दस्तक-विशेषस्तम्भहृदयनारायण दीक्षित
मनुष्य के व्यक्तित्व की अंतःशक्ति है ‘मन’

हृदयनारायण दीक्षित
स्तम्भ : मन अप्रत्यक्ष है। दिखाई नहीं पड़ता। यह मनुष्य के व्यक्तित्व की अंतः शक्ति है। मन के अध्ययन, विवेचन व विश्लेषण पर विश्वव्यापी मनोविज्ञान विकसित हुआ है। भारतीय दर्शन में मनः शक्ति की जानकारी ऋग्वेद के रचनाकाल से ही मिलती है। ऋग्वेद में मन भी एक देवता हैं। ऋषि मन की गतिशीलता से आश्चर्यचकित थे। मन के लिए समय और भौगोलिक दूरी की कोई बाधा नहीं। पल में यहां, पल में वहां। स्वयं से दूर गया मन सांसारिक कार्यों में बाधक होता है।


मन का अस्तित्व महत्वपूर्ण है। वह दर्शनीय न होकर भी प्रभावशाली है। मन हमारे व्यक्तित्व में संकल्प का केन्द्र है। मन का हमारे व्यक्तित्व में ही एकाग्र बने रहना बोधदाता है। मन की एकाग्रता वाली बुद्धि मनीषा-मन ईशा है। मन की एकाग्रता वाले विद्वान मनीषी कहे जाते हैं। ऋग्वेद के ऋषि ऐसे मन का आवाहन करते हैं “सतत् दक्ष कर्म के लिए, दीर्घकाल तक सूर्य दर्शन के लिए श्रेष्ठ मन का आवाहन करते हैं – आतु ए तु मनः कृत्वे दक्षाय जीव से, ज्योक च सूर्य दृशे। (10.57.4) मन कर्मठ जीवन का ऊर्जा केन्द्र है।

मन तमाम कामनाओं का सर्जक है। सभी कामनाएं पूरी नहीं होतीं। कामनाओं की पूर्ति में बाधा से मन में तरंगे उठती हैं। इन
तरंगो से क्रोध का जन्म होता है। अथर्ववेद के ऋषि क्रोध शमन के भौतिक उपायों से भी सुपरिचित थे। कहते हैं, “हम आपके क्रोध को पैर के अग्रभाग व ऐंड़ी से दबाते हैं। इस क्रिया से आप शांत हो और अनियंत्रित न हो।” (6.42.3) आगे कहते हैं, “हम आपके हनु (ठोढ़ी जबड़ा) पर क्रोध से उभरी नस की फड़कन को शांत करते हैं। मुख पर उभरे क्रोध के लक्षण शांत करते हैं। आप न बोलें, शांत रहें।” (6.43.3) एक सुंदर उदाहरण से क्रोध का स्वरूप समझाते हैं “जैसे धनुर्धारी पुरूष धनुष पर तनावपूर्ण प्रत्यंचा उतारते हैं, वैसे ही हम आपके क्रोध को उतारते हैं। इससे हम आप परस्पर मित्र आत्मीय होंगे।” (वही 1) क्रोध का उद्भव केन्द्र मन है।

क्रोध आत्मीयता में बाधक है। यह सम्बंध विच्छेदक है। सामाजिक संगठन का शत्रु है। यह तमाम कामनाओं के उत्ताप का परिणाम है। मन इसका केन्द्र है। मन ही संकल्प का भी केन्द्र है। लोककल्याण के संकल्प मन मिलाते हैं। लेकिन क्रोध की चित्तदशा में विवेक काम नहीं करता। क्रोध ध्वंसकारी है। ऋषि कहते हैं, “हम आपके क्रोध को भारी पत्थर के नीचे फेंकते हैं। हम परस्पर मन मिलाते हुए आत्मीय मित्र की तरह कार्य करें – सरवाया विव सचावहा।” (वही 2) परस्पर सहमना लोग सहमना समाज बनाते हैं और सहमना समाज के शिव संकल्प समाज को सुख स्वस्ति और आनंद से भरते रहते हैं।
अथर्ववेद के रचनाकाल में आधुनिक मनोविज्ञान की तमाम उपलब्धियां बीज रूप में विद्यमान थीं। मनोविज्ञान को अंग्रेजी भाषा में साईकोलोजी कहा जाता है। च्ेलबीवसवहल ग्रीक शब्द च्ेलबीम से बना है। साइको का अर्थ स्प्रिट या माइंड है। भारत में यह मन कहा जाता है।

भारतीय इतिहास के उत्तरवैदिक काल में मन के रूप स्वरूप व प्रभाव पर काफी विचार हुआ था। मन पूरे व्यक्तित्व का स्वामी है। शतपथ ब्राह्मण में मन को सम्राट कहा गया है – मनो वै सम्राट। यहां मन को अनंत भी बताया गया है। मन के अनुसरण स्नायु तंत्र की गतिविधि है। मन का प्रभाव रक्त संचार पर भी पड़ता है। मन को स्वस्थ रखने के लिए स्वयं को स्वयं द्वारा सकारात्मक सुझाव देने – आटो सजेशन का उपचार सर्वविदित है। यह आधुनिक मनोविज्ञान का निष्कर्ष है। यही बात शतपथ ब्राह्मण में भी कही गई है “मन प्राणों का स्वामी है। प्राण मन के आदेशानुसार चलते हैं। ज्ञानेन्द्रियों के सब काम मन के द्वारा नियंत्रित होते हैं। कामना, संकल्प, संदेह, अधीरता, श्रद्धा, अश्रद्धा और भय आदि सभी मन आयाम हैं।” ये सब मन की गतिविधि के ही परिणाम हैं। मन आराध्य है।

(रविवार पर विशेष)
(लेखक वरिष्ठ स्तम्भकार एवं वर्तमान में उत्तर प्रदेश विधानसभा अध्यक्ष हैं।)
(लेखक वरिष्ठ स्तम्भकार एवं वर्तमान में उत्तर प्रदेश विधानसभा अध्यक्ष हैं।)