गैरसैंण (मुरारी सिंह पहाड़ी): हिंदी में एक शब्द है बिघ्नसंतोषी। इसका मतलब है ऐसा व्यक्ति या समूह जिसे किसी भी अच्छे काम में खलल डालने से बड़ा संतोष मिलता है। किसी को गिरते हुए देखने पर मजा आता है। वह खुद कोई अच्छा काम नहीं कर सकता, न चाहता है। बस उसे तो दूसरों के रंग में भंग डालने में ही आनंद आता है।

उत्तराखंड में ऐसा ही एक समूह है उत्तराखंड क्रांति दल। उसका दावा है कि उसने उत्तराखंड राज्य आंदोलन चलाया। हालांकि इसका दावा भी बहुत लोग करते हैं। बहुत से लोग तो यहां तक कहते हैं कि उत्तराखंड की मांग 1930 के आसपास शुरू हो गई थी। फिर कम्युनिस्ट पार्टी वाले दावा करते हैं कि कामरेड पीसी जोशी ने 1952 में इसकी मांग की थी। हां, इतना जरूर है कि 1979 में काशी सिंह ऐरी ने कुमाऊं विश्वविद्यालय के कुलपति डीडी पंत की अध्यक्षता में उत्तराखंड क्रांति दल बनवाया। जब तक ऐरी में दम था, तब तक यह पार्टी कुछ कुछ करती थी, जब दूसरों ने इस पर कब्जा कर लिया तब यह एक अवसरवादी पार्टी बन गई। ये लोग उत्तराखंड का कोई रोड मैप नहीं रख पाए।

बस अपने निहित स्वार्थ साधना इनका काम रह गया। उत्तराखंड में जब तक अस्थिर सरकारें बनती रही, तब तक इनके दो चार विधायक सरकार में शामिल होते रहे। एकाध मंत्री पद लेकर मौज लेते रहे। तब इनके नीति सिद्धांत सब गायब हो गए थे। जबसे उत्तराखंड की जनता ने एक पार्टी को पूर्ण बहुमत देना शुरू किया है, तब से इनको कोई पूछ नहीं रहा। पूछे भी क्यों? लोकतंत्र में तो यही नियम है कि जनता का विश्वास जीतो और सत्ता भोगों। जब आप जनता के बीच जाओगे ही नहीं, उसके लिए कुछ करोगे ही नहीं, तो तुम्हें कोई क्यों पूछेगा?
इधर दो एक साल से पुरानी कढ़ी में नया उबाल आ रहा है। दिल्ली में बैठे कुछ विघ्न संतोषी बुद्धिजीवियों के उकसावे पर कुछ भटके हुए युवा सक्रिय हुए हैं। इन लोगों में जोश तो है पर कोई विजन नहीं है। नई पीढ़ी की तरह ये तुरंत रिजल्ट चाहते हैं। लेकिन तुरंत रिजल्ट तो केजरीवाल ही ला सकते हैं। उसके पास भी बेचने के लिए कुछ तो सपने थे! आपके पास क्या है?

गैरसैंण को उत्तराखंड की राजधानी बनाए जाने का एक पुराना मुद्दा है। यह कोई आसान काम तो है नहीं। फिर भी विधान सभा बन गई। लेकिन एक भवन के बनने से तो राजधानी बनती नहीं उसके लिए बहुत सारा काम करना होगा। एक सत्र बुलाने में ही हालत खस्ता हो जाती है। बोलता कोई नहीं पर सच्चाई यही है कि अंदर से कोई नहीं चाहता कि ऐसे दुर्गम स्थान पर राजधानी बने। न पक्ष वाले, न विपक्ष वाले। न पहाड़ी, न देशी। ऐसे में एक इसी मुद्दे को लेकर 30 40 युवक विधान सभा सत्र में खलल डालने यहां पहुंच जाते हैं और हंगामा करते हैं। उनके नेता फोटो खिंचवाते हैं, वीडियो बनवाते हैं, सोशल मीडिया में पोस्ट करते हैं और सोचते हैं कि उत्तराखंड में तख्ता पलट जाएगा।
इस मुद्दे पर कांग्रेस उनके साथ नहीं आती। जबकि बाकी मुद्दों पर ये कांग्रेस के पिट्ठू बन जाते हैं। यह हर बार का किस्सा बन गया है। अरे भाई, चुनाव में उतरना है तो कुछ काम करो। ऐरी से कुछ तो सीखो। केवल फोटो खिंचवाने से सत्ता नहीं मिलती, उसके लिए गांव की पगडंडियों में भूखे प्यासे भटकना पड़ता है। निस्वार्थ भाव से जनता के हित के काम करने पड़ते हैं। ऐसे नहीं।





