अपनी ही बीमारी पर तरुण का शोध, एम्स से पीएचडी पूरी; 20 मिनट प्राणायाम से सिकल सेल दर्द में राहत

रायपुर में सिकल सेल बीमारी से जूझ रहे मरीजों के लिए एक नई उम्मीद सामने आई है। डीप ब्रीथिंग की विशेष पद्धति पर आधारित शोध में यह सामने आया है कि नियमित प्राणायाम से न केवल शारीरिक बल्कि मानसिक स्वास्थ्य पर भी सकारात्मक असर पड़ता है। इस शोध के अनुसार, रोजाना केवल 20 मिनट प्राणायाम करने से सिकल सेल के दर्द और दिमाग पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभाव को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
एम्स में शोध, खुद की बीमारी बनी प्रेरणा
यह शोध अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) रायपुर के शरीर क्रिया विज्ञान विभाग के शोधार्थी तरुण साहू ने किया है। उन्होंने ‘सिकल सेल बीमारी में धीमी-गहरी श्वास (प्राणायाम) का मस्तिष्क और शरीर की कार्यप्रणाली पर प्रभाव’ विषय पर पीएचडी पूरी की। खास बात यह है कि तरुण खुद बचपन से इस बीमारी से पीड़ित रहे हैं। वर्षों तक दर्द और इलाज के अनुभव ने उन्हें इस बीमारी को समझने और समाधान खोजने के लिए प्रेरित किया।
21 दिन के अभ्यास से मिले सकारात्मक परिणाम
तरुण ने वर्ष 2020 में एम्स में प्रवेश लेकर इस विषय पर शोध शुरू किया। उन्होंने 60 लोगों पर अध्ययन किया, जिनमें 30 सिकल सेल मरीज और 30 स्वस्थ व्यक्ति शामिल थे। शोध में पाया गया कि सिकल सेल मरीजों के मस्तिष्क तक पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं पहुंचने के कारण उनकी सोचने-समझने की क्षमता प्रभावित होती है। इसके समाधान के लिए उन्होंने 20 मिनट की विशेष प्राणायाम पद्धति विकसित की, जिसे 21 दिनों तक कराया गया और इसके परिणाम बेहद सकारात्मक रहे।
दवाओं के साथ बेहतर हुए स्वास्थ्य के मापदंड
शोध के दौरान मरीजों में डिप्रेशन और स्ट्रेस का स्तर सामान्य लोगों की तुलना में काफी अधिक पाया गया। वहीं हीमोग्लोबिन स्तर भी काफी कम था। 21 दिनों के नियमित अभ्यास के बाद इन सभी मापदंडों में सुधार दर्ज किया गया और मरीजों का स्वास्थ्य स्तर सामान्य के करीब पहुंच गया। इस दौरान आवश्यक दवाओं के साथ परीक्षण भी किए गए, जिनके परिणाम संतोषजनक रहे।
दिल और दिमाग पर दिखा सकारात्मक प्रभाव
डीप ब्रीथिंग की इस तकनीक से हृदय गति नियंत्रित होती है, ब्लड प्रेशर स्थिर रहता है और मस्तिष्क में ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ती है। इससे पुराना दर्द, सांस फूलने जैसी समस्याओं में राहत मिलती है और मानसिक क्षमता में भी सुधार होता है। इस शोध में विभागाध्यक्ष प्रोफेसर डॉ. रंजन सिन्हा के मार्गदर्शन में अन्य विशेषज्ञों का भी सहयोग रहा।
संघर्षों से भरा सफर बना प्रेरणा
तरुण का जीवन बचपन से ही इस बीमारी के कारण संघर्षपूर्ण रहा। कम उम्र में ही उन्हें बार-बार अस्पताल में भर्ती होना पड़ा और कई बार एक दिन में कई यूनिट रक्त चढ़ाना पड़ा। 12वीं के दौरान अस्पताल में दो मरीजों की मौत देखने के बाद उन्होंने तय किया कि वह इस बीमारी के लिए कुछ ठोस करेंगे।
ऑपरेशन के बाद भी नहीं रुके, बने गोल्ड मेडलिस्ट
भिलाई निवासी तरुण ने अपनी पढ़ाई के दौरान भी कठिन परिस्थितियों का सामना किया। एमएससी के अंतिम सेमेस्टर से पहले पित्त की थैली के ऑपरेशन के बावजूद उन्होंने परीक्षा दी और न केवल विश्वविद्यालय बल्कि पूरे प्रदेश में शीर्ष स्थान हासिल कर गोल्ड मेडल प्राप्त किया।



