सुप्रीम कोर्ट ने रद की FIR: शादी का वादा टूटना नहीं बनाता दुष्कर्म का मामला

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने शादी का झूठा वादा कर दुष्कर्म के आरोप में दर्ज प्राथमिकी (FIR) को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल इस आधार पर दुष्कर्म का मामला नहीं बनता कि शादी का वादा पूरा नहीं हुआ। यह निर्णय ऐसे रिश्तों पर लागू होगा जो आपसी सहमति से बने हों और बाद में विवाद या कड़वाहट की स्थिति में बदल गए हों।
सुप्रीम कोर्ट का तर्क
जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुइयां की पीठ ने कहा कि हर रिश्ता जो शादी तक नहीं पहुंचता, उसे ‘झूठा वादा’ या दुष्कर्म नहीं माना जा सकता, खासकर जब संबंध आपसी सहमति से बने हों। कोर्ट ने यह टिप्पणी छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के पिछले साल के आदेश की चुनौती वाली अपील पर सुनाई, जिसमें बिलासपुर में फरवरी 2025 में दर्ज FIR को रद्द करने से इनकार किया गया था।
मामले के तथ्य और कोर्ट की चिंता
इस मामले में शिकायतकर्ता और आरोपित दोनों ही वकील हैं। शिकायतकर्ता 33 वर्षीया विवाहित महिला और एक बच्चे की मां थी। कोर्ट ने कहा कि महिला पहले से विवाहित होने के कारण कानूनी रूप से आरोपित के साथ शादी करने की पात्र नहीं थी। कोर्ट ने कहा, “कानून द्विविवाह की अनुमति नहीं देता और एक वकील होने के नाते शिकायतकर्ता को इस बात का पता होना चाहिए था। यह मानना कठिन है कि शिकायतकर्ता कानून से अनजान थी और उसे शादी के बहाने यौन संबंध बनाने के लिए बरगलाया गया।”
रिश्तों में विवाद को अपराध न बनाएं
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पुराने फैसलों में यह देखा गया है कि टूटे हुए रिश्तों को अपराध का रूप देने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। अदालतों को यह अंतर करना चाहिए कि कौन से मामले केवल आपसी विवाद या भविष्य में मन बदलने के कारण उत्पन्न हुए हैं।
FIR और कार्यवाहियां रद्द
पीठ ने कहा कि शिकायतकर्ता कोई भोली-भाली महिला नहीं थी और उसे अपने विवेक का इस्तेमाल करना चाहिए था। अंततः सुप्रीम कोर्ट ने माना कि आरोप पूरी तरह निराधार हैं और फरवरी 2025 में बिलासपुर में दर्ज FIR तथा इसके बाद की सभी कार्यवाहियां रद्द की जाती हैं।



