Uttarakhand : मज़बूत होती वित्तीय तस्वीर

उत्तराखंड ने बीते वर्षों में न केवल खुद को एक राजस्व सरप्लस राज्य के रूप में स्थापित किया है, बल्कि आमदनी बढ़ाने और केंद्र सरकार की ओर से सुझाए गए वित्तीय एवं संरचनात्मक सुधारों को लागू करने में भी स्पष्ट राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखाई है। राज्य गठन के 25 वर्षों की यात्रा में जहां शुरुआती दौर में संसाधनों की सीमाएं और वित्तीय दबाव चुनौती बने रहे, वहीं अब राज्य की आर्थिक सेहत में निरंतर सुधार दिखाई दे रहा है। देहरादून से गोपाल पोखरियाल की रिपोर्ट।
राज्य सरकार ने वित्तीय अनुशासन को प्राथमिकता देते हुए उन क्षेत्रों पर विशेष ध्यान केंद्रित किया है, जहां पहले निर्णयों में हिचक और क्रियान्वयन में ढिलाई देखने को मिलती थी। खास तौर पर पूंजीगत बजट खर्च को लेकर सरकार की सक्रियता बढ़ी है। बुनियादी ढांचे, सड़कों, स्वास्थ्य, शिक्षा और अन्य विकास कार्यों के लिए निर्धारित पूंजीगत व्यय को समयबद्ध ढंग से खर्च करने पर जोर दिया गया है, जिससे विकास की गति को वास्तविक आधार मिला है। इसके साथ ही सरकार ने यह भी दिखाया है कि आर्थिक अनुशासन का अर्थ केवल खर्च पर नियंत्रण नहीं, बल्कि सामाजिक सुरक्षा और जनकल्याण में निवेश बढ़ाना भी है। पेंशन, स्वास्थ्य सहायता, महिला एवं बाल कल्याण, ग्रामीण विकास जैसी योजनाओं पर अधिक खर्च करने का साहसिक निर्णय इस बात का संकेत है कि सरकार विकास को समावेशी बनाने की दिशा में आगे बढ़ रही है।
आय बढ़ाने के मोर्चे पर भी उत्तराखंड ने उल्लेखनीय प्रगति की है। कर प्रशासन में सुधार, करेत्तर राजस्व स्रोतों के विस्तार और आर्थिक गतिविधियों को प्रोत्साहन देने के परिणामस्वरूप राज्य का वार्षिक कर एवं करेत्तर राजस्व अब लगभग 28 हजार करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है। यह उपलब्धि ऐसे समय में आई है, जब कई राज्य वित्तीय दबाव और घाटे की समस्या से जूझ रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि राजस्व स्रोतों को मज़बूत करने और पूंजीगत व्यय को प्राथमिकता देने की यह रणनीति इसी तरह जारी रहती है, तो आने वाले वर्षों में उत्तराखंड न केवल आर्थिक रूप से सुदृढ़ होगा, बल्कि देश के विकसित और आत्मनिर्भर राज्यों की अग्रिम पंक्ति में अपनी मज़बूत उपस्थिति दर्ज करा सकता है। कुल मिलाकर, उत्तराखंड की यह वित्तीय यात्रा दर्शाती है कि सीमित संसाधनों वाला पहाड़ी राज्य भी सही नीतिगत फैसलों, अनुशासन और विकास-उन्मुख दृष्टिकोण के बल पर आर्थिक मज़बूती की राह पर आगे बढ़ सकता है।
खनन और भूमि सुधारों पर मिला केंद्र से प्रोत्साहन यद्यपि, चुनाव आचार संहिता समेत विभिन्न कारणों से फिर यह लक्ष्य दोबारा प्राप्त तो नहीं हुआ, लेकिन पूंजीगत बजट अब तुलनात्मक रूप से अधिक खर्च हो रहा है। इस कारण वित्तीय वर्ष 2025-26 में विशेष पूंजीगत सहायता योजना के अंतर्गत प्रोत्साहन राशि के लिए राज्य मज़बूत दावेदार के तौर पर उभरा है। साथ में खनन क्षेत्र में सुधारात्मक उपायों ने कर राजस्व में छलांग लगाई, साथ में केंद्र सरकार ने इसके लिए प्रोत्साहन स्वरूप राज्य को 200 करोड़ की राशि प्रदान की है। इसी प्रकार ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्रों में भूमि सुधारों को लागू करने के लिए राज्य को प्रोत्साहन के रूप में 85 करोड़ की राशि केंद्र से मिली है।

राजकोषीय प्रबंधन में सधे कदम राजकोषीय प्रबंधन में सधे अंदाज़ में कदम बढ़ाने का परिणाम यह रहा कि राज्य ने अपने ऋण को सकल राज्य घरेलू उत्पाद का 25 प्रतिशत से कम रखा है। साथ में कर्ज चुकाने में राज्य ने निरंतरता बनाए रखी है। 25 वर्ष पूरा होने के साथ ही राज्य की अर्थव्यवस्था का आकार भी 25 गुना बढ़ने जा रहा है। राज्य गठन के समय वर्ष 2000 में अर्थव्यवस्था का आकार 14,501 करोड़ रुपये था, जो वर्ष 2023-24 में बढ़कर 3,32,990 करोड़ रुपये हो गया। वहीं वित्तीय वर्ष 2024-25 में यह 3.78 करोड़ अनुमानित है। प्रति व्यक्ति आय में भी 18 गुना से अधिक वृद्धि हुई है। वर्ष 2000 में प्रति व्यक्ति आय 15,285 रुपये थी। वित्तीय वर्ष 2024-25 में प्रति व्यक्ति आय 2,74,064 रुपये अनुमानित है।
राज्य का बजट आकार 22 गुना बढ़ा
राज्य में बजट के आकार में 22 गुना से अधिक वृद्धि हुई है। राज्य गठन के समय वर्ष 2000 में उत्तराखंड का बजट लगभग 4500 करोड़ रुपये था। जबकि वर्ष 2025-26 में यह 1,01,175.33 करोड़ रुपये पहुंच गया है। इसी प्रकार राज्य के कर संग्रह में लगातार वृद्धि हो रही है। नौ नवंबर, 2000 को अलग उत्तराखंड राज्य बनने पर वर्ष 2000-2001 में कर संग्रह 233 करोड़ रुपये था। वहीं बजट अनुमान के अनुसार चालू वित्तीय वर्ष में यह लगभग 28 हजार करोड़ रुपये तक हो जाएगा।
ये हैं चुनौतियां
-बजट आकार की तुलना में खर्च में कमी करना
-बजट के मासिक उपयोग में निरंतरता बनाए रखना
-बजट खर्च की विभागों की क्षमता में वृद्धि करना
-प्राइमरी सेक्टर के अंतर्गत कृषि व सहायक क्षेत्र की अर्थव्यवस्था में अधिक योगदान करना
-पर्वतीय व मैदानी क्षेत्रों में आर्थिक व सामाजिक विषमता को दूर करना
उम्मीदें
-राज्य की अर्थव्यवस्था का आकार बढ़ेगा
-विकास कार्यों की राशि का अधिकतम उपयोग
-कल्याण योजनाओं की राशि का सदुपयोग
-ग्रामीण व दुर्गम क्षेत्रों में विकास में थमेगा असंतुलन
-सार्वजनिक परिसंपत्तियों का अधिक सृजन



