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मिडिल ईस्ट तनाव से क्यों महंगा हो रहा पेट्रोल-डीजल? समझिए कच्चे तेल से कैसे बनते हैं सभी ईंधन और भारत पर कितना असर

दस्तक ब्यूरो: मिडिल ईस्ट में अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने वैश्विक ऊर्जा बाजार को झकझोर दिया है। खासतौर पर होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास बढ़े सैन्य तनाव ने दुनिया भर में कच्चे तेल की आपूर्ति को लेकर चिंता बढ़ा दी है। इसी समुद्री रास्ते से वैश्विक तेल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा गुजरता है। हालात बिगड़ने से कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल आया है, जिसका सीधा असर भारत जैसे बड़े तेल आयातक देशों पर पड़ रहा है। नतीजतन पेट्रोल, डीजल, विमान ईंधन और एलपीजी जैसी सभी ऊर्जा वस्तुओं की कीमतों पर दबाव बढ़ने लगा है।

हॉर्मुज जलडमरूमध्य क्यों है दुनिया के लिए बेहद अहम

हॉर्मुज जलडमरूमध्य ईरान और ओमान के बीच स्थित एक संकरा समुद्री मार्ग है, जो फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ता है। वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिहाज से यह दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण मार्गों में गिना जाता है। हर दिन यहां से करीब 20 मिलियन बैरल से अधिक कच्चा तेल और पेट्रोलियम उत्पादों की ढुलाई होती है। यह वैश्विक पेट्रोलियम तरल आपूर्ति का लगभग पांचवां हिस्सा और समुद्री तेल व्यापार का एक चौथाई से भी अधिक है।

भारत के लिए यह मार्ग इसलिए बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि इराक, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और कुवैत से आने वाला प्रतिदिन करीब 2.5 से 2.7 मिलियन बैरल कच्चा तेल इसी रास्ते से होकर देश तक पहुंचता है। क्षेत्र में तनाव बढ़ने के कारण जहाजों की आवाजाही प्रभावित हो रही है, बीमा लागत बढ़ रही है और कई जहाजों को वैकल्पिक रास्ते अपनाने पड़ रहे हैं। इससे आपूर्ति व्यवस्था पर दबाव बढ़ गया है।

भारत पर पड़ रहा है सीधा असर

भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कच्चा तेल आयातक देश है। देश अपनी जरूरत का लगभग 88 प्रतिशत कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है और इसका बड़ा हिस्सा मिडिल ईस्ट से आता है। यदि वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आती है तो इसका असर भारत के आयात बिल पर तुरंत दिखाई देता है।

विशेषज्ञों के अनुसार यदि कच्चे तेल की कीमत में प्रति बैरल 10 डॉलर की बढ़ोतरी होती है तो भारत के आयात खर्च पर लगभग 15 से 16 अरब डॉलर का अतिरिक्त बोझ पड़ सकता है। यही कारण है कि वैश्विक संकट का सीधा असर देश में पेट्रोल, डीजल और अन्य ईंधनों की कीमतों पर पड़ता है।

कच्चे तेल से कैसे बनते हैं पेट्रोल-डीजल और अन्य ईंधन

कच्चा तेल वास्तव में विभिन्न प्रकार के हाइड्रोकार्बन का प्राकृतिक मिश्रण होता है, जिसे सीधे उपयोग में नहीं लाया जा सकता। इसे उपयोगी ईंधनों में बदलने के लिए रिफाइनरी में आंशिक आसवन यानी फ्रैक्शनल डिस्टिलेशन की प्रक्रिया अपनाई जाती है।

इस प्रक्रिया में कच्चे तेल को एक बड़े आसवन स्तंभ में गर्म किया जाता है। अलग-अलग हाइड्रोकार्बन अलग तापमान पर उबलते हैं, इसलिए वे अलग-अलग स्तरों पर संघनित होकर अलग हो जाते हैं। हल्के तत्व कम तापमान पर ऊपर की ओर अलग हो जाते हैं, जबकि भारी तत्व अधिक तापमान पर नीचे की ओर रहते हैं। इसी प्रक्रिया से पेट्रोल, डीजल, केरोसिन, विमान ईंधन और एलपीजी जैसे उत्पाद तैयार होते हैं।

चूंकि ये सभी ईंधन एक ही कच्चे तेल से बनते हैं, इसलिए यदि कच्चे तेल की आपूर्ति घटती है या कीमत बढ़ती है तो सभी ईंधनों की लागत पर असर पड़ता है।

भारत की रिफाइनरी व्यवस्था कितनी बड़ी

भारत में कच्चे तेल को प्रोसेस करने के लिए मजबूत रिफाइनरी ढांचा मौजूद है। देश में करीब 258 मिलियन मीट्रिक टन प्रतिवर्ष की स्थापित रिफाइनरी क्षमता है और कुल 23 रिफाइनरियां संचालित हैं।

सार्वजनिक क्षेत्र की बड़ी तेल कंपनियां इसमें प्रमुख भूमिका निभाती हैं। इनमें इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन नौ रिफाइनरियां संचालित करती है, भारत पेट्रोलियम तीन और हिंदुस्तान पेट्रोलियम दो रिफाइनरियां चलाती है। इसके अलावा निजी क्षेत्र की दो बड़ी रिफाइनरियां भी महत्वपूर्ण योगदान देती हैं, जिनमें गुजरात के जामनगर स्थित विशाल रिफाइनरी परिसर और वडीनार की रिफाइनरी प्रमुख हैं।

अन्य संचालकों में चेन्नई पेट्रोलियम, नुमालीगढ़ रिफाइनरी, ऑयल इंडिया, एमआरपीएल और नायरा एनर्जी जैसी कंपनियां शामिल हैं।

संकट से निपटने की तैयारी और चुनौतियां

वैश्विक संकट के बीच भारत ने अपने तेल आयात स्रोतों में विविधता बढ़ाने की कोशिश की है। रूस, अमेरिका और अफ्रीका जैसे क्षेत्रों से आयात बढ़ाया गया है ताकि आपूर्ति बाधित न हो। सरकारी आंकड़ों के अनुसार अब लगभग 70 प्रतिशत तेल आयात वैकल्पिक मार्गों और स्रोतों से भी आ रहा है।

फिलहाल देश के पास करीब 20 से 25 दिनों का रणनीतिक और व्यावसायिक तेल भंडार मौजूद है, लेकिन यदि संकट लंबे समय तक जारी रहता है तो आपूर्ति पर दबाव बढ़ सकता है। कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने का असर केवल ईंधन तक सीमित नहीं रहता, बल्कि परिवहन लागत बढ़ने से खाद्य पदार्थों और रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतों पर भी असर पड़ता है।

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