UGC की विदाई का वक़्त

सत्तर साल के यूजीसी के रिटायरमेंट का वक़्त आ गया है। केंद्र सरकार इसकी जगह ‘विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान’ यानी वीबीएसए लेकर आ रही है जो उच्च शिक्षा के आधारभूत ढांचे को बदल देगी। इस बदलाव को लेकर कई नई चिंताएं भी पैदा हुई हैं। नई दिल्ली से वरिष्ठ पत्रकार रत्नेश मिश्र की एक रिपोर्ट।
1956 में स्थापित विश्वविद्यालय अनुदान आयोग यानी यूजीसी को खत्म करके केंद्र सरकार ‘विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक’ यानी VBSA बिल लेकर आई है। इसके तहत अब हायर एजुकेशन के लिए देश में अब एक बोर्ड होगा और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC), अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (AICTE) और राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (NCTE) जैसे पुराने नियामकों को एक कर दिया जाएगा। इस बदलाव को लेकर कई नई चिंताएं भी पैदा हुई हैं। हायर एजुकेशन पर काम करने वाले दो दर्जन से ज्यादा संगठनों और मंचों ने ‘विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक’ 2025 की आलोचना करते हुए प्रस्तावित कानून को पब्लिक फंडेड हायर एजुकेशन को खत्म करने की साजिश बताया है। नेशनल एजुकेशन पॉलिसी 2020 में एक कॉमन कमीशन बनाने की बात कही गई थी जो देश में अलग-अलग हायर एजुकेशन संस्थाओं को एक छतरी के नीचे लाए। इसी के तहत हायर एजुकेशन कमीशन ऑफ इंडिया (HECI) बनाने पर विचार किया जा रहा था। अब इसे ‘विकसित भारत’ ब्रांडिंग के साथ विधेयक बनाया गया है। सरकार का कहना है कि नया ढांचा हायर एजुकेशन को सरल बनाने, नियामकीय ओवरलैप को कम करने और निजी संस्थानों में शैक्षणिक गुणवत्ता बेहतर बनाने के मकसद से तैयार किया गया है।
फंडिंग, रेगुलेटर से अलग
अब तक यूजीसी, देश में यूनिवर्सिटीज को मान्यता देता है और इन्हें जरूरी फंड रिलीज करता है। यह हायर एजुकेशन मिनिस्ट्री के तहत यूनिवर्सिटीज की शिक्षा के मानकों को तय करने और मेंटेन रखने का काम करता है। इसका हेडक्वार्टर दिल्ली में है। इसी तरह एआईसीटीई, देश में टेक्निकल एजुकेशन की नेशनल काउंसिल थी। इसका मुख्य काम डिप्लोमा, ग्रेजुएशन और पोस्ट ग्रेजुएशन की शिक्षा देने वाले स्कूलों, कॉलेजों और टेक्निकल एजुकेशन जैसे इंजीनियर एंड टेक्नोलॉजी के पाठ्यक्रम को मान्यता देना था। एक अलग संस्था एनसीटीई, टीचर्स को ट्रेनिंग देने का काम करती थी। इसके तहत हायर एजुकेशन के मानकों को तैयार किया जाता था। अब नए कानून के तहत इन तीनों को एक छतरी के नीचे लाकर हायर एजुकेशन को स्पष्ट वर्क-डिवीज़न के साथ रीस्ट्रक्चर किया जाएगा। संस्थानों का रेगुलेशन, एक्रेडिटेशन और शैक्षणिक मानक निर्धारण का काम एक बोर्ड के पास होगा। वहीं फंडिंग को इस रेगुलेटर से अलग रखा गया है। फंडिंग अभी भी संबंधित एडमिनिस्ट्रेटिव मिनिस्ट्री के तहत रेगुलेट होगी।
विकसित भारत शिक्षा बिल देश में हायर एजुकेशन की मॉनिटरिंग के लिए बनाया गया है, जिसके तहत UGC, AICTE, NCTE को विलय करके अकेला हायर एजुकेशन कमीशन बनाया जाएगा, जो हायर एजुकेशन सिस्टम के लिए नियम बनाएगी, सिलेबस-कोर्स फाइनल करेगी, वर्किंग पर नज़र रखेगी और साथ ही नियमों के उल्लंघन पर एक्शन लेगी। अगर कोई यूनिवर्सिटी या कॉलेज फर्जी निकलता है तो उस पर 10 लाख से 2 करोड़ तक का जुर्माना लगाया जाएगा। यह जुर्माना लगाने और उसे बंद करने का अधिकार भी इसी आयोग के पास होगा।

आयोग करेगा विवि-कॉलेजों के काम की मॉनिटरिंग
यह आयोग देखेगा कि किस यूनिवर्सिटी या कॉलेज का काम अच्छा है, किसका नहीं? इसके आधार पर यूनिवर्सिटी और कॉलेज की रैकिंग होगी, जिसके अनुसार सुविधाएं मिलेंगी। केंद्र सरकार को आयोग ही सलाह देगा कि भारतीय शिक्षा व्यवस्था को दुनियाभर में शिक्षा का हब बाने के लिए क्या किया जा सकता है? आयोग में एक अध्यक्ष होगा, एक एजुकेशन एक्सपर्ट, केंद्र सरकार का प्रतिनिधि और एक सेक्रेटरी होगा। आयोग के तहत अलग-अलग 3 परिषदें बनाई जाएंगी, जिनका काम अलग-अलग होगा और आयोग इनकी रिपोर्ट पर ही एक्शन लेगा। नए कानून के दायरे में सेंट्रल और स्टेट यूनिवर्सिटी, डीम्ड यूनिवर्सिटी, आईआईटी, एनआईटी, कॉलेजों, ऑनलाइन और डिस्टेंस एजुकेशन इंस्टीट्यूट आएंगे। मेडिकल, लॉ, फार्मेसी, नर्सिंग कोर्स प्रत्यक्ष रूप से इस कानून के दायरे में नहीं आएंगे, लेकिन उन्हें आयोग के द्वारा बनाए एक नियमों और निर्धारित मानकों का पालन करना होगा।
क्या होगी केंद्र सरकार की भूमिका
बिल में प्रावधान किया गया है कि केंद्र सरकार को सेंट्रल कमीशन को दिशा-निर्देश देने का अधिकार होगा। आयोग और उसकी कांउसिल के सदस्यों की नियुक्ति केंद्र सरकार ही करेगी। दूसरे देशों की यूनिवर्सिटी को भारत में मान्यता देनी है या नहीं, इसका फैसला केंद्र सरकार करेगी। आयोग या उसकी कांउसिल को भंग करने का अधिकार केंद्र सरकार के पास होगा। आयोग और काउंसिल केंद्र सरकार को वार्षिक और ऑडिट रिपोर्ट देगी।
क्या होंगे फायदे
विकसित भारत शिक्षा बिल कानून बना तो कॉलेज और यूनिवर्सिटी में एक जैसे नियम और काम करने का तरीका लागू हो जाएगा। नए कॉलेज खोले जाएंगे और नए कोर्स शुरू होंगे। साथ ही नया सिलेबस बनाकर लागू किया जाएगा। नौकरियां पाने और स्किल्स इम्प्रूव करने वाले कोर्सों की संख्या बढ़ेगी। एजुकेशन सिस्टम स्टूडेंट सेंट्रिक बनेगा। छोटे और नए कॉलेजों को समान अवसर मिलेंगे। छात्रों के लिए एक मजबूत शिकायत निवारण तंत्र बनाया जाएगा।

कुछ शंकाएं भी हैं
कमीशन के तहत किसी भी काउंसिल को HEIs की फंडिंग के लिए गठित नहीं किया गया है। विशेषज्ञों को चिंता है कि VBSA बिल के तहत शिक्षा मंत्रालय (MoE) को ग्रांट बांटने की ज़िम्मेदारी दी जाएगी। इससे ग्रांट बांटने की प्रक्रिया पहले से अधिक नौकरशाही वाली, मनमानी और राजनीतिक विचारों पर आधारित हो जाएगी। पॉलिसी बनाने के काम को फाइनेंशियल रिसोर्स के बंटवारे से अलग करके, प्रस्तावित बिल ‘पब्लिक फंडिंग’ का इस्तेमाल विचारधारा के लिए इनाम या सजा के तौर पर करेगा। यह अलग-अलग स्तर के संस्थानों (केंद्र और राज्य, सामान्य और प्रोफेशनल, वैज्ञानिक और तकनीकी, रिसर्च और वोकेशनल, मेट्रोपॉलिटन और ग्रामीण) के बीच ऊंच-नीच को भी बढ़ाएगा।
उच्च शिक्षा से जुड़े संगठनों कहना है कि इस नई व्यवस्था में केंद्र सरकार के अधिकारी उच्च शिक्षा पर काबिज़ होंगे। कमीशन के 12 सदस्यों में से 10 सदस्य या तो केंद्र सरकार द्वारा सीधे भर्ती होंगे या नामांकित “विशेषज्ञ” होंगे। शिक्षकों की संख्या घटाकर सिर्फ दो कर दी गई है, जो ऐसे निकाय में बिल्कुल भी मंजूर नहीं है जिसे देश में उच्च शिक्षा के मानक और गुणवत्ता तय करनी है। राज्य के उच्च शिक्षा संस्थानों के दोनों शिक्षक प्रतिनिधि, केंद्र सरकार के ‘नॉमिनी’ होने के नाते, राजनीतिक नियुक्तियां होने की संभावना है। कमीशन की संरचना देश की विविधता को भी नहीं दिखाती है और SC, ST, OBC, महिलाओं, ट्रांसजेंडर, विकलांग व्यक्तियों और अल्पसंख्यकों जैसे हाशिए पर पड़े समूहों को कोई प्रतिनिधित्व नहीं देती है।
विशेषज्ञों को चिंता है कि बिल के रेगुलेटरी प्रावधान-ऑथराइजेशन देना, ग्रेडेड ऑटोनॉमी और संस्थानों को बंद करने का आदेश – एक बहुत ही ज्यादा केंद्रीकृत सिस्टम बनाएगा जिससे सख्त सालाना ऑडिट, समय और संसाधनों की बर्बादी, शिक्षकों के लिए नौकरी की असुरक्षा, फीस में भारी बढ़ोतरी होगी। और इससे छात्रों और उनके परिवारों को बहुत ज्यादा परेशानी का सामना करना पड़ेगा। आखिर में, यह तथ्य कि VBSA बिल का सभी पिछले कानूनों पर ज्यादा असर होगा, देश के संघीय स्वरूप के लिए गंभीर परिणाम होगा।
इस बिल को संस्थानों की स्वायत्तता और संघवाद के सिद्धांत के लिए खतरा बताया जा रहा है। चिंता है कि VBSA बिल उच्च शिक्षा संस्थानों की सरकारी नियंत्रण से स्वायत्तता को खत्म करेगा। कमीशन द्वारा बनाए गए मानकों से जुड़े हर नियम को केंद्र सरकार से पहले मंजूरी लेनी होगी। यह न केवल शिक्षा के संवैधानिक स्वरूप का उल्लंघन करता है, जो समवर्ती सूची का हिस्सा है, बल्कि देश के उच्च शिक्षा क्षेत्र के एक बड़े हिस्से को भी जिसे राज्य सरकारों द्वारा चलाया जाता है और उससे सहायता प्राप्त है उसे केंद्र में सत्ताधारी पार्टी के साथ राजनीतिक खींचतान में डाल देगा। VBSA बिल 2025 एक संगठनात्मक बदलाव है, जिससे पब्लिक फंडेड HEIs का बहुत ज्यादा केंद्रीकरण, कमर्शियलाइज़ेशन और प्राइवेटाइज़ेशन होगा क्योंकि उन्हें आत्मनिर्भर बनने के लिए मज़बूर किया जाएगा।



