दिल्ली हिंसाः किसकी जिम्मेदारी

दिल्ली हिंसाः किसकी जिम्मेदारी

डाॅ. रमेश ठाकुर : लालकिले पर बवाल, आंदोलन पर उठा सवाल- यही इस वक्त चर्चा में है। शायद कुछ दिनों तक रहेगा भी। पाकिस्तान भी आज हमारी अंदरूनी हरकतों पर हंस रहा है। उनकी मीडिया हमारे लोकतंत्र पर चटकारे ले रहा है, उपहास और तिरस्कार कर रहा है। गनीमत इस बात की समझें कि इसबार गणतंत्र दिवस पर राजपथ की परेड में कोई विदेशी अतिथि नहीं आया वर्ना और भी खराब स्थिति हो जाती। ट्रैक्टर रैली की आड़ में किसानों ने जो किया, वह शायद ही किसी ने सोचा हो। सबसे बड़ी गलती दिल्ली पुलिस ने की जिन्होंने बिना सोचे-समझे गणतंत्र दिवस की परेड के दिन रैली करने की इजाज़त दी। इसलिए उपद्रवियों के साथ-साथ घटना की जिम्मेदार पुलिस भी है।

लाल किले से देश का तिरंगा उतारकर अपना लगाना हम सबों के लिए शर्म वाली बात है। ये हरकत निश्चित रूप से माफ करने योग्य नहीं? सरकारों से मुद्दों को लेकर सहमति-असहमति हो सकती है लेकिन उसकी आड़ में संप्रभुता से खिलवाड़ नहीं किया जा सकता। राजधानी में शांतिपूर्ण ढंग से करीब दो महीनों किसानों का आंदोलन संचालित है। पर, आज उसके माथे पर ऐसा कलंक लग गया, जिसने उसकी विश्वसनीयता पर गहरा ठेस पहुंचा दिया। किसान संगठनों को इस बात का अंदेशा पहले दिन से था कि उन्हें उकसाने के लिए कुछ हरकतें हो सकती हैं। फिर भी गच्चा खा गए। 26 जनवरी को उनके आंदोलन को सुनियोजित तरीके से तितर-बितर करने की कोशिशें होंगी, फिर भी आंदोलनकारियों को संभाल नहीं पाए। लालकिले पर जब हंगामा हो रहा था, तब पाकिस्तानी मीडिया टीवी पर लाइव दिखाकर चटकारे ले रहा था। जिस लोकतंत्र का हम गर्व-गुमान करते हैं उसकी वह सामूहिक तरीके से धज्जियाँ उड़ा रहा था। हमने अपने दुश्मन देश को शायद ही इससे पहले कभी हंसने और खुश होने का इतना बड़ा मौका दिया हो।

राजपथ पर एक बजे के आसपास जैसे ही परेड खत्म हुई। तय समय के मुताबिक किसानों की ट्रैक्टर रैली निकलनी शुरू हुई। देखते ही देखते किसानों के ट्रैक्टर लालकिले और आईटीओ पर पहुंच गए। जबकि वहां जाने की इजाजत नहीं दी गई थी। लेकिन ट्रैक्टर चालक पुलिस का घेरा फांदकर निकाल ले गए। दिल्ली के जीटी रोड, आउटर रिंग रोड, बादली रोड, केएन काटजू मार्ग, मधुबन चौक, कंजावाला रोड, पल्ला रोड, नरेला और डीएसआईडीसी नरेला रोड पर ट्रैक्टरों का जमावड़ा लगा रहा। दो बजे के करीब एक साथ हजारों की संख्या में किसान लालकिले के प्राचीर में दाखिल हुए, पुलिस ने रोका, लेकिन रुके नहीं। छतों पर चढ़ गए, तोड़फोड़ करने के साथ सुरक्षाकर्मियों पर भी हमले शुरू कर दिये।

बहरहाल, उसके बाद किसानों के रूप में उपद्रवियों ने जो लालकिले के भीतर किया, उसने शर्मसार कर दिया। संविधान की मान्यता के पर्व पर देश की राजधानी के दृश्य लोकतंत्र की गरिमा को चोट पहुँचाया। हमें एक बात याद रखनी होगी, यदि देश का सम्मान है तो आपका-हमारा है। हिंसा लोकतंत्र की जड़ों में दीमक के समान होती है। पर गणतंत्र के मौके पर किसानों ने जो अमर्यादा का परिचय दिया, उसने बेहद सम्माननीय आंदोलन की वैधता, संघर्ष और उसकी विश्वसनीयता को धूमिल कर दिया। इस हरकत ने भविष्य में जब कोई अपनी बात सरकार के समक्ष रखेगा तो उसकी शुचिता व स्वीकार्यता सवाल खड़ा कर दिया है। हंगामे को लेकर कुछ सवाल उठ रहे हैं? जवाब कौन देगा फिलहाल पता नहीं, लेकिन वक्त जब कभी पलटी मारेगा, तो जवाब खुद बे खुद मिल जाएगा। दिल्ली में ट्रैक्टर रैली निकाल रहे किसान क्यों बेकाबू हुए, उनको किसी ने उकसाया, या फिर इस बवाल की पटकथा पहले ही लिखी जा चुकी थी। किसानों ने अपने ट्रैक्टर से पुलिस वालों को कुचलने की कोशिशें की।

सुरक्षा एजेंसियों की भी बड़ी विफलता कही जाएगी। किसानों की आड़ में उपद्रवी कैसे दाखिल हुए, इसकी भनक उनको क्यों नहीं हो पाई। घटना के बाद गृहमंत्री ने करीब ढाई घंटे अधिकारियों के साथ मंत्रणाएं की हैं, देखते क्या कुछ निकलता है। घटना के संबंध में जो तस्वीरें सामने आईं, उनमें किसान इतनी तेजी से ट्रैक्टर चलाते दिखे कि पुलिसवाले डर के मारे जान बचाने के इधर-उधर भागते दिखे। घटना की स्वतंत्र जांच होनी चाहिए, आरोपियों पर ऐसी कर्रवाई हो जिससे भविष्य में कोई ऐसी हरकत करने से भी डरें। रूट बदलकर किसानों का जत्था कैसे लालकिले पर पहुंचा इसकी जांच होनी चाहिए। उपद्रव करने वाले किसान थे या फिर कोई और ये किसान संगठन के नेताओं को सार्वजनिक करना चाहिए। उपद्रव की जांच हो उसमें सहयोग भी करें। घटना घट जाने के बाद जांचें तो होती ही हैं, लेकिन आंखों के सामने जो कुछ है वह शर्मसार करने जैसा है।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)