उत्तर प्रदेशराज्यवाराणसी

सादगी, विश्वसनीयता और गरिमा की वह आवाज जो एक युग की पहचान बन गई

सरला माहेश्वरी : स्क्रीन से स्मृतियों तक अमिट उपस्थिति

कुछ आवाज़ें केवल सूचना नहीं देतीं, वे समय का दस्तावेज़ बन जाती हैं। सरला माहेश्वरी उन्हीं दुर्लभ आवाज़ों में शामिल थीं, जिन्होंने समाचार पढ़ने की परंपरा को केवल पेशा नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी का स्वरूप दिया। वे उस दौर की प्रतिनिधि थीं, जब समाचार प्रस्तुति में चमक-दमक नहीं, बल्कि गंभीरता, गरिमा और विश्वसनीयता का वर्चस्व हुआ करता था। सरला माहेश्वरी का चेहरा केवल दूरदर्शन की स्क्रीन पर दिखने वाला चेहरा नहीं था, बल्कि वह करोड़ों भारतीय परिवारों की दिनचर्या का हिस्सा बन चुका था। उनकी सधी हुई वाणी, संतुलित भाव-भंगिमा और सादगी से सजी उपस्थिति यह भरोसा दिलाती थी कि जो शब्द उनके होंठों से निकल रहे हैं, वे केवल खबर नहीं बल्कि तथ्य और विश्वास की धरोहर हैं। उस समय जब सूचना के साधन सीमित थे, तब उनके माध्यम से देश-दुनिया की हलचलें घर-घर तक पहुंचती थीं।

सुरेश गांधी

भारतीय पत्रकारिता और दूरदर्शन के स्वर्णिम इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय अब स्मृतियों में दर्ज हो गया है। दूरदर्शन की जानी-मानी वरिष्ठ समाचार वाचिका सरला माहेश्वरी का 71 वर्ष की आयु में निधन न केवल मीडिया जगत के लिए, बल्कि उस पीढ़ी के करोड़ों दर्शकों के लिए भावनात्मक क्षति है, जिसने समाचारों को उनके स्वर में विश्वसनीयता और मर्यादा का रूप लेते देखा था। उनका जाना केवल एक व्यक्तित्व का अवसान नहीं, बल्कि पत्रकारिता के उस अनुशासित और संयमित दौर का धुंधलाना है, जहां शब्दों की गरिमा और प्रस्तुति की शालीनता ही पहचान हुआ करती थी। सरला जी का जीवन पत्रकारिता के लिए एक प्रेरणा है। उन्होंने यह सिद्ध किया कि सादगी, शालीनता और भाषा की शुद्धता भी दर्शकों के दिलों में स्थायी स्थान बना सकती है। आज जब मीडिया निरंतर बदलाव के दौर से गुजर रहा है, तब उनका व्यक्तित्व एक आदर्श की तरह सामने आता है, जो पत्रकारिता को उसकी मूल आत्मा से जोड़ता है।

सरला माहेश्वरी अब भले ही हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन भारतीय मीडिया के इतिहास में उनकी उपस्थिति सदैव उस मजबूत आधारशिला की तरह दर्ज रहेगी, जिस पर विश्वास और गरिमा की पत्रकारिता खड़ी होती है। उनकी आवाज़ भले ही मौन हो गई हो, लेकिन उनकी स्मृति और योगदान आने वाली पीढ़ियों को पत्रकारिता के मूल मूल्यों की याद दिलाते रहेंगे। आज जब मीडिया का स्वरूप तेजी से बदल रहा है और प्रस्तुति की शैली में आकर्षण और प्रतिस्पर्धा हावी हो चुकी है, ऐसे में सरला माहेश्वरी जैसे व्यक्तित्व उस युग की याद दिलाते हैं, जब पत्रकारिता में मर्यादा, संतुलन और गरिमा सर्वोपरि हुआ करती थी। वे केवल समाचार वाचक नहीं थीं, बल्कि पत्रकारिता की विश्वसनीयता का जीवंत प्रतीक थीं। उनका जाना केवल एक व्यक्ति का निधन नहीं, बल्कि उस युग की स्मृतियों का धुंधलाना भी है, जिसने भारतीय जनमानस को सूचना और विश्वास के सूत्र में बांधकर रखा। सरला जी भले ही आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी आवाज़, उनकी शैली और उनकी सादगी भारतीय मीडिया इतिहास में सदैव एक आदर्श के रूप में गूंजती रहेगी।

विश्वास की वह आवाज, जिसने घर-घर में बनाई जगह
1970 के दशक में जब भारत में संचार के साधन सीमित थे और दूरदर्शन सूचना का सबसे सशक्त माध्यम माना जाता था, उस समय सरला माहेश्वरी ने अपने पत्रकारिता जीवन की शुरुआत की। धीरे-धीरे वे केवल समाचार पढ़ने वाली एंकर नहीं रहीं, बल्कि भारतीय समाज में भरोसे का पर्याय बन गईं। उस दौर में समाचार वाचकों की भूमिका मनोरंजन नहीं, बल्कि जनविश्वास को मजबूत करने की जिम्मेदारी से जुड़ी होती थी और सरला माहेश्वरी ने इस दायित्व को पूरी गरिमा के साथ निभाया। उनकी प्रस्तुति में कृत्रिम आकर्षण नहीं, बल्कि सहज आत्मविश्वास और स्पष्ट उच्चारण की दृढ़ता दिखाई देती थी। सलीके से पहनी हुई साड़ी, माथे की सादगी भरी बिंदी और कैमरे से संवाद करती उनकी गंभीर दृष्टि दर्शकों को यह विश्वास दिलाती थी कि समाचार केवल सूचना नहीं, बल्कि सामाजिक उत्तरदायित्व का दस्तावेज है।

सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ा व्यक्तित्व
सरला माहेश्वरी का संबंध राजस्थान की सांस्कृतिक परंपराओं से जुड़े माहेश्वरी समाज से था, जो भारतीय वैश्य परंपरा का एक प्रतिष्ठित और ऐतिहासिक समुदाय माना जाता है। यह समाज अपनी व्यापारिक दक्षता, धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक अनुशासन के लिए प्रसिद्ध रहा है। भगवान शिव और माता माहेश्वरी के प्रति गहरी श्रद्धा रखने वाला यह समुदाय सामाजिक मूल्यों और परंपराओं के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता आया है। संभवतः यही सांस्कृतिक संस्कार सरला जी के व्यक्तित्व में झलकते थे, जो उनकी भाषा की शुद्धता और प्रस्तुति की मर्यादा में स्पष्ट रूप से दिखाई देते थे।

तीन दशकों का गौरवशाली और प्रेरणादायक सफर
सरला माहेश्वरी ने वर्ष 1976 में दूरदर्शन से अपने पेशेवर जीवन की शुरुआत की थी। प्रारंभिक दिनों में उन्होंने बच्चों के कार्यक्रमों के लिए लेखन का कार्य भी किया। इस अनुभव ने उनकी भाषा को संवेदनशीलता, सहजता और प्रभावशीलता प्रदान की। यह गुण आगे चलकर उनकी समाचार प्रस्तुति की सबसे बड़ी ताकत बना। उन्होंने भारतीय टेलीविजन पत्रकारिता के विकास को बहुत करीब से देखा और जिया। वह दौर जब दूरदर्शन ब्लैक एंड व्हाइट प्रसारण से रंगीन दुनिया की ओर बढ़ रहा था, उस ऐतिहासिक परिवर्तन की वह प्रत्यक्ष साक्षी रहीं। तकनीकी बदलावों के साथ-साथ उन्होंने पत्रकारिता की मूल आत्मा को कभी कमजोर नहीं होने दिया।

इतिहास के संवेदनशील क्षणों की साक्षी आवाज
सरला माहेश्वरी केवल सामान्य समाचार वाचन तक सीमित नहीं रहीं। उन्होंने देश के कई महत्वपूर्ण और संवेदनशील घटनाक्रमों को अपनी आवाज के माध्यम से जनता तक पहुंचाया। मई 1991 में पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या की खबर जब देश में स्तब्धता और शोक का वातावरण लेकर आई, तब उसी गंभीर और संतुलित स्वर में यह दुखद समाचार देशवासियों तक पहुंचा था। ऐसे अवसरों पर उनकी प्रस्तुति केवल सूचना नहीं, बल्कि राष्ट्रीय भावनाओं का संयमित प्रतिबिंब बन जाती थी।

जब एंकर होते थे गरिमा के प्रतीक
आज का मीडिया तेज प्रतिस्पर्धा, दृश्य आकर्षण और त्वरित प्रस्तुति के युग में प्रवेश कर चुका है, जहां समाचार अक्सर शैली और प्रभाव के बीच संतुलन खोजते नजर आते हैं। लेकिन सरला माहेश्वरी उस पीढ़ी की प्रतिनिधि थीं, जब एंकर लोकप्रियता के नहीं, बल्कि सम्मान और विश्वसनीयता के प्रतीक हुआ करते थे। उनका व्यक्तित्व यह संदेश देता था कि पत्रकारिता केवल पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति नैतिक दायित्व है।

स्मृतियों में जीवित रहेगा एक युग
पिछले कुछ वर्षों से सरला माहेश्वरी सार्वजनिक जीवन से दूर थीं। समय की धारा में कई चेहरे ओझल हो जाते हैं, लेकिन कुछ आवाजें स्मृतियों में स्थायी रूप से अंकित हो जाती हैं। उनके निधन की खबर ने उन अनगिनत दर्शकों को भावुक कर दिया है, जिनके लिए समाचार का अर्थ ही सरला माहेश्वरी का स्वर हुआ करता था।

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