
नई दिल्ली: पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी (Atal Bihari Vajpayee) जितना एक राजनेता के रूप में सराहे गए हैं उतना ही कवि के रूप में भी. यूं तो उनकी कई कविताएं बेहद लोकप्रिय हैं पर एक कविता ऐसी है जो दिल को छूती है. ये कविता है ‘गीत नहीं गाता हूं…’. इस कविता पढ़ने से ज्यादा आनंद है इसे सुनने में. और अगर इसे खुद वाजपेयी पढ़ें तो कहने ही क्या.
हम एक ऐसा ही वीडियो खोज लाए हैं, जिसमें वाजपेयी अपनी कविता सुना रहे हैं. पहले पढ़िए कैसी है ये कविता-
गीत नहीं गाता हूँ
बेनकाब चेहरे हैं,
दाग बड़े गहरे है,
टूटता तिलस्म , आज सच से भय खाता हूं.
गीत नहीं गाता हूं.
लगी कुछ ऐसी नज़र,
बिखरा शीशे सा शहर,
अपनों के मेले में मीत नहीं पाता हूं.
गीत नहीं गाता हूं.
पीठ में छुरी सा चांद,
राहु गया रेख फांद,
मुक्ति के क्षणों में बार बार बंध जाता हूं.
गीत नहीं गाता हूं.
देखें VIDEO
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अटल सिर्फ एक नाम ही नहीं एक जज्बा है निर्भय होने का. किसी भी परिस्थिति में हार नहीं मानने का. वीर रस से सराबोर उनकी कविताएं जब भी पढ़ी जाती थी रोंगटे खड़े कर देती थीं.
साल 2009 में अटल बिहारी वाजपेयी को ब्रेन स्ट्रोक आया था. इसके बाद उन्हें बोलने में समस्या होने लगी. वह स्पष्ट तरीके से बोल पाने में अक्षम हो गए. धीरे-धीरे उनके स्वास्थ्य में गिरावट होती गई. उसके बाद से उन्होंने सार्वजनिक रूप से बात करते हुए नहीं सुना और देखा गया. समय-समय पर उनकी तस्वीर जरूर सामने आई है, जिसमें वह बेहद कमजोर दिखते रहे.