कोटद्वार: कोटद्वार (पौड़ी) की पहाड़ियों से एक ऐसी कहानी सामने आई है, जो हौसले, जिम्मेदारी और आत्मनिर्भरता की सच्ची तस्वीर पेश करती है। चौबट्टाखाल क्षेत्र के गिंवली गांव की रहने वाली सानिया राणा ने उस राह को चुना, जिस पर आमतौर पर महिलाएं कम ही नजर आती हैं। टैक्सी चलाना उनका पेशा ही नहीं, बल्कि परिवार को संभालने का जरिया भी बन गया है।
पिता के सपनों को बनाया अपनी ताकत
सानिया के पिता कमलेश सिंह राणा खुद टैक्सी चलाते थे और उनकी हमेशा से यही इच्छा थी कि उनकी बेटी भी अपने पैरों पर खड़ी हो। इसी सोच के साथ सानिया ने पिता से ही ड्राइविंग सीखनी शुरू की। 18 साल की उम्र पूरी होते ही उन्होंने व्यावसायिक लाइसेंस भी बनवा लिया था। उस समय शायद उन्हें भी अंदाजा नहीं था कि यही हुनर एक दिन उनकी सबसे बड़ी ताकत बन जाएगा।
तेरहवीं के बाद संभाली जिम्मेदारी
इस साल जनवरी में जब पिता की गंभीर बीमारी का पता चला, तो परिवार पर संकट आ गया। 2 फरवरी को उनके निधन के बाद घर की जिम्मेदारियां अचानक बढ़ गईं। लेकिन सानिया ने हालात के आगे घुटने नहीं टेके। पिता की तेरहवीं के तुरंत बाद ही उन्होंने कार का स्टेयरिंग थाम लिया और सड़कों पर उतर आईं।
हर दिन पहाड़ की सड़कों पर हौसले की ड्राइव
आज सानिया रोजाना सतपुली, नौगांवखाल और चौबट्टाखाल के रास्तों पर सवारी लेकर जाती हैं। जरूरत पड़ने पर कोटद्वार और देहरादून तक भी ड्राइव करती हैं। पहाड़ी रास्तों की चुनौतियां उनके हौसले को कमजोर नहीं कर पातीं, बल्कि हर दिन उन्हें और मजबूत बनाती हैं।
पिता की सीख बनी जीवन का सहारा
सानिया बताती हैं कि वह आगे पढ़ाई के साथ कंप्यूटर सीखना चाहती थीं, लेकिन पिता ने उन्हें समझाया था कि जब घर में ही रोजगार का साधन है तो उसी को अपनाना बेहतर होगा। उन्होंने पिता की इस बात को दिल से स्वीकार किया और ड्राइविंग को ही अपना पेशा बना लिया। अब वही फैसला उनके लिए सहारा बन चुका है। पिता द्वारा कार के लिए लिया गया ऋण भी अब सानिया खुद ही चुका रही हैं।
परिवार का सहारा बनी सानिया
घर में मां, बड़ी बहन, बड़ा भाई और भाभी हैं। ऐसे में सानिया अपने भाई के साथ मिलकर पूरे परिवार का सहारा बनी हुई हैं। उनकी कहानी सिर्फ एक बेटी की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि उस सोच की भी मिसाल है जो हालात बदलने का हौसला देती है।




