पुुलिसिया चेहरे पर गुलाबी रंग

प्रसंगवश

ज्ञानेन्द्र शर्मा

स्तम्भ : ऐसे बहुत कम अवसर आते हैं जब पुलिस आम आदमी को दोस्त नजर आती है। वरना लोग उससे डरते हैं, उसे ज्यादातर मौकों पर अपने से दूर रखना चाहते हैं। बहुत कम लोग हैं, जो जरूरत होने पर भी पुलिस थाने जाना पसंद करते हैं। जनता पुलिस वालों को बड़े लोगों, बड़े नेताओं और यहां तक कि अपराधियों की मददगार मानती है। वह पुलिस वालों को सलाम तो बजाती है मगर सम्माजनक दूरी से।

पुलिस की छवि किसने बिगाड़ी है? जब कुछ नहीं मिलता तो पुलिस वाले कहते हैं प्रेस ने हमारी इमेज खराब की है और अखबार वाले कहते हैं पुलिस अपनी छवि बिगाड़ने के लिए खुद ही जिम्मेदार है। वह लोंगों से दोस्ताना व्यवहार नहीं करती, जब वे मुसीबत में होते हैं, उनकी मदद नहीं करती, बड़े-बड़ों की खुशामद करती है और निर्दोषों को दोषी लोगों से अलग रखने में कोई दिलचस्पी नहीं लेती।

ऐसे में जब कहीं किसी कोने से ‘पुलिस जिन्दाबाद’ के नारे गूंजते सुनाई देते हैं, तो सबकी निगाहें उसी दिशा में चली जाती हैं। पिछले साल 6 दिसम्बर को आन्ध्र प्रदेश के हैदराबाद में ऐसे ही पुलिस जिन्दाबाद के नारे लगे थे और अब अभी 10 जुलाई 2020 को कानपुर से कुछ किलोमीटर दूर एक गांव के पास से ऐसे ही नारे सुनाई पड़े तो बहुत सारे उन लोगों की बहस का मुद्दा दूसरी तरफ मुड़ गया, जो पुलिस के जाने-माने आलोचक हैं और इसी सबके चलते इस साल जब 20 मार्च को उन चार हत्यारों को फांसी दी गई जो ‘निर्भया’ के वीभत्स बलात्कार और हत्या के मुलजिम थे, तो पुलिस की जिन्दाबाद नहीं हुई।
पहले बात करते हैं पिछले साल हैदराबाद में हुई घटनाओं की।

आन्ध्र प्रदेश के हैदराबाद में जब 27 नवम्बर 2019 को दिशा नाम की लड़की की बलात्कार के बाद जघन्य तरीके से हत्या कर दी गई तो सारे देश में तहलका मच गया और लोगों को 16 दिसम्बर 2012 की वह ठण्डी रात याद आ गई जब दिल्ली में निर्भया की अत्यंत घिनौने, वीभत्स और जघन्य तरीके से सामूहिक बलात्कार के बाद हत्या कर दी गई थी। लेकिन जल्दी ही सारा किस्सा पलट गया।

तेलंगाना पुलिस ने गजब की फुर्ती दिखाते हुए चारों अभियुक्तों को एक हफ्ते के अंदर अंदर पकड़ लिया। फिर जब पुलिस वाले इन अभियुक्तों को लेकर घटनास्थल पर घटना की पुनर्रचना करने के उद्देश्य से ले गए तो वहां 6 दिसम्बर 2019 को जो मुठभेड़ हुई, उसमें चारों हत्यारे घटनास्थल पर ही मारे गए। फिर क्या था, जो भीड़ इकट्ठा हुई उसने पुलिस कमिश्नर सजनार और पुलिस की टुकड़ी की जिन्दाबाद के नारों से आसमान गुंजा दिया।

आन्ध्र की गृह मंत्री सुचरिता ने पुलिस की तरफदारी करते हुए कहा कि कानून ने अपना काम किया है पुलिस के पास इसके अलावा कोई चारा नहीं था कि वह गोली चलाती क्योंकि चारों अभियुक्तों ने पुलिस की गिरफ्त से भागने की कोशिश की थी।

कल 10 जुलाई को जब आतंक का पर्याय बन गए विकास दुबे का ऐसा ही एनकाउंटर हुआ तो कानपुर देहात जिले के उस छोटे से गांव में ‘पुलिस जिन्दाबाद’ के नारे गूंज उठेे। दरअसल इस बार ये नारे भी लगभग उसी तरह से एक हफ्ते बाद लगे जैसे हैदराबाद में पिछले साल लगे थे। दोनों राज्य एक दूसरे से बहुत दूर हैं लेकिन पुलिस के जयकारे की वजह एक ही थी।

विकास दुबे का मामला थोड़ा भिन्न जरूर है लेकिन किसी तरह की सहानुभूति का जरा भी हकदार नहीं है। आज बहुत से लोग हैदराबाद की किलिंग और दूसरी मुठभेड़ों से जोड़कर दोनों की बराबरी कर रहे हैं, पर दोनों घटनाएं तुलना करने या बराबरी करने लायक हैं नहीं।

विकास दुबे और उसके 25-30 गुर्गों ने जिस तरह पुलिस वालों की निर्मम हत्या की, उसके बाद उनकी सजा यही थी जो कोर्ट की बजाय सीधे पुलिस ने दे दी और वाहवाही लूट ली।

3 जुलाई को कानपुर नगर जिले के चौबेपुर थाने के एक गांव में की गई आठ पुलिस वालों की हत्या जिस जघन्य तरीके से की गई, वह कोई दुर्घटना नहीं, एक सोची समझी सामूहिक हत्या थी जिसकी माफी पुलिस ने नहीं दी तो वह ठीक ही था क्योंकि उसकी वर्दी पर दाग लग रहा था। इसमें एक हफ्ते का विलम्ब तक तो लोगों को बर्दाश्त नहीं हुआ था। विकास के लोगों ने एक उपाधीक्षक सहित आठ लोगों को बहुत निर्मम तरीके से मारा, कुएं के पाट पर लाशें रखकर उन्हें जलाकर सबूत मिटाने की कोशिश की और अपनी दुर्दांंतता की मोहर पुलिस की छाती पर लगाने की कोशिश की।

कहा यह जाता है कि बहुतों को पुलिस ने ही अपराधी सरगना बनाया क्योंकि जब पुलिस या उससे जुड़ा तंत्र जनता को न्याय नहीं दिला पाता तो उसके विकल्प के तौर पर वे पुलिस व प्रशासन से लोहा ले सकने वालों को ढूंढ लेते हैं।

जो लोग पुलिस मुठभेड़ों की घटनाओं के आलोचक हैं, वे भूल जाते हैं कि पुलिस, प्रशासन और न्यायिक सिस्टम की तुलना में ये माफिया सरगना, न केवल कम समय में बल्कि सस्ता न्याय दिला देते हैं। तो खाली मुठभेड़ों पर नहीं, उनकी पारिस्थितिक हकीकतों को समझना और बूझना आज समय की मांग और एक बड़ी जरूरत की बात है।

आखिर इस बात पर भी तो ध्यान दिया जाय कि दिल्ली के निर्भया कांड की बहुत तेजी से हुई सुनवाई के बाद भी चारों दंरिदों को फांसी पर झुलाने में हमारे तंत्र को पूरे साढ़े सात साल लगे और जो गले पुलिस की जिन्दाबाद प्रस्फुटित करना भी चाहते थे, इस देरी से रुंधकर रह गए।

16 दिसम्बर 2012 की दिल्ली पर पुती कालिख निर्भया दो हफ्ते भी नहीं बर्दाश्त कर पाई। 29 दिसम्बर 2012 को वह चल बसी और उस दिन तक हत्यारों को फांसी दिए जाने की मांग से पूरा देश गूंजता रहा था, हैदराबाद और कानपुर देहात की लय पर। उन चार को सजा तो एक साल में हो गई थी लेकिन न्यायिक तंत्र से पूर्ण न्याय मिल पाने में निर्भया की अतृप्त आत्मा को और उसके जिंदा मां-बाप को 20 मार्च 2020 तक सांस रोके रखना पड़ा था।


तो फिर?
अंत में:-
अब तो सत्ताधारियों और अपराधियों
की मिलीभगत का खामियाजा भुगत
रही जनता को न्याय मिलने की
तारीख मुकर्रर होनी ही चाहिए !!