
खुलकर अपनों से बात करें और समस्या का उचित समाधान पाएं
यौन एवं प्रजनन स्वास्थ्य जागरूकता दिवस 12 फरवरी पर विशेष
–मुकेश शर्मा
देश की आधी आबादी यानि महिलाओं और खासकर किशोर-किशोरियों (10 से 19 वर्ष) को पूरी तरह से स्वस्थ और सशक्त बनाने के लिए सरकार और स्वास्थ्य विभाग के माध्यम से कई योजनाएं संचालित की जा रही हैं। इन योजनाओं का समुचित लाभ उठाने के लिए बड़ी तादाद में महिलाएं और किशोर-किशोरियां आगे भी आ रही हैं किन्तु कुछ भ्रांतियों के चलते आज भी कई बीमारियों या रोगों के बारे में वह खुलकर बात करने से अपनों तक से कतराते हैं या झिझक महसूस करते हैं। इनमें प्रमुख रूप से शामिल है यौन जनित रोग (संक्रमण), जिसके बारे में वह अपनों से भी बात करने से हिचकते हैं। इस बारे में जागरूकता लाने और भ्रांतियों को जड़ से मिटाने के लिए ही हर साल 12 फरवरी को यौन एवं प्रजनन स्वास्थ्य जागरूकता दिवस मनाया जाता है।
किशोरावस्था शारीरिक, मानसिक और सामाजिक बदलावों का दौर होता है, ऐसे में देश के इन कर्णधारों को सही दिशा दिखाने के लिए भी आज का यह खास दिन बहुत मायने रखता है। यौन एवं प्रजनन स्वास्थ्य के बारे में सुनी-सुनाई बातों और इंटरनेट पर उपलब्ध जानकारियों के भरोसे किशोर-किशोरियों को छोड़ने से बेहतर है कि उनसे खुलकर बात करें और उनकी जिज्ञासाओं को शांत करें ताकि उनके सुनहरे भविष्य का रास्ता तैयार हो सके। इसी उद्देश्य से स्कूलों में किशोर/किशोरियों की काउंसिलिंग की व्यवस्था की जाती है। किशोर स्वास्थ्य क्लिनिक और साथिया केंद्र किशोरावस्था के बारे में सही जानकारी देने के साथ ही स्वास्थ्य समस्याओं का निदान भी करते हैं। इसके अलावा निकटतम सरकारी अस्पतालों के चिकित्सकों, आशा, एएनएम और घर के निकट स्थित आयुष्मान भारत आरोग्य मंदिर (हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर) पर तैनात सामुदायिक स्वास्थ्य अधिकारी (सीएचओ) की भी ऐसे में मदद ली जा सकती है।

किशोरावस्था बदलाव का दौर, जिज्ञासाओं को शांत करना जरूरी
इस दिवस का मूल मकसद किशोर-किशोरियों और महिलाओं को यौन स्वास्थ्य के बारे में जागरूक करने के साथ ही प्रजनन स्वास्थ्य के बारे में भी समुचित जानकारी मुहैया कराना है। गर्भ निरोधक साधनों के फायदे समझाने के साथ ही परिवार नियोजन के बारे में जागरूक बनाना है ताकि महिलाएं खुद से निर्णय लेने में सक्षम बन सकें कि उन्हें कब और कितने बच्चे चाहिए। यौन संचरित संक्रमण (एसटीआई) एक बड़ी समस्या है किन्तु लोग इस मुद्दे पर बात करने से कतराते हैं, जिसका असर किशोर-किशोरियों और दम्पति के प्रजनन स्वास्थ्य पर भी पड़ सकता है। इसलिए यौन और प्रजनन स्वास्थ्य को केवल शारीरिक स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से देखने की जरूरत नहीं है बल्कि उसे मानसिक और सामाजिक सरोकारों से भी जोड़कर देखने की आवश्यकता है। इसके लिए सुरक्षित गर्भनिरोधक विधियों के बारे में शिक्षित करने के साथ ही यौन संचरित संक्रमण और एचआईवी की रोकथाम और उनके लक्षणों और बचाव के बारे में भी समझ को विकसित करने की जरूरत है।
इसके अलावा गर्भ न ठहरना या बच्चा न होने की समस्या को लेकर भी लोगों की भ्रांतियों को दूर किया जाना चाहिए और इस बारे में अपने साथी से खुलकर बात करनी चाहिए। सर्वाइकल और कैंसर की स्क्रीनिंग 30 वर्ष और उससे ऊपर की महिलाओं का अवश्य हो ताकि इस गंभीर बीमारी से आधी आबादी को आसानी से बचाया जा सके। इसमें जरूरी टीकाकरण की भी अहम भूमिका होती है। इसके साथ ही यौन हिंसा और भेदभाव जैसी स्थितियों से उबारकर किशोर-किशोरियों और महिलाओं को शारीरिक, मानसिक स्वस्थ्य प्रदान कर उन्हें समाज की मुख्य धारा से जोड़ने की जिम्मेदारी निभाने के लिए भी आज का यह खास दिन हम सभी को प्रेरित करता है।
आज के समय में तमाम गर्भनिरोधक साधनों की मौजूदगी के बाद भी अनचाहा गर्भ धारण करना और असुरक्षित गर्भपात की स्थितियां इस ओर साफ़ इशारा करती हैं कि अभी इस मुद्दे पर समुदाय को जागरूक बनाने की सख्त जरूरत है। इसकी शुरुआत घर के बड़े-बुजुर्गों से होनी चाहिए ताकि वह अपनी आने वाली पीढ़ी को यौन और प्रजनन स्वास्थ्य के बारे में खुलकर बता सकें और संकोच व झिझक से बाहर निकलकर इस गंभीर मुद्दे पर बात करने में सहज महसूस कर सकें। महिलाओं को रजोनिवृत्ति (मेनोपाज) से होने वाले शारीरिक बदलावों और दिक्कतों आदि के बारे में भी शिक्षित किया जाना चाहिए।
(लेखक पापुलेशन सर्विसेज इंटरनेशनल इंडिया के एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर हैं)



