आसान नहीं है चीतों का पुनर्वास

- in स्तम्भ
आसान नहीं है चीतों का पुनर्वास

प्रमोद भार्गव : देश में अफ्रीकी चीता आने की उम्मीद बढ़ रही हैं। इन्हें पालने का अवसर टाइगर स्टेट का दर्जा प्राप्त मध्य प्रदेश को मिल सकता है। दरअसल चीते के अनुकूल वातावरण मध्य प्रदेश के दो अभ्यारण्यों में मौजूद है। ये कूनो-पालपुर और नौरादेही हैं। भारतीय वन्यजीव संस्थान देहरादून ने अंतिम परीक्षण के लिए दोनों अभ्यारण्यों में विशेषज्ञों के दल भेज दिए हैं। ये बारीकी से इन क्षेत्रों में आवास, आहार और प्रजनन की सुविधाओं का अध्ययन करेंगे। यदि ये अभ्यारण्य इस परीक्षा में खरे उतरते हैं तो चीतों को बसाने का सिलसिला शुरू हो जाएगा। यह कवायद सर्वोच्च न्यायालय के दिशा-निर्देशों के मुताबिक की जा रही है।

सर्वोच्च न्यायालय ने 75 साल पहले संपूर्ण रूप से लुप्त हो चुके चीते के पुनर्वास की अनुमति मध्य-प्रदेश सरकार के वन-विभाग को दी है। टाइगर स्टेट का दर्जा प्रप्त मध्य-प्रदेश में इन चीतों को दक्षिण अफ्रीका के नमीबिया से लाकर सागर जिले के नौरादेही या श्योपुर के कूनो-पालपुर अभ्यारण्य में नया ठिकाना बनाया जाएगा। यहां पिछले एक दशक से चीतों को बसाने की तैयारी के लिए अनुकूल परिस्थितियां बनाई जा रही हैं। दरअसल, चीते को घास के मैदान वाले जंगल पसंद हैं। नौरादेही इसी के लिए जाना जाता है। हालांकि इन्हें बसाने के विकल्प के रूप में श्योपुर जिले का कूनो-पालपुर अभ्यारण्य और राजस्थान के शाहगढ़ व जैसलमेर के थार क्षेत्र भी तलाशे गए थे, लेकिन इन वनखंडों में चीतों के अनुकूल प्राकृतिक आहार, प्रजनन व आवास की सुविधा न होने के कारण नौरादेही को ज्यादा श्रेष्ठ माना गया। यह अनुमति राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) की याचिका पर दी गई है।

एक समय था जब चीते की रफ्तार भारतीय वनों की शान हुआ करती थी। लेकिन 1947 के आते-आते चीतों की आबादी पूरी तरह लुप्त हो गई। 1948 में अंतिम चीता छत्तीसगढ़ के सरगुजा में देखा गया था। जिसे मार गिराया गया। चीता तेज रफ्तार का आश्चर्यजनक चमत्कार माना जाता है। अपनी विशिष्ट एवं लोचपूर्ण देहयष्टि के लिए भी इस हिंसक वन्य जीव की अलग पहचान थी। शरीर में इसी चपलता के कारण यह जंगली प्राणियों में सबसे तेज दौड़ने वाला धावक था। मध्य प्रदेश में चीतों की बसाहट की जाती है तो नौरादेही के 53 आदिवासी बहुल ग्रामों को विस्थापित करना होगा। इस अभ्यारण्य के विस्तार के लिए 1100 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र प्रस्तावित है। यह इलाका सागर, नरसिंहपुर एवं छतरपुर जिलों में फैला हुआ है। सबसे ज्यादा विस्थापित किए जाने वाले 20 ग्राम सागर जिले में हैं। हालांकि इनमें से 10 ग्रामों का विस्थापन पहले ही किया जा चुका है। शेष ग्राम छतरपुर व नरसिंहपुर जिलों के राजस्व ग्राम हैं, जिनका विस्थापन होना है। गोया, जितना कठिन चीतों का पुनर्वास है, उससे ज्यादा कठिन व खर्चीला काम ग्रामों का विस्थापन है। क्योंकि चीतों एवं सिंहों के जब-जब देश में पुनर्वास के प्रयत्न हुए हैं, असफल ही रहे हैं।

दरअसल, दक्षिण अफ्रीका के जंगलों से 1993 में दिल्ली के चिड़ियाघर में चार चीते लाए गए थे लेकिन छह माह के भीतर ये चारों चीते मर गए। चिड़ियाघर में इनके आवास, परवरिश व प्रजनन के पर्याप्त उपाय किये गये थे, लिहाजा उम्मीद थी कि यदि इनकी वंशवृद्धि होती है तो देश के अन्य चिड़ियाघरों व अभ्यारण्यों में ये चीते स्थानांतरित किये जाएंगे। हालांकि चीतों द्वारा चिड़ियाघरों में प्रजनन अपवाद घटना होती है। नतीजतन प्रजनन संभव होने से पहले ही चीते मर गए।
बीती सदी में चीतों की संख्या एक लाख तक थी लेकिन अफ्रीका के खुले घास वाले जंगलों से लेकर भारत सहित लगभग सभी एशियाई देशों में पाया जाने वाला चीता अब पूरे एशियाई जंगलों में गिनती के रह गए हैं। राजा चीता (एसिनोनिक्स रेक्स) जिम्बाब्बे मेंं मिलता है। अफ्रीका के जंगलों में भी गिने-चुने चीते रह गए हैं। तंजानिया के सेरेंगती राष्ट्रीय उद्यान और नमीबिया के जंगलों में गिने-चुने चीते हैं। प्रजनन के तमाम आधुनिक व वैज्ञानिक उपायों के बावजूद जंगल की इस फुर्तीली नस्ल की संख्या बढ़ाई नहीं जा पा रही है। यह प्रकृति के समक्ष वैज्ञानिक दंभ की नाकामी है। जूलॉजिकल सोसायटी ऑफ लंदन की रिपोर्ट को मानें तो दुनिया में 91 प्रतिशत चीते 1991 में ही समाप्त हो गए थे। अब केवल 7100 चीते पूरी दुनिया में बचे हैं। एशिया के ईरान में केवल 50 चीते शेष हैं। अफ्रीकी देश केन्या के मासीमारा क्षेत्र को चीतों का गढ़ माना जाता था लेकिन अब इनकी संख्या गिनती की रह गई है।

इस सदी के पांचवें दशक तक चीते अमरीका के चिड़ियाघरों में भी थे। प्राणी विशेषज्ञों की अनेक कोशिशों के बाद इन चीतों ने 1956 में शिशुओं को जन्म भी दिया, परंतु किसी भी शिशु को बचाया नहीं जा सका। चीते द्वारा किसी चिड़ियाघर में जोड़ा बनाने की यह पहली घटना थी, जो नाकाम रही। जंगल के हिंसक जीवों का प्रजनन चिड़ियाघरों में आश्चर्यजनक ढंग से प्रभावित होता है इसलिए शेर, बाघ, तेंदुए व चीते चिड़ियाघरों में जोड़ा बनाने की इच्छा नहीं रखते हैं। भारत में चीतों की अंतिम पीढ़ी के कुछ सदस्य बस्तर-सरगुजा के घने जंगलों में थे, जिन्हें 1947 में देखा गया था। प्रदेश अथवा भारत सरकार इनके संरक्षण के जरूरी उपाय करने हेतु हरकत में आती, इससे पहले ही चीतों के इन अंतिम वंशजों को भी शिकार के शौकीन राजा-महाराजाओं ने मार गिराया और वन की तेज गति के ताबूत में अंतिम कील भी ठोंक दी। इस तरह भारतीय चीतों की नस्ल पर पूर्ण विराम लग गया।

हमारे देश के राजा-महाराजाओं को घोड़ों और कुत्तों की तरह चीते पालने का भी शौक था। चीता शावकों को पालकर इनसे जंगल में शिकार कराया जाता था। राजा लोग जब जंगल में आखेट के लिए जाते थे तो प्रशिक्षित चीतों को बैलगाड़ी में बिठाकर साथ ले जाते थे। इनकी आंखों पर पट्टी बांध दी जाती थी, जिससे यह किसी मामूली वन्य जीव पर न झपटे। जब शिकार राजाओं की दृष्टि के दायरे में आ जाता था तो चीते की आंखों की पट्टी खोलकर शिकार की दिशा में हाथ से इशारा कर दिया जाता था। पलक झपकते ही शिकार चीते के कब्जे में होता।

भारत के कई राजमहलों में पालतू चीतों से शिकार कराने के अनेक चित्र अंकित हैं। मुगलकाल में अकबर ने सैंकड़ों चीतों को बंधक बनाकर पाला। मध्य प्रदेश में मांडू विजय से लौटने के बाद अकबर ने चंदेरी और नरवर (शिवपुरी) के जंगलों में चीतों से वन्य प्राणियों का शिकार कराया। नरवर के जंगलों में अकबर ने जंगली हाथियों का भी खूब शिकार किया। ग्वालियर रियासत में सिंधिया राजाओं ने भी चीते पाले हुए थे, लेकिन चीतों को पाले जाने का शगल ग्वालियर रियासत में बीसवीं सदी के अंत तक ही संभव रहा। मार्को पोलो ने तेरहवीं शताब्दी के एक दस्तावेज का उदाहरण देते हुए बताया है कि कुबलई खान ने अपने कारोबार के पड़ाव पर एक हजार से भी अधिक चीते पाल रखे थे। इन चीतों के लिए अलग-अलग अस्तबल थे। चीते इस पड़ाव की चौकीदारी भी करते थे। बड़ी संख्या में चीतों को पालतू बनाने से इनके प्रकृतिजन्य स्वभाव पर प्रतिकूल असर तो पड़ा ही, इनकी प्रजनन क्रियाओं पर भी बेहद प्रतिकूल असर पड़ा। गुलामी की जिंदगी गुजारने व सईस के हंटर की फटकार की दहशत ने इन्हें मानसिक रूप से दुर्बल बना दिया, जिससे चीतों ने विभिन्न शारीरिक क्रियाओं में रुचि लेना बन्द कर दिया। जब चाहे तब भेड़-बकरियों की तरह हांक लगा देने से भी इनकी सहजता प्रभावित हुई। चीतों की ताकत में कमी न आए इसके लिए इन्हें मादाओं से अलग रखा जाता था। बैलों की तरह नर चीतों को बधिया करने की क्रूरताएं भी राजा-महाराजाओं ने खूब अपनाईं। इन सब कारणों से जंगल की इस बिजली की रोशनी मंद पड़ती गई और इक्कीसवीं शताब्दी के मध्य के आसपास एशिया भर में बुझ भी गई।
चिड़ियाघरों में चीता की आयु 15-16 वर्ष तक देखी गई है। इनकी औसत उम्र 20 साल होती है।

दरअसल एक ओर तो हम विलुप्त होते प्राणियों के संरक्षण में लगे हैं, दूसरी तरफ आधुनिक विकास इनके प्राकृतिक आवास उजाड़ रहा है। पर्यटन से हम आमदनी की बात चाहे जितनी करें, लेकिन पर्यटकों को बाघ, तेंदुआ व अन्य दुर्लभ प्राणियों को निकट से दिखाने की सुविधाएं, इनके स्वाभाविक जीवन को अंततः बुरी तरह प्रभावित करती हैं। विचारणीय प्रश्न यह भी है कि जब चीता विलुप्ति के निकट पहुंच रहा था, तभी इसको बचाने के उपाय सफेद शेर की तरह क्यों नहीं किए गए? चीते जैसे प्राणियों के आचार-व्यवहार के साथ संकट यह भी है कि ये नए जलवायु में आसानी से ढल नहीं पाते हैं।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)