Uttarakhand : गांव-गांव चली धामी सरकार

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में जन-जन के द्वार’अभियान से लिखा जा रहा सुशासन का नया अध्याय
मुख्यमंत्री धामी ने पहाड़ों से लेकर मैदानों को नापने के साथ जनता की नब्ज़ पर भी हाथ रखा है। अब सरकारी मशीनरी गांव-गांव चल पड़ी है। ‘जन-जन की सरकार, जन जन के द्वार’ कैंपेन के बहाने 45 दिनों तक गांवों में व न्याय पंचायत स्तर पर शिविर लगाकर ग्रामीण जनमानस का दिल जीतने की तैयारी है। इसे मास्टर स्ट्रोक कहा जा रहा है। ‘दस्तक टाइम्स’ के प्रधान संपादक रामकुमार सिंह की रिपोर्ट।
उत्तराखंड में शासन की परिभाषा बदल रही है। वर्षों से चली आ रही उस प्रशासनिक व्यवस्था, जिसमें आम नागरिक को अपनी ही सरकार तक पहुंचने के लिए दफ्तरों, फाइलों और प्रक्रियाओं के चक्कर लगाने पड़ते थे, अब उसकी जगह एक नई सोच, नई कार्यशैली और नया भरोसा ले रही है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के स्पष्ट और निर्णायक निर्देशों पर प्रदेश में शुरू हुआ ‘जन-जन की सरकार, जन-जन के द्वार’अभियान इसी बदलाव का सबसे ठोस और प्रत्यक्ष प्रमाण बनकर सामने आया है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने पहाड़ों से लेकर मैदानों को नापने के साथ जनता की नब्ज़ पर भी हाथ रखा है। मुख्यमंत्री के पीछे अब सरकारी मशीनरी गांव-गांव चल पड़ी है। ‘जन-जन की सरकार, जन जन के द्वार’ के बहाने 45 दिनों तक गांवों में व न्याय पंचायत स्तर पर शिविर लगाकर ग्रामीण जनमानस का दिल जीतने की तैयारी है। नये बजट से पहले धामी सरकार ने सावधानी से यह मास्टर स्ट्रोक चला है। बहुद्देश्यीय शिविरों में 23 विभाग समस्याओं से जूझ रहे आमजन को राहत दिलाएंगे, जबकि नये बजट में जन भावनाओं और आंकाक्षाओं को मूर्त रूप देने के लिए ठोस कदम उठते दिखाई देंगे।
उत्तराखंड में अगले विधानसभा चुनाव में सवा साल ही बचा है। इसके साथ ही सत्ता के गलियारों में चुनावी तैयारियों की धमक साफ सुनाई देने लगी है। वर्षाकाल निपटने के तुरंत बाद ही मुख्यमंत्री धामी ने विकास कार्यों के साथ चुनावी एजेंडे को धार देने की योजना को अपनी शीर्ष प्राथमिकता में रखा है। प्रदेश स्तर पर लगातार सक्रियता के दौरान मिले फीडबैक के बाद जनभावनाओं को भांपकर अब धामी सरकार गांवों की ओर चल पड़ी है। पहली बार गांवों में बहुद्देश्यीय शिविरों का आयोजन बड़े और व्यापक अभियान के रूप में किया जा रहा है। हाल ही में शुरू हुआ यह अभियान 45 दिन तक चलेगा। 23 विभागों को यह जिम्मा दिया गया है कि जनता से जुड़ी समस्याओं का समाधान प्राथमिकता देकर किया जाए। हर न्याय पंचायत में कल्याण योजनाओं का लाभ पाने से न तो कोई पात्र लाभार्थी छूटे और न ही उनकी समस्याओं के समाधान में हीलाहवाली होने पाए। मुख्यमंत्री की प्राथमिकता का अंदाजा इस बात से लगा सकते हैं कि बुधवार को पहले ही दिन उन्होंने इस अभियान की समीक्षा की और जिलेवार शिविरों की प्रगति की जानकारी प्राप्त की। जनप्रतिनिधियों, संगठन और प्रशासन के समन्वय से यह संदेश भी दिया जा रहा है कि आमजन की संतुष्टि ही सरकार का ध्येय है। दरअसल, प्रदेश में ग्रामीण मतदाता निर्णायक भूमिका में हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में विधानसभा सीटों की संख्या भी अपेक्षाकृत अधिक है। गांव और ग्रामीण मतदाता सध गए तो धामी सरकार के लिए मिशन 2027 की राह आसान हो सकती है। खास बात है कि यह अभियान तो शुरुआत है, नये बजट की पोटली में ग्रामीणों की आकांक्षाओं को धरातल पर उतारने के लिए ठोस पहल दिखाई देगी।
यह अभियान केवल एक सरकारी कार्यक्रम नहीं, बल्कि उत्तराखंड में जन-केंद्रित शासन मॉडल की स्थापना की दिशा में उठाया गया सुनियोजित कदम है। 45 दिनों तक चलने वाला यह राज्यव्यापी अभियान न्याय पंचायत स्तर पर आयोजित बहुउद्देशीय शिविरों के माध्यम से सरकार और जनता के बीच की दूरी को पाटने का काम कर रहा है। राजस्व, ग्राम्य विकास, पंचायती राज, कृषि, समाज कल्याण, स्वास्थ्य, महिला एवं बाल विकास, श्रम, शिक्षा, ऊर्जा, पशुपालन, सहकारिता, आयुष, आपदा प्रबंधन सहित 23 विभागों की सेवाएं एक ही स्थान पर उपलब्ध कराई जा रही हैं, ताकि आम नागरिक को योजनाओं की जानकारी ही नहीं, बल्कि मौके पर ही लाभ मिल सके। अभियान के शुभारंभ के साथ ही प्रदेश के सभी जनपदों में जिस प्रकार आम लोगों की भागीदारी देखने को मिली, उसने यह स्पष्ट कर दिया कि यह पहल समय की मांग थी। पर्वतीय, सीमांत और दूरस्थ क्षेत्रों में रहने वाले हजारों ग्रामीणों के लिए यह अभियान किसी राहत से कम नहीं है। अब उन्हें प्रमाण पत्र, पेंशन, स्वास्थ्य सेवा या शिकायत के समाधान के लिए जिला मुख्यालय नहीं जाना पड़ रहा, बल्कि सरकार स्वयं उनके गांव और न्याय पंचायत तक पहुंच रही है।
पिथौरागढ़ जिले के विकासखंड बिण की न्याय पंचायत दौला में आयोजित शिविर इस अभियान की प्रभावशीलता का जीवंत उदाहरण बना। कुमाऊं मंडल के आयुक्त श्री दीपक रावत द्वारा शुभारंभ किए गए इस शिविर में 800 से अधिक ग्रामीणों ने भाग लिया। बुज़ुर्ग पेंशन, भूमि विवाद, प्रमाण पत्र, राशन कार्ड, स्वास्थ्य सेवा से जुड़ी हर समस्या को गंभीरता से सुना गया और अधिकांश मामलों का समाधान मौके पर ही कर दिया गया। आयुक्त के स्पष्ट निर्देश थे कि अभियान के दौरान कोई भी समस्या केवल दर्ज न हो, बल्कि उसका स्थायी और पारदर्शी समाधान सुनिश्चित किया जाए। जिलाधिकारी आशीष भटगांई ने यह जानकारी दी कि पिथौरागढ़ जिले के सभी 64 न्याय पंचायतों में इसी तरह के शिविर आयोजित किए जाएंगे, जिससे कोई भी पात्र व्यक्ति सरकारी योजनाओं से वंचित न रहे।

चम्पावत जिले के सिमल्टा में आयोजित शिविर ने यह दिखाया कि यह अभियान केवल शिकायत निस्तारण तक सीमित नहीं है, बल्कि सामाजिक संदेश और मानवीय सरोकारों को भी साथ लेकर चल रहा है। यहां 500 से अधिक ग्रामीणों को विभिन्न योजनाओं का लाभ मिला। 100 से अधिक शिकायतों का तत्काल निस्तारण किया गया। बाल विकास विभाग द्वारा बालिका जन्मोत्सव कार्यक्रम आयोजित कर नन्हीं बालिकाओं के साथ केक काटा गया, जिसने ग्रामीण समाज में सकारात्मक संदेश दिया। श्रम, चिकित्सा, महिला एवं बाल विकास, पशुपालन, डेयरी, आयुष, कृषि और सहकारिता विभाग की सेवाओं के साथ-साथ आधार कार्ड निर्माण, कृषि यंत्र वितरण और समान नागरिक संहिता के अंतर्गत पंजीकरण की सुविधा भी उपलब्ध कराई गई। अल्मोड़ा जिले में पहले ही दिन 11 विकासखंडों की 13 न्याय पंचायतों में शिविर आयोजित कर यह स्पष्ट कर दिया गया कि सरकार इस अभियान को पूरी गंभीरता से लागू करने के लिए प्रतिबद्ध है। भल्यूटा में आयोजित शिविर में दिव्यांगजनों को व्हीलचेयर और सहायक उपकरण वितरित किए गए, 77 लोगों को चिकित्सीय परामर्श दिया गया और राजस्व विभाग द्वारा भूमि प्रमाण पत्र व नाम संशोधन जैसे कार्य मौके पर ही संपादित किए गए। इससे लोगों के बीच यह संदेश गया कि प्रशासन अब समस्याओं को टालने के नहीं, बल्कि सुलझाने की मानसिकता के साथ काम कर रहा है।
बागेश्वर जिले में न्याय पंचायत गढ़सेर के अंतर्गत आयोजित शिविर में ग्रामीणों को केंद्र और राज्य सरकार की योजनाओं की जानकारी के साथ-साथ आवेदन, शिकायत निस्तारण और लाभ स्वीकृति की सुविधा एक ही स्थान पर मिली। विभागीय स्टॉलों पर उमड़ी भीड़ से यह बात स्पष्ट थी कि आमजन में प्रशासन के प्रति भरोसा बड़ी तेजी से मज़बूत हो रहा है। ऊधमसिंह नगर जिले के खटीमा में आयोजित शिविर महिला सशक्तिकरण की दिशा में एक मजबूत संदेश लेकर आया। एनआरएलएम के अंतर्गत 9 महिला स्वयं सहायता समूहों को 36.15 लाख रुपये की सहायता राशि प्रदान की गई। इससे न केवल महिलाओं की आर्थिक स्थिति मज़बूत हुई, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी गति मिली। रुद्रपुर में आयोजित शिविर में खतौनी, जाति, आय, निवास और उत्तरजीवी प्रमाण पत्र मौके पर ही जारी किए गए, जिससे आम नागरिकों को वर्षों से चली आ रही मुश्किलों से राहत मिली।
राजधानी देहरादून में अभियान की शुरुआत विकास खंड चकराता की सुदूरवर्ती न्याय पंचायत क्वांसी से होना अपने-आप में एक संदेश था कि सरकार का पहला कदम वहीं उठाएगी, जहां ज़रूरत सबसे अधिक है। जिलाधिकारी सबिन बंसल स्वयं शिविर में उपस्थित रहे। 658 से अधिक लोगों की निःशुल्क स्वास्थ्य जांच की गई, बुज़ुर्गों और दिव्यांगों को सहायक उपकरण वितरित किए गए और 80 प्रतिशत सब्सिडी पर कृषि यंत्र प्रदान किए गए। 90 वर्षीय दिव्यांग महिला रामू देवी का आधार कार्ड न बन पाने का मामला सामने आने पर जिलाधिकारी ने तत्काल समाधान के निर्देश दिए। यह घटना इस अभियान की संवेदनशीलता और मानवीय पक्ष को उजागर करती है। रुद्रप्रयाग, उत्तरकाशी, टिहरी गढ़वाल, हरिद्वार और चमोली जैसे जिलों में आयोजित शिविरों में भी ऐसी तस्वीर सामने आई। वहां भी लंबित शिकायतों का त्वरित समाधान, योजनाओं का वास्तविक लाभ और प्रशासन की सक्रिय मौजूदगी देखने को मिली। चमोली की बैरांगना न्याय पंचायत में 181 शिकायतों में से अधिकांश का मौके पर समाधान इस बात का प्रमाण है कि यह अभियान केवल प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि परिणाम देने वाला है।
इन सभी घटनाओं और अनुभवों को एक साथ देखें तो स्पष्ट होता है कि ‘जन-जन की सरकार, जन-जन के द्वार’ अभियान मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में उत्तराखंड सरकार की उस सोच का प्रतिबिंब है, जिसमें शासन को सेवा और संवाद का माध्यम माना गया है। सरकार का यह प्रयास प्रशासनिक विकेंद्रीकरण को मज़बूती देने के साथ-साथ पलायन जैसी गंभीर समस्या पर भी अप्रत्यक्ष रूप से प्रभाव डाल सकता है, क्योंकि जब सुविधाएं गांव तक पहुंचेंगी, तो लोगों का अपने क्षेत्र से जुड़ाव भी गहरा और मज़बूत होगा। मुख्यमंत्री धामी ने यह स्पष्ट कर दिया है कि सरकार की सफलता का पैमाना केवल योजनाओं की संख्या नहीं, बल्कि उन योजनाओं से लाभान्वित नागरिकों की संतुष्टि है। यही कारण है कि इस अभियान की लगातार निगरानी की जा रही है, जिलाधिकारियों से फीडबैक लिया जा रहा है और जहां आवश्यक हो, तुरंत सुधार किए जा रहे हैं। अंत में यह कहना गलत नहीं होगा कि ‘जन-जन की सरकार, जन-जन के द्वार’ अभियान उत्तराखंड में सुशासन की दिशा में एक ऐतिहासिक पहल बनकर उभरा है। यह अभियान वर्तमान की समस्याओं का समाधान तो कर ही रहा है, साथ ही भविष्य के लिए एक ऐसी प्रशासनिक परंपरा की नींव रख रहा है, जिसमें सरकार और जनता के बीच दूरी नहीं, बल्कि भरोसा और सहभागिता होगी।



