
जय प्रकाश मानस
पीपुल्स लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया (पीएलएसआई) नामक संस्था ने चिंता जताई है : “अगले 50 सालों में भारत में बोली जाने वाले आधे से अधिक भाषाएँ विलुप्त हो जायेंगी ।”
यह झूठ नहीं, सच्चाई है कि पिछले पाँच दशकों में देश की 250 भाषाएँ पूरी तरह से समाप्त हो चुकी हैं। संकट यह भी कि भविष्य में सबसे ज़्यादा ख़तरा उन भाषाओं को है जो आदिवासी समुदायों से जुड़ी हैं।
भाषाओं की समाप्ति का सीधा आशय उस भाषा में विन्यस्त ज्ञान-परंपरा और संस्कृति की समाप्ति भी है ।
छत्तीसगढ़ की गोंडी, हल्बी, सादरी, कुडुख, सरगुजही जैसी आदिवासी भाषाओं और छत्तीसगढ़ी भाषा को प्राथमिक शिक्षा का माध्यम बनाने के लिए आंदोलन चला रहे नंदकिशोर शुक्ला जी कहते हैं –
“मातृभाषाओं को प्राथमिक शिक्षा का माध्यम बनाने से ही इस ख़तरे का निराकरण होगा। इससे भाषा भी बचेगी और शिक्षा का स्तर पर अच्छा होगा।”