उन्हें निर्णायक नेतृत्व की पहचान दी। समर्थक इसे समानता की दिशा में बड़ा कदम बताते हैं, जबकि आलोचकों का मत है कि इस तरह के फैसले सामाजिक विविधता पर असर डाल सकते हैं। लेकिन राजनीतिक दृष्टि से यह कदम धामी को अपने वैचारिक आधार को मज़बूत करने का अवसर देता है।

राज्य का सामाजिक और सांस्कृतिक ढांचा सदियों पुरानी आध्यात्मिक परंपराओं से जुड़ा है। चारधाम, तीर्थयात्राएं, आश्रम संस्कृति, पर्वतीय लोकजीवन और धार्मिक आस्थाएं यहां की सामूहिक चेतना का हिस्सा हैं। सरकार के कार्यकाल में चारधाम समेत कई मंदिरों और धार्मिक स्थलों के पुनर्निर्माण और सौंदर्यीकरण पर काम हुआ है। नयना देवी मंदिर, कैंची धाम, बैजनाथ, जागेश्वर, कोटगाड़ी, पूर्णागिरी, बाराही धाम और देवीधूरा जैसे स्थलों के विकास को जनता में सकारात्मक संदेश के रूप में देखा जा रहा है। दिलचस्प है कि इसे केवल धार्मिक मुद्दे के रूप में नहीं, बल्कि सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक संरचना की रक्षा के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। इस विमर्श के माध्यम से सरकार यह संकेत देती है कि राज्य का आध्यात्मिक चरित्र विकास की दौड़ में खोने नहीं दिया जाएगा।
भूमि से जुड़ा प्रश्न भी इसी वैचारिक ढांचे का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है। बड़े पैमाने पर अतिक्रमण हटाने की कार्रवाइयों को प्रशासनिक कदम से अधिक सामाजिक और राजनीतिक संदेश के रूप में देखा जा रहा है। यह संदेश दिया जा रहा है कि सरकारी भूमि, सार्वजनिक संसाधन और सामुदायिक संपत्तियां किसी भी प्रकार के अवैध कब्जे से मुक्त रखी जाएंगी। पर्वतीय क्षेत्रों में भूमि केवल आर्थिक संसाधन नहीं, बल्कि सामाजिक अस्तित्व और सांस्कृतिक निरंतरता का आधार मानी जाती है। इसलिए भूमि संरक्षण की नीति राजनीतिक रूप से भी संवेदनशील और प्रभावी मुद्दा बनती है। जनसांख्यिकीय संतुलन और धर्मांतरण से जुड़े विमर्श ने भी राज्य की राजनीति में जगह बनाई है। धर्मांतरणरोधी कानून की सख्ती और उससे जुड़ी कार्रवाइयों को सामाजिक ताने-बाने की रक्षा के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। सरकार का तर्क है कि प्रलोभन, दबाव या षड्यंत्र के माध्यम से किए गए धर्मांतरण समाज में असंतुलन पैदा कर सकते हैं। इस विषय पर सख्त रुख अपनाना राजनीतिक रूप से स्पष्ट संदेश देता है कि सांस्कृतिक पहचान और सामाजिक संरचना को प्राथमिकता दी जाएगी।
प्रगति की रेल
हालांकि केवल वैचारिक मुद्दों पर टिके रहना किसी भी सरकार के लिए पर्याप्त नहीं होता, इसलिए राज्य में विकास की धारा को समानांतर रूप से आगे बढ़ाया जा रहा है। सड़क, पेयजल, कनेक्टिविटी, पर्यटन और शहरी बुनियादी ढांचे से जुड़ी परियोजनाओं को इस राजनीतिक मॉडल का संतुलर्न ंबदु माना जा सकता है। बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट राज्य की अर्थव्यवस्था और रोजगार संभावनाओं से जुड़े हैं। यह दिखाने की कोशिश है कि वैचारिक प्रतिबद्धता और विकास की गति एक-दूसरे के पूरक हो सकते हैं। यही कारण है कि धामी सरकार केंद्र और राज्य की योजनाओं को जनता तक पहुंचाने पर जोर दे रही है। लखपति दीदी जैसी योजनाओं के साथ स्वरोजगार और कल्याणकारी योजनाओं के लाभार्थियों को एक बड़े और निर्णायक वोट बैंक के रूप में देखा जा रहा है। बीजेपी की रणनीति यही है कि इन लाभार्थियों के दायरे को और बढ़ाकर चुनावी मजबूती हासिल की जाए। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार धामी की रणनीति चार स्तरों पर काम करती दिखाई देती है- पहला, कोर समर्थक आधार को वैचारिक संदेश के माध्यम से संगठित रखना, दूसरा, निर्णायक नेतृत्व की छवि बनाना, तीसरा, विकास के जरिए व्यापक वर्गों तक पहुंच बनाना और चौथा, विपक्ष के नैरेटिव का त्वरित प्रतिकार करना। यह मॉडल राष्ट्रीय राजनीति में अपनाए गए ढांचे से मेल खाता है, जिसमें सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और विकास को साथ लेकर चलने की कोशिश की जाती है।

विपक्ष की चुनौतियां
उत्तराखंड कांग्रेस में गणेश गोदियाल के प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद पार्टी की गतिविधियों में तेजी आई है। लेकिन विपक्ष के सामने चुनौती यह है कि वह इस वैचारिक फ्रेम को किस प्रकार तोड़े। आर्थिक मुद्दे, बेरोजगारी, महंगाई और स्थानीय असंतोष जैसे विषय विपक्ष के पास मौजूद हैं, पर उन्हें इस तरह सामने लाना होगा कि वे पहचान आधारित विमर्श पर भारी पड़ सकें। केवल आलोचना या बयानबाजी से यह संभव नहीं दिखता, इसके लिए वैकल्पिक दृष्टि और ठोस कार्यक्रम की ज़रूरत होगी। धामी के नेतृत्व शैली में आया परिवर्तन भी इस पूरी रणनीति का महत्वपूर्ण तत्व है। वे लगातार जमीनी उपस्थिति दर्ज कराते दिखाई देते हैं। दूरस्थ क्षेत्रों में दौरे, त्वरित घोषणाएं और त्वरित प्रतिक्रिया देने की शैली उनकी छवि सक्रिय नेता की बनाती है। यह छवि चुनावी राजनीति में निर्णायक भूमिका निभाती है क्योंकि मतदाता केवल घोषणाओं से नहीं, बल्कि नेतृत्व की ऊर्जा और तत्परता से भी प्रभावित होते हैं।
छोटे उद्योग ने आसान की रोजगार की राह
पर्वतीय जिलों में उद्योग स्थापना के रास्ते में वर्षों से चली आ रही भूमि की कमी अब वर्ष 2026 में बाधा नहीं बनेगी। राज्य सरकार ने एमएसएमई एवं औद्योगिक इकाइयों के लिए ग्राउंड कवरेज की सीमा बढ़ा दी है। इससे न केवल निवेश को प्रोत्साहन मिलेगा, बल्कि स्थानीय स्तर पर रोजगार के नए अवसर भी सृजित होंगे। सरकार के इस निर्णय के बाद आने वाले समय में एमएसएमई यूनिट और मध्यम उद्योग कम भूमि में भी अपनी इकाइयों का विस्तार कर सकेंगे। इससे पहाड़ों में उद्योगों की स्थापना आसान होगी और युवाओं को अपने ही क्षेत्र में रोजगार मिलने की संभावनाएं बढ़ेंगी। लंबे समय से पहाड़ी जनपदों में उद्योग लगाने में भूमि की उपलब्धता सबसे बड़ी बाधा रही है, जिसके चलते निवेशक मैदानी जिलों की ओर रुख करते थे। अब धामी सरकार ने पहाड़ी जनपदों में औद्योगिक भूमि के विचलन को कैबिनेट से अनुमोदन दे दिया है। उद्योग सचिव विनय शंकर पांडे ने कहा कि हाल ही में कैबिनेट ने पहाड़ी जनपदों में उद्योगों के कवर एरिया के अधिकतम उपयोग और विकास की अनुमति प्रदान की है। इससे भविष्य में पहाड़ी क्षेत्रों में निवेश बढ़ेगा और रोजगार के व्यापक अवसर सृजित होंगे।
स्वरोजगार से थमेगा पलायन
राज्य में अक्षय ऊर्जा, हर्बल एवं एरोमेटिक्स, उद्यानिकी और फूलों की खेती, पर्यटन, रिवर र्रांफ्टग, एडवेंचर टूरिज्म और तीर्थाटन जैसे सेवा क्षेत्र में हरित उद्योगों की स्थापना से न केवल पर्यावरण संरक्षण को बल मिलेगा, बल्कि पहाड़ों से हो रहे पलायन पर भी प्रभावी रोक लगेगी। युवाओं को अपने घर के पास ही रोजगार और स्वरोजगार के अवसर मिलेंगे। बदरीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री जैसे प्रसिद्ध धार्मिक और पर्यटन स्थलों में सेवा क्षेत्र के उद्योगों के विकसित होने से हजारों युवाओं को घर बैठे रोजगार से जुड़ने का अवसर मिल रहा है।
कौशल विकास पर जोर
उद्योगों को कुशल और प्रशिक्षित कामगार उपलब्ध कराने के लिए सरकार कौशल विकास पर विशेष जोर दे रही है। देवभूमि उद्यमिता संस्थान के माध्यम से उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे युवाओं को नवाचार और उद्यमिता से जोड़ा जा रहा है। राज्य के सभी आईटीआई और पॉलिटेक्निक संस्थानों में अध्ययनरत छात्र-छात्राओं को विशेष कौशल प्रशिक्षण दिया जा रहा है। इसके साथ ही उद्योगों की आवश्यकताओं के अनुरूप आईटीआई का पाठ्यक्रम तैयार किया जा रहा है, ताकि स्थानीय युवाओं को रोजगार योग्य बनाया जा सके और उद्योगों को दक्ष मानव संसाधन उपलब्ध हों।
मज़बूत होती वित्तीय तस्वीर
उत्तराखंड ने बीते वर्षों में न केवल खुद को एक राजस्व सरप्लस स्टेट के रूप में स्थापित किया है, बल्कि आमदनी बढ़ाने और केंद्र सरकार की ओर से सुझाए गए वित्तीय एवं संरचनात्मक सुधारों को लागू करने में भी स्पष्ट राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखाई है। राज्य गठन के 25 वर्षों की यात्रा में जहां शुरुआती दौर में संसाधनों की सीमाएं और वित्तीय दबाव चुनौती बने रहे, वहीं अब राज्य की आर्थिक सेहत में निरंतर सुधार दिखाई दे रहा है। राज्य सरकार ने वित्तीय अनुशासन को प्राथमिकता देते हुए उन क्षेत्रों पर विशेष ध्यान केंद्रित किया है, जहां पहले निर्णयों में हिचक और क्रियान्वयन में ढिलाई देखने को मिलती थी।
खास तौर पर पूंजीगत बजट खर्च को लेकर सरकार की सक्रियता बढ़ी है। बुनियादी ढांचे, सड़कों, स्वास्थ्य, शिक्षा और अन्य विकास कार्यों के लिए निर्धारित पूंजीगत व्यय को समयबद्ध ढंग से खर्च करने पर जोर दिया गया है, जिससे विकास की गति को वास्तविक आधार मिला है। इसके साथ ही सरकार ने यह भी दिखाया है कि आर्थिक अनुशासन का अर्थ केवल खर्च पर नियंत्रण नहीं, बल्कि सामाजिक सुरक्षा और जनकल्याण में निवेश बढ़ाना भी है। पेंशन, स्वास्थ्य सहायता, महिला एवं बाल कल्याण, ग्रामीण विकास जैसी योजनाओं पर अधिक बजट खर्च करने का साहसिक निर्णय इस बात का संकेत है कि सरकार विकास को समावेशी बनाने की दिशा में आगे बढ़ रही है। आय बढ़ाने के मोर्चे पर भी उत्तराखंड ने उल्लेखनीय प्रगति की है। कर प्रशासन में सुधार, करेत्तर राजस्व स्रोतों के विस्तार और आर्थिक गतिविधियों को प्रोत्साहन देने के परिणामस्वरूप राज्य का वार्षिक कर एवं करेत्तर राजस्व अब लगभग 28 हजार करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है। यह उपलब्धि ऐसे समय में आई है, जब कई राज्य वित्तीय दबाव और घाटे से जूझ रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि राजस्व स्रोतों को मज़बूत करने और पूंजीगत व्यय को प्राथमिकता देने की यह रणनीति इसी तरह जारी रहती है, तो आने वाले वर्षों में उत्तराखंड न केवल आर्थिक रूप से सुदृढ़ होगा, बल्कि देश के विकसित और आत्मनिर्भर राज्यों की अग्रिम पंक्ति में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करा सकता है। कुल मिलाकर, उत्तराखंड की यह वित्तीय यात्रा दर्शाती है कि सीमित संसाधनों वाला पहाड़ी राज्य भी सही नीतिगत फैसलों, अनुशासन और विकास-उन्मुख दृष्टिकोण के बल पर आर्थिक मज़बूती की राह पर आगे बढ़ सकता है।



