भारत की कल्पना शक्ति के ‘गाइड’ थे आर के नारायण

विमल अनुराग

पुण्यतिथि पर विशेष

भारत में अंग्रेजी उपन्यासों के प्रति आकर्षण भाव बढ़ाने वाले, हृदय स्पर्शी कृतियों की रचना करने वाले, भारत के विचार जगत को अनुपम उपहार देकर पद्म भूषण, पद्म विभूषण और साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त करने वाले भारतीय कल्पना शक्ति के कलमकार और गाइड आर के नारायण की आज पुण्यतिथि है। मेरा मन कहता है अब वे स्वर्गलोक के लोगों के लिए रोचक उपन्यास लिख रहे होंगे।

10 अक्टूबर, 1906 को चेन्नई में जन्में आर के नारायण का पूरा नाम राशीपुरम कृष्णास्वामी अय्यर नारायणस्वामी था। बचपन के दिनों में आर के नारायण के परिवार के लोग उन्हें प्यार से कुंजप्पा कहकर बुलाते थे। बचपन में आर के नारायण ज्यादातर अपनी नानी के घर रहे। बचपन से ही आर के नारायण को किताबें पढ़ने का बहुत शौक था। वह किताबों को पढ़ने के साथ-साथ लिखते भी थे। वर्ष 1925 में महान उपन्यासकार आर के नारायण ग्रेजुएशन की परीक्षा में अंग्रेजी विषय में फेल हो गए थे। बाद में वह अंग्रेजी की परीक्षा देकर अंग्रेजी विषय में पास हुए।

आर के नारायण ने कॉलेज के दिनों से ही लिखना शुरू कर दिया था। उनका पहला उपन्यास 1935 में ‘स्वामी एंड फ्रेंड्स’ के नाम से था। आर के नारायण ने इस उपन्यास में एक प्रसिद्द जगह जिक्र किया था, जिसे उन्होंने मालगुडी नाम दिया था। जोकि आगे इसी मालगुडी के नाम पर हिंन्दी टीवी जगत का प्रसिद्ध नाटक मालगु़डी डेज बन गया था।

वह दक्षिण भारत के एक काल्पनिक शहर मालगुडी को आधार बनाकर अधिकतर रचनाएं लिखा करते थे। 1935 में ही उनका ‘फाइनेंशियल एक्सपर्ट’ नामक हास्य उपन्यास प्रकाशित हुआ था। 1933 में शादी के बाद आर के नारायण ने मद्रास के अखबार ‘द जस्टिस’ के लिए रिर्पोटिंग की। 1937 में नारायण का अगला उपन्यास ‘द बैचलर ऑफ आर्ट्स’ और 1938 में ‘दि डार्क रूम’ आया। 1939 में पत्नी की मृत्यु ने उन्हें तोड़ दिया और वे लंबे समय तक अवसाद में रहे। इसके बाद उन्होंने अपने अगले उपन्यास ‘द इंग्लिश टीचर’ की रचना की।

उनकी लघु कहानियों का पहला संग्रह, ‘मालगुडी डेज’, नवंबर 1942 में प्रकाशित हुआ था। इसके बाद नारायण ने ‘इंडियन थॉट पब्लिकेशन’ नाम से खुद की प्रकाशन कंपनी शुरू की, जिसे आज भी उनके परिवार के सदस्यों द्वारा चलाया जा रहा है। 1947 में नारायण ने जेमिनी स्टूडियो की फिल्म ‘मिस मालिनी’ के लिए पटकथा लिखी। 1956 में उन्होंने ‘द गाइड’ लिखा था। इसे उनका श्रेष्ठतम उपन्यास माना जाता है।

आर.के. नारायण को ऐसे बड़े कहानीकार के रूप में याद किया जाता है, जिन्होंने कहा था कि कहानियां छोटी ही लिखी जानी चाहिए। ‘मालगुडी डेज’ की प्रस्तावना में नारायण ने लिखा भी है, ‘कहानी छोटी ही होनी चाहिए, इस पर दुनिया में सभी एकमत हैं, लेकिन उसकी परिभाषा अलग-अलग ढंगों से की जाती है।

आर के नारायण और ऐतिहासिक फिल्म ‘गाइड’ 

आर के नारायण के उपन्यास पर ही आधारित थी भारत की मशहूर फिल्म गाइड जो फिल्म अभिनेता देवानंद की पहली रंगीन फिल्म थी और यह वाकई इतनी रंगीन थी कि मुझे लगता है कि इसने भारतीय सिनेमा के लिए इंद्रधनुषी कल्पनाशक्ति का निर्माण कर दिया। कोई ना रोको दिल की उड़ान को दिल वो चला … गाता रहे मेरा दिल तू ही मेरी मंज़िल और तेरे मेरे सपने अब एक संग हैं जैसे गीतों ने गाइड को भारतीय सिनेमा का गुमान बना दिया।

आर के नारायण उन पहले भारतीय लेखकों में से थे जिनको विश्वस्तर पर साहित्यिक ख्याति मिली। गाइड नामक उपन्यास के लिए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त हुआ था। इस उपन्यास में प्रेम का उत्कर्ष तो है ही, इसमें जीवन के बहुत से अर्थ खुलकर सामने आते हैं। इसमें संबंधों की उलझी हुई परतों को बहुत मार्मिक ढंग से व्यक्त किया गया है।

गौरतलब है कि सत्यजीत रे आर के नारायण के उपन्यास गाइड पर आधारित फिल्म बनाना चाहते थे और उस फिल्म में उस दौर की मशहूर अभिनेत्री वहीदा रहमान को इसमें बतौर अभिनेत्री कास्ट करना चाहते थे। उन्होंने वहीदा को यह उपन्यास पढ़ने को भी दिया था लेकिन इसी समय देवानंद साहब ने गाइड उपन्यास की किसी से जानकारी पाने के बाद उसे पूरी पढ़ गए।

अंततः गाइड 1965 में देवानंद को एक नया मकाम दे गई। 1967 में सर्वश्रेष्ठ अभिनेता, अभिनेत्री, निर्देशक, फ़िल्म- सब फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार गाइड को ही मिले थे। संगीत के मामले में भी गाइड बेमिसाल थी। देव आनंद को हमेशा मलाल रहा कि इसे फ़िल्मफ़ेयर का सर्वश्रेष्ठ संगीत पुरस्कार नहीं मिला था। गाइड एकमात्र ऐसी भारतीय फ़िल्म है जिसे आधिकारिक तौर पर कान फ़िल्म फ़ेस्टिवल में शामिल किया गया।

(लेखक संगीत, साहित्य, कला संबंधी मामलों के जानकार हैं)