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ज्योतिष शास्त्र में क्या है चंद्रमा का महत्व, जानें कुंडली में चंद्रमा का शुभ-अशुभ प्रभाव

नई दिल्ली : कारक ग्रह माना जाता है. चंद्रमा कर्क राशि के स्वामी होते हैं. रोहिणी, हस्त और श्रावण नक्षत्र के स्वामी चंद्रदेव होते हैं. चंद्रमा की गति सबसे तेज होती है इस कारण से चंद्रमा का गोचरकाल सबसे कम समय में होता है. चंद्रमा लगभग एक राशि से दूसरी राशि में जाने के लिए सवा दो दिनों का समय लेते हैं. ज्योतिष में चंद्रमा को स्त्री ग्रह माना जाता है. किसी बालक के जन्म के समय चंद्रमा जिस राशि में होता है वह उसकी चंद्र राशि कहलाती है.

वैदिक ज्योतिष शास्त्र में चंद्रमा को मन का कारक माना जाता है. सूर्य जहां पिता का प्रतिनिधित्व करते हैं वहीं चंद्रमा माता के कारक माने जाते हैं.
वैदिक ज्योतिष शास्त्र के अनुसार जहां चंद्रमा अमावस्या तिथि पर कमजोर होता वहीं पूर्णिमा तिथि पर यह बलवान होता जाता है.
वृषभ राशि में चंद्रमा उच्च का होता है वहीं वृश्चिक राशि में चंद्रमा नीच का होता है.
जातक की कुंडली में चंद्रमा के बलवान होने पर व्यक्ति को सकारात्मक फल की प्राप्ति होती है. कुंडली में चंद्रमा के बली होने पर व्यक्ति मानसिक रूप से मजबूत होता है. चंद्रमा के मजबूत होने पर व्यक्ति का मां के साथ मधुर संबंध होते हैं.
जब किसी जातक की कुंडली में चंद्रमा पीड़ित होता है तो व्यक्ति को कई तरह की मानसिक परेशानियों का सामना करना पड़ता है. चंद्रमा के कमजोर होने पर जातक की मां को कुछ न कुछ दिक्कतें रहती हैं.
जब किसी जातक की कुंडली में चंद्रमा पापी ग्रह के साथ आता तो सेहत संबंधी परेशानियों का सामना करना पड़ता है. व्यक्ति तनाव, भय, घबराहट, दमा, पागलपन और आत्महत्या का ख्यान मन में आता है.
चंद्रमा को जलतत्व का देवता माना जाता है. कुंडली में चंद्रमा को मजबूत करने के लिए सोमवार के दिन चंद्र देव की पूजा करनी चाहिए.

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