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चीन में शी की ताकत बढ़ना भारत के लिए बुरी खबर

चीन में राष्ट्रपति पद के लिए टर्म की शर्त खत्म किए जाने के फैसले से शी चिनफिंग के लंबे समय तक इस पद पर बने रहने का रास्ता साफ हो गया है। इससे रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) और चीन-पाकिस्तान इकनॉमिक कॉरिडोर को बढ़ावा मिलेगा, जिसका भारत विरोध करता आया है।चीन में शी की ताकत बढ़ना भारत के लिए बुरी खबर

चीन की कम्युनिस्ट पार्टी ने राष्ट्रपति की दो टर्म की लिमिट खत्म करने के फैसले का संकेत उसी समय दे दिया था, जब पिछले साल अक्टूबर में शी को दूसरे टर्म के लिए प्रेसिडेंट चुना गया था। शी के विचारों को माओत्से तुंग और डेंग शियाओपिंग के साथ चीनी संविधान में शामिल किया गया है। अनलिमिटेड टर्म के लिए राष्ट्रपति चुने जाने के साथ शी को असीमित शक्तियां भी मिल जाएंगी। ऐसे में चीन विदेश नीति या इंडो-पैसिफिक या हिंद महासागर क्षेत्र और नियंत्रण रेखा पर अपनी ताकत का प्रदर्शन कर सकता है, जिससे भारत की सुरक्षा के लिए खतरा पैदा होगा। 
64 वर्षीय शी भी माओ की तरह जिंदगी भर शासन कर सकते हैं। इसका एशिया की राजनीति पर गहरा प्रभाव पड़ेगा, जहां भारत एक उभरती हुई ताकत है। भारत और चीन के टकराव की आशंका भी बढ़ेगी। सेंट्रल मिलिट्री कमिशन के चेयरमैन शी चीन की सेना को आधुनिक हथियारों से लैस कर सकते हैं। बीआरआई के तहत एशिया, अफ्रीका और यूरोप में प्रमुख इंफ्रास्ट्रक्चर प्रॉजेक्ट्स को पूरा करने में शी की दिलचस्पी है। चीन का लक्ष्य आर्थिक कौशल के जरिए दुनिया में अपना प्रभाव बढ़ाना है। हालांकि, भारत सहित कई देशों ने बीआरआई को लेकर चिंता जताई है। दरअसल, इस प्रोजेक्ट से ना सिर्फ संबंधित देशों के कर्ज में डूबने की आशंका है बल्कि बीआरआई से सुरक्षा संबंधी चिंताएं भी बढ़ सकती हैं। 
चीन-पाकिस्तान इकनॉमिक कॉरिडोर BRI के तहत चीन का फ्लैगशिप प्रोग्राम है। यह भारत के लिए अतिरिक्त चिंता का विषय है क्योंकि यह देश की सार्वभौमिकता का उल्लंघन करता है। शी को मुकम्मल शक्ति मिलने का मतलब चीन-पाकिस्तान की दोस्ती चलती रहेगी, जो भारत के लिए पहले से ही चुनौती बन चुकी है। कई एक्सपर्ट्स का मानना है कि जिस तरह से पाकिस्तान की इकॉनमी चीन पर निर्भर हो रही है, वह ठीक नहीं है। शी को असीमित शक्ति मिलने के बाद चीन भारत के पड़ोसी देशों में दखल बढ़ाने की कोशिश करेगा। ऐसे में भारत को इन देशों के साथ अपने संबंध बनाए रखने के लिए खास मेहनत करनी पड़ेगी। 
भूटान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान में 2018 में चुनाव होने वाले हैं। इससे भारत के लिए मौजूदा साल और भी अहम है। मालदीव भी भारत के लिए चुनौती बन गया है क्योंकि वहां के राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन ने अपने रुख में बदलाव के संकेत नहीं दिए हैं। ऐसे में यामीन इस साल होने वाले राष्ट्रपति चुनाव को प्रभावित कर सकते हैं। 

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