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फायदे का सौदा!

भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते की व्याख्या

हाल ही में हुए भारत-यूरोपीय संघ व्यापार समझौते से भारत और यूरोप और करीब आ गए हैं। बरसों से अटकी इस डील ने सारी दीवारें तोड़ दी हैं। अमेरिका की आर्थिक तानाशाही पर यह करारा तमाचा है। इसी समझौते के कारण ट्रंप को झुकना पड़ा और उन्हें एक रुकी हुई डील बहाल करनी पड़ी। टैरि़फ में कटौती से देश के छोटे कारोबारियों की राह आसान होगी। ‘दस्तक टाइम्स ब्यूरो’ की खास रिपोर्ट।

भारत और यूरोपीय यूनियन के बीच हुई इस डील को आप मौके पर चौका कह सकते हैं। यह एक ऐतिहासिक डील है क्योंकि दोनों के बीच समझौते की बातचीत तकरीबन दो दशकों तक रुक-रुक कर चल रही थी। अमेरिकी दबाव के कारण यूरोपीय संघ आगे बढ़ने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था लेकिन गणतंत्र दिवस के जश्न में डूबे देश को एक अच्छी खबर मिली। भारत और यूरोपीय संघ के बीच 27 जनवरी, 2026 को 16वें भारत-यूरोपीय संघ शिखर सम्मेलन में भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते के समापन का ऐलान हुआ। कागज़ी तौर पर, यह समझौता भारत को दुनिया के सबसे बड़े व्यापारिक गुटों में से एक के और करीब ले आता है, जिसमें 27 देश और 45 करोड़ से अधिक उपभोक्ता शामिल हैं। लेकिन व्यवहार में, यह भारत को पश्चिमी व्यापार प्रणाली से और भी मजबूती से जोड़ता है, वह भी ऐसे वक्त में जब पूरी दुनिया में वैश्विक व्यापार का पुनर्गठन हो रहा है। ऐसा नहीं कि ये दोस्ती नई-नई है। भारत और यूरोपीय संघ के बीच व्यापार पहले से ही बहुत बड़ा है। 2024-25 में, दोनों देशों के बीच लगभग 137 अरब डॉलर का व्यापार हुआ, जिसमें भारत ने 76 अरब डॉलर का निर्यात और 61 अरब डॉलर का आयात किया। इससे यूरोपीय संघ भारत का तीसरा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार बन गया है। यही वजह है कि भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौता नए व्यापार द्वार खोलने के बारे में नहीं है। यह एक ऐसे समय में मौजूदा संबंधों को बेहतर बनाने के बारे में है जब वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं का पुनर्गठन हो रहा है और व्यापार नीति विशुद्ध अर्थशास्त्र के बजाय भू-राजनीति से अधिक प्रभावित हो रही है।

आप टाइमिंग देखिए। ग्रीनलैंड को लेकर यूरोपीय संघ ट्रंप से नाराज़ है। अमेरिका ग्रीनलैंड पर कब्जा करना चाहता है और यूरोपीय संघ इसके लिए राज़ी नहीं। नाटो टूटने की कगार पर है। अमेरिका यूरोपीय देशों को धमका कर उन पर टैरि़फ थोपने की धमकियां दे रहा है। इस समझौते से अमेरिका को झटका लगा है। अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने तो भारत के साथ व्यापार समझौते को लेकर यूरोपीय देशों की खुलकर आलोचना की। सीएनबीसी के साथ एक साक्षात्कार में जब बेसेंट से पूछा गया कि क्या भारत-यूरोपीय संघ व्यापार समझौता अमेरिकी हितों के लिए खतरा है, तो उन्होंने कहा कि देशों को वही करना चाहिए जो उनके लिए सबसे अच्छा हो। लेकिन उन्होंने कहा कि यूक्रेन युद्ध को देखते हुए, यूरोप की कार्रवाई से उन्हें ‘बहुत निराशा’ हुई है। बेसेंट बोले- ‘हमने रूस से तेल खरीदने पर भारत पर 25% टैरि़फ लगाया है। अनुमान लगाइए पिछले सप्ताह क्या हुआ? यूरोपीय देशों ने भारत के साथ एक व्यापार समझौता किया।’ बेसेंट ने आगे कहा, ‘यूरोपीय देश यूक्रेन-रूस युद्ध की अग्रिम पंक्ति में हैं।’ जहां भारत ने प्रतिबंधित रूसी तेल खरीदना शुरू किया, वहीं यूरोपीय देशों ने बाद में परिष्कृत उत्पाद खरीदे। उन्होंने कहा, ‘इस प्रकार, यूरोपीय देश अपने ही ़िखला़फ युद्ध को वित्तपोषित कर रहे हैं।’

इस पृष्ठभूमि में, भारत-ईयू मुक्त व्यापार समझौता, मुख्य रूप से शुल्क कटौती के बारे में कम और भारत को एक वैकल्पिक आपूर्ति-शृंखला नेटवर्क के हिस्से के रूप में स्थापित करने के बारे में अधिक है। यह समझौता किसी एक देश पर अत्यधिक निर्भरता को कम करता है। इस समझौते से भारत के 27 देशों वाले यूरोपीय संघ समूह को निर्यात में वृद्धि होने और कई घरेलू उद्योगों के लिए प्रतिस्पर्धा में बदलाव आने की उम्मीद है। यह समझौता ऐसे समय में हुआ है जब अमेरिका द्वारा लगाए गए उच्च शुल्क, कमज़ोर आपूर्ति शृंखलाओं और रूस-यूक्रेन युद्ध सहित जारी भू-राजनीतिक तनावों के कारण वैश्विक व्यापार दबाव में है। यूरोपीय संघ से इस डील के एक हफ्ते बाद अमेरिका ने भारत से अपनी रुकी हुई डील फाइनल कर ली और टैरिफ 50 से घटाकर 18 फीसद करने को मजबूर हो गया।

टैरि़फ में कटौती
अब इन सब बातों को छोड़कर, मुख्य मुद्दे पर आते हैं। यूरोपीय संघ को भारत से विनिर्मित वस्तुएं और ऊर्जा का निर्यात होता है, जबकि यूरोपीय संघ उच्च तकनीक और पूंजीगत वस्तुएं जैसे परमाणु रिएक्टर के पुर्जे और विमान आदि हमें देता है और इस मुक्त व्यापार समझौते में अधिकांश वस्तुओं पर शुल्क में भारी कटौती की गई है या उन्हें पूरी तरह से समाप्त कर दिया गया है। भारत मूल्य के हिसाब से यूरोपीय संघ से आयात होने वाली 93% वस्तुओं पर शुल्क समाप्त करेगा। यूरोपीय संघ भारत से निर्यात होने वाली 99% वस्तुओं पर शुल्क खत्म करेगा। यह भारत जैसे श्रम-प्रधान और निर्यात-उन्मुख उद्योगों के लिए एक बहुत फायदे का सौदा है।

आइए, इस पर विस्तार से नज़र डालें, सबसे पहले उन उद्योगों से शुरुआत करें जिन्हें भारत-यूरोपीय संघ व्यापार समझौते से लाभ होगा। वस्त्र, परिधान, चमड़े के सामान, जूते और रत्न एवं आभूषण ऐसे क्षेत्र हैं जहां शुल्क अभी भी बहुत मायने रखता है। इसे समाप्त करने से बांग्लादेश और वियतनाम जैसे देशों से आने वाले ऑर्डर भारत के पक्ष में जा सकते हैं, खासकर उन कंपनियों के लिए जो पहले से ही बड़े पैमाने पर काम करती हैं और यूरोपीय गुणवत्ता मानकों को पूरा करती हैं। मौजूदा 10% तक के टैरि़फ को हटाने से इलेक्ट्रॉनिक्स विनिर्माण और इंजीनिर्यंरग उत्पादों की कीमतों में भी समय के साथ वृद्धि हो सकती है। यूरोपीय कंपनियां राजनीतिक और नियामक स्थिरता के लिए चीन पर निर्भरता कम करने में लगी है। इसके लिए वह अपनी आपूर्ति श्रृंखलाओं में सक्रिय रूप से विविधता ला रही हैं। एक अन्य उद्योग जो विशेष रूप से अच्छी स्थिति में है, वह है भारत का रबर उद्योग, जहां भारत को पहले से ही एक मज़बूत प्राकृतिक लाभ प्राप्त है क्योंकि यह दुनिया के सबसे बड़े प्राकृतिक रबर उत्पादकों में से एक है। साथ ही भारत वैश्विक टायर और ऑटोमोटिव मूल्य शृंखलाओं का एक प्रमुख आपूर्तिकर्ता है। दरअसल, भारत पहले से ही भारतीय सतत प्राकृतिक रबर पहल के माध्यम से यूरोपीय संघ के वनों की कटाई विरोधी नियमों को पूरा करने की दिशा में काम कर रहा है, जिसका मकसद वनों की कटाई को कम करने सहित पर्यावरण के अनुकूल और प्राकृतिक रबर उत्पादन को बढ़ावा देना है।

दवाओं का खुला बाज़ार
इसके अलावा, भारत पहले से ही यूरोप को बड़ी मात्रा में सस्ती दवाइयां सप्लाई करता है। यूरोप की बढ़ती हुई बुज़ुर्गों की आबादी के कारण स्वास्थ्य सेवाओं की मांग भी बढ़ेगी, जिससे यह मुक्त समझौता हमारे दवा उद्योग के लिए भी संरचनात्मक रूप से महत्वपूर्ण हो जाता है। अमेरिका की अनिश्चितता को देखते हुए, यह समझौता बेहद स्वागत योग्य है। हालांकि, व्यापार समझौतों से अक्सर सभी को लाभ नहीं होता। कई भारतीय क्षेत्रों को इससे फायदा होगा, वहीं कुछ अन्य क्षेत्रों को यह समझौता थोड़ा चुनौतीपूर्ण लग सकता है। जैसे भारतीय ऑटोमोबाइल निर्माताओं को लंबे समय से यूरोपीय निर्माताओं से भारी संरक्षण प्राप्त था, जिसके तहत उच्च आयात शुल्क लागू थे। यानी यूरोप के ऑटोमोबाइल प्रोडक्ट टैरि़फ के कारण भारत में महंगे बिकते थे। इस संरक्षण के कारण प्रीमियम यूरोपीय कारें भारतीय उपभोक्ताओं की पहुंच से काफी हद तक बाहर थीं। इस मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) के तहत आने वाले वर्षों में शुल्क 70-100% से घटकर 10-40% हो जाएगा। हालांकि इससे उपभोक्ताओं के लिए विकल्पों में वृद्धि हो सकती है, लेकिन इससे मध्य से प्रीमियम सेगमेंट में काम कर रहे भारतीय निर्माताओं पर दबाव बढ़ सकता है। भारत में महंगी कारों का बाजार गिर सकता है। समय के साथ, यह दबाव या तो एकीकरण को मज़बूर कर सकता है या भारतीय ऑटोमोबाइल निर्माताओं को प्रतिस्पर्धी बने रहने के लिए साझेदारी, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और निर्यात में तेजी लाने के लिए प्रेरित कर सकता है।

विदेशी शराब सस्ती
भारत का शराब और स्पिरिट उद्योग भारी आयात शुल्क से बुरी तरह प्रभावित रहा है, जिसके चलते यूरोपीय शराब महंगी बनी रही और चुने हुए ग्राहकों तक ही सीमित रही। लेकिन भारत-यूरोपीय संघ व्यापार समझौते के तहत, इन शुल्कों को चरणबद्ध तरीके से 150% से घटाकर 20% किया जाएगा, जिससे यूरोपीय शराब और स्पिरिट की कीमतें काफी प्रतिस्पर्धी हो जाएंगी। इससे घरेलू उत्पादकों, विशेष रूप से प्रीमियम भारतीय व्हिस्की, वोदका और वाइन ब्रांडों पर दबाव पड़ सकता है, जो प्राइज रेंज में ऊपर उठने की कोशिश कर रहे हैं। भारत में विदेशी शराब लोकप्रिय है। समझौते के बाद ये सस्ती हो जाएगी। स्थापित यूरोपीय ब्रांडों के कम कीमतों पर बाजार में आने से, भारतीय कंपनियों को वैश्विक स्तर पर पहचान बनाने या ब्रांड स्थापित करने से पहले ही घरेलू बाजार में अपनी हिस्सेदारी खोने का खतरा है।

टैरि़फ दरें
प्रीमियम खाद्य पदार्थों के क्षेत्र में भी इसी तरह की चुनौती सामने आ सकती है। यूरोप से आयातित उत्पाद जैसे पनीर, चॉकलेट, जैतून का तेल और विशेष प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थ, अपनी मज़बूत ब्रांड पहचान और स्थापित गुणवत्ता के लिए जाने जाते हैं। कम टैरि़फ से ये आयात भारतीय उपभोक्ताओं के लिए अधिक सुलभ हो जाएंगे, जिससे घरेलू कारीगरों और छोटे पैमाने के उत्पादकों के लिए प्रतिस्पर्धा बढ़ जाएगी। कई भारतीय प्रीमियम ब्रांड अभी अपने ग्रोथ साइकिल के शुरुआती चरण में हैं और उच्च लागत और कम लाभ के साथ काम करते हैं, जिससे उनके लिए बड़े यूरोपीय उत्पादकों के साथ प्रतिस्पर्धा करना मुश्किल हो सकता है, जिन्हें बड़े पैमाने पर उत्पादन, सब्सिडी और सुव्यवस्थित आपूर्ति शृंखलाओं का लाभ मिलता है।

यूरोप में नौकरी आसान होगी
हालांकि, भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते का शायद सबसे कम चर्चित पहलू सेवाओं और लोगों से जुड़ा है। यह समझौता केवल शुल्क तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसमें पेशेवरों के लिए एक व्यापक गतिशीलता ढांचा भी शामिल है। इसका मतलब यह है कि भारतीय इंजीनियर, आईटी पेशेवर, डॉक्टर और यहां तक कि पारंपरिक चिकित्सा विशेषज्ञ भी यूरोप में अल्पकालिक अवधि के लिए काम आसानी से कर सकते हैं। उदाहरण के लिए, यह समझौता इंट्रा-कॉर्पोरेट ट्रांस़फरी (आईसीटी) और कॉन्ट्रैक्चुअल सर्विस सप्लायर्स (सीएसएस) को सॉफ्टवेयर से लेकर अनुसंधान एवं विकास तथा शिक्षा तक दर्जनों क्षेत्रों में भारत और यूरोपीय संघ के सदस्य देशों के बीच आवागमन की अनुमति देता है। वास्तव में, एफटीए स्पष्ट रूप से आईटी और आईटी-सक्षम सेवाओं, पेशेवर सेवाओं, शिक्षा और अनुसंधान क्षेत्रों का विस्तार करता है। इसलिए व्यवहार में, यूरोपीय संघ की किसी परियोजना पर काम करने वाले भारतीय आईटी सलाहकार या जर्मन कारखाने में भेजे गए इंजीनियर को वीजा संबंधी कम दिक्कतों का सामना करना पड़ेगा।

छात्रों का फायदा
छात्रों और युवा पेशेवरों को भी इससे लाभ होगा। इस समझौते में छात्रों की आवागमन और अध्ययन के बाद रोजगार के लिए एक ढांचा शामिल है। दूसरे शब्दों में, प्रतिभाशाली भारतीय स्नातकों के लिए यूरोप में अध्ययन करना और वहीं रहकर काम करना आसान हो सकता है। प्रतिभाओं के इस आदान-प्रदान से वैश्विक कौशल और नेटवर्क विकसित हो सकते हैं। स्वाभाविक रूप से, इसका अर्थ यह भी है कि भारत वस्तुओं के साथ-साथ लोगों का भी ‘निर्यात’ कर रहा है। विदेशों में कार्यरत भारतीय पेशेवर जहां प्रौद्योगिकी और निवेश के लिए पुल का काम करते हैं, वहीं इसका एक दूसरा पहलू भी है- प्रतिभा पलायन का वास्तविक खतरा। इस मुक्त व्यापार समझौते से पहले भी भारत बड़ी संख्या में छात्रों को विदेश भेज रहा था। नीति आयोग की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि 2024 में, विदेश जाने वाले छात्रों की संख्या भारत में आने वाले छात्रों की संख्या से लगभग 25 गुना अधिक थी, और यह अंतर लगातार बढ़ रहा है। इसका मतलब यह है कि जहां युवा पेशेवरों और शोधकर्ताओं को अवसर मिलेंगे, वहीं चुनौती यह सुनिश्चित करने की होगी कि प्रतिभा का प्रवाह भारत और यूरोप दोनों के लिए लाभकारी साबित हो।

गौरतलब बात यह है कि भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौता श्रम प्रधान उद्योगों में हमारी मज़बूती और बढ़ते सेवा निर्यात को पुरस्कृत करता है। लेकिन इसका यह भी अर्थ है कि कुछ भारतीय उद्योगों को अपने प्रदर्शन में सुधार करना होगा। और जैसे-जैसे प्रतिभा और कौशल उत्पादों की तरह ही व्यापार योग्य होते जा रहे हैं, हमें प्रतिभाओं के आगमन और पलायन के बीच संतुलन बनाए रखना होगा। हालांकि, पुल के दोनों ओर कुछ लोगों को फायदा होगा और कुछ को नुकसान, लेकिन उम्मीद यह है कि कुल मिलाकर इस आदान-प्रदान से भारत के साथ-साथ यूरोप में भी विकास, रोजगार और नवाचार को बढ़ावा मिलेगा।

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