दस्तक-विशेष

दलित वोटों के दो युवा दावेदार!

संजय सक्सेना, लखनऊ

उत्तर प्रदेश की दलित राजनीति में लम्बे समय के बाद एक नया दौर देखने को मिल रहा है। दो नये दलित युवा चेहरे दलित वोटरों के बीच अपनी-अपनी पैठ बनाने को बेताब नजर आ रहे हैं। पूछा यह भी जा रहा है कि क्या दलित राजनीति में मायावती अप्रसांगिक हो गईं हैं। माया युग समाप्त हो गया है। लोकसभा चुनाव के जो नतीजे आये हैं, वह भी यह संकेत दे रहे हैं कि दलितों का बहनजी से मोह भंग हो चुका है। यदि ऐसा नहीं होता तो आम चुनाव में दलित वोटर बसपा से छिटक कर कांगे्रस-सपा गठबंधन और भीम आर्मी के प्रमुख चन्द्रशेखर रावण की आजाद समाज पार्टी के साथ नहीं जाते, जिन्होंने दलित बाहुल्य वाली नगीना लोकसभा सीट से चुनाव जीता था और यहां बसपा प्रत्याशी सुरेन्द्र पाल सिंह चैथे नंबर पर रहे थे। उन्हें मात्र 13272 वोट मिले थे, जबकि 2019 में इसी सीट से बसपा के गिरीश चन्द्र को 568378 वोट मिले थे। इसी के बाद से चन्द्रशेखर को दलितों का नया रहनुमा बताया जाने लगा है। चन्द्रशेखर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के दलितों में लगातार पैठ बना रहे हैं। वह कई बार मायावती को चुनौती दे चुके हैं तो अनेक मौकों पर मायावती को अपनी बुआ बताते रहे हैं।

उधर, बसपा सुप्रीमो मायावती भी आम चुनाव में मिली करारी हार के बाद सचेत हो गई हैं। यही वजह करीब डेढ़ माह पूर्व चुनाव प्रचार के बीच मायावती ने अपने जिस भतीजे आकाश आनंद को अपरिपक्व बता कर साइड लाइन कर दिया था, उसे बहनजी ने 23 जून 2024 को एक बार फिर अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया है। आकाश को दोबारा बहुजन समाज पार्टी का राष्ट्रीय संयोजक भी बना दिया गया है। इससे पहले आकाश को उत्तराखंड उपचुनाव के लिए पार्टी का स्टार प्रचारक बनाया गया था। उनका नाम लिस्ट में मायावती के बाद दूसरे नंबर पर था। मायावती ने लखनऊ में बसपा के सभी प्रदेश प्रमुखों के साथ समीक्षा बैठक में, जिसमें आकाश आनंद भी मौजूद थे, उन्हें दोबारा अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया। आकाश आनंद ने बुआ मायावती का पैर छूकर आशीर्वाद भी लिया। मायावती ने भतीजे के सिर पर प्यार से हाथ रखकर दुलारा और पीठ थपथपाई। बता दें कि लोकसभा चुनाव के दौरान मायावती ने अपने एक फैसले से सभी को चौंका दिया था। उन्होंने भतीजे आकाश आनंद को ‘अपरिपक्व’ बताकर पार्टी के नेशनल कोऑर्डिनेटर पद से हटा दिया था। साथ ही उन्हें परिपक्व होने तक अपना उत्तराधिकारी बनाने से भी मना कर दिया था।

दरअसल, लोकसभा चुनाव के दौरान आकाश आनंद बसपा की कई सार्वजनिक रैलियों में काफी अक्रामक नजर आए थे। उनके कुछ भाषणों की काफी चर्चा हुई थी, जिसमें उन्होंने अपने विरोधियों पर तीखी टिप्पणियां की थीं। ऐसे ही एक भाषण में उन्होंने भाजपा को आतंकवादी पार्टी बता दिया था, जिसे लेकर आकाश पर एफआईआर भी दर्ज हो गई थी। राजनीतिक पंडित मान रहे थे कि आकाश के तेवरों से बसपा एक नई जान आ गई थी। इसी दौरान पार्टी प्रमुख मायावती ने आकाश को बसपा के राष्ट्रीय संयोक पद से हटाने की घोषणा कर दी। लोकसभा चुनावों में बसपा की बुरी दुर्गति हुई थी और उसका खाता भी नहीं खुल सका था। उल्टा उत्तर प्रदेश में बसपा का वोट प्रतिशत 19 फीसदी से घटकर 10 फीसदी के आसपास रह गया था। उम्मीद की जा रही है कि अबकी से आकाश आनंद लम्बी पारी खेलेंगे और अपने आक्रमक तेवर भी बरकरार रखेंगे। कुल मिलाकर बसपा प्रमुख मायावती को अब आकाश आनंद से ही चमत्कार की उम्मीद है। वैसे बसपा सुप्रीमो मायावती ने 2027 में होने वाले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को अकेले लड़ने की घोषणा करके अपने इरादे स्पष्ट कर दिये हैं। इसके साथ ही उन्होंने भतीजे आकाश आनंद से चमत्कार की बड़ी उम्मीदें जताते हुए 2007 वाले नतीजे 2027 में दोहराने की उम्मीद जताई। आकाश आनंद के सामने संगठन को मजबूत करने के अलावा बसपा के दलित वोटरों को फिर से अपने पाले में खींच कर लाने की कोशिश करनी होगी, जो आम चुनाव में इंडिया गठबंधन के साथ चले गये थे। इसके साथ-साथ आकाश आनंद के सामने एक और युवा नेता भीम आर्मी के प्रमुख चन्द्रशेखर उर्फ रावण भी चुनौती के रूप में खड़े होंगे, जिन्होंने आम चुनाव में नगीना लोकसभा सीट से चुनाव जीत कर सबको चौंका दिया था। उनके सामने भाजपा, सपा-कांगे्रस गठबंधन के साथ-साथ बसपा प्रत्याशी भी घुटने टेंकने को मजबूर हो गये थे।

यूपी की राजनीति में चंद्रशेखर आजाद नए दलित चेहरा बनकर उभरे हैं। चन्द्रशेखर का कोई राजनैतिक बैकग्राउण्ड नहीं है। उन्होंने जो कुछ भी हासिल किया है, वह अपनी मेहनत से हासिल किया है। चंद्रशेखर को यूपी की राजनीति में ना सिर्फ खुद को स्थापित करते देखा जा रहा है, बल्कि वो मजबूती से दलितों के हक में आवाज भी उठाते नजर आ रहे हैं। इस बार आम चुनाव में जब मायावती की पार्टी बसपा का खाता नहीं खुल सका है, तब चंद्रशेखर ने बिजनौर जिले की नगीना (आरक्षित) सीट से बड़े अंतर से जीत दर्ज की। इसी जीत के साथ चंद्रशेखर की जीत के मायने निकाले जाने लगे हैं और उनके दलितों के बीच पसंदीदा बनने की चर्चाएं भी सियासी गलियारों में होने लगी हैं। यह जीत दलित वोटर्स में स्पष्ट बदलाव का संकेत भी दे रही है। चंद्रशेखर ने नगीना में अकेले ही लड़ाई लड़ी, जबकि उनके सामने बसपा के साथ-साथ सपा-कांग्रेस गठबंधन और बीजेपी के नेतृत्व वाला एनडीए भी दमखम से ताल ठोक रहा था, लेकिन जीत का सेहरा चन्द्रशेखर के सिर ही बंधा। बसपा एक दशक बाद फिर चारों खाने चित हो गई है। 2014 के बाद 2024 में भी बसपा का खाता नहीं खुला है। जनाधार भी 10 प्रतिशत से ज्यादा खिसक गया है।

बात यहीं तक सीमित नहीं है, आश्चर्यजनक यह भी है कि आम चुनाव में एक भी सीट पर बीएसपी दूसरे नंबर पर नहीं आ सकी। बसपा के लिए सबसे चिंताजनक यह है कि दलित आबादी में 55 प्रतिशत हिस्सेदारी रखने वाला जाटव समाज भी उसके हाथ से चला गया है, जबकि मायावती स्वयं जाटव समाज से आती हैं। यह समाज 2024 के आम चुनाव से पहले तक उनके पीछे चट्टान की तरह खड़ा देखा जाता था लेकिन इस चुनाव में इसे बड़े वोट बैंक का बसपा से मोहभंग देखा गया। यूपी में दलित के साथ अल्पसंख्यक वोट भी बसपा के हाथ से छिटक गए हैं, यही वजह थी बसपा के मुस्लिम प्रत्यािशयों को भी मुसलमानों का वोट नहीं मिला। 2019 में बसपा का वोट शेयर 19.43 प्रतिशत था, लेकिन अब सिर्फ 9.35 प्रतिशत ही रह गया है। इन नतीजों के बाद कहा जा रहा है कि यूपी की राजनीति में चन्द्रशेखर को दलितों में नई चेतना के उभार के तौर पर देखा जा रहा है।

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