दस्तक के दस साल

- in दस्तक-विशेष

Captureदस्तक के दस साल बीत गये पर लगता है जैसे कल की ही बात हो। हर अंक को पहले से बेहतर बनाने की इच्छा में इतना रमा रहा कि जब दस साल पूरे होने का एहसास हुआ तो मन रोमांच से भर उठा। स्वत: ही कुछ पिछले अनुभवों की यादें ताजा हो गयीं।

जो खास बात दस्तक को प्रकाशित करने में महसूस हुई वह यह कि प्रकाशक और संपादक एक ही व्यक्ति के होने से उसकी चुनौतियां कितनी बढ़ जाती हैं। प्रकाशक और लेखकों का रिश्ता बड़ा ही नाजुक और निष्ठुरताभरा होता है। लेखक की रचना का मूल्य प्रकाशक की नजर में एक सामान्य लेख सा ही होता है, लेखक की नजर में उसकी हर कृति उत्कृष्ट, जिसका उचित पारिश्रमिक न मिल पाने की कसक सालती रहती है। इस स्थिति में प्रकाशक को लेखक की और लेखक को प्रकाशक की निन्दा रस के आनंद से ही संतोष करना पड़ता है।

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लेखकों की दो श्रेणी होती हैं। जिनमें से एक प्रकार का लेखक, जिसकी रचना होती तो कमजोर है पर उसका दावा उसे अपने ही मुंह से महिमामंडित कर अधिक पारिश्रमिक पाने की चेष्टा करना होता है। ऐसे लेखकों के साथ प्रकाशक की भूमिका निश्चित रूप से ही अप्रिय हो जाती है किन्तु दूसरी प्रकार की श्रेणी के लेखक जिनकी लेखनी और रचनायें वास्तविक रूप से बहुत ही श्रेष्ठ होती हैं, उनको बिना मांगे ही उचित पारिश्रमिक देने में प्रकाशक को जरा भी कष्ट नहीं होता। अच्छे को अच्छा कहना और कमजोर या बुरे को कमजोर कहना बहुत आसान है, लेकिन एक संपादक होने के नाते इन दोनों श्रेणियों के लेखकों से समन्वय बनाना एक चुनौतीपूर्ण कार्य है क्योंकि लेखन के क्षेत्र में सभी लेखक उच्च श्रेणी के तो नहीं हो सकते। संपादक को दोनों तरह के लेखकों के साथ समन्वय बनाकर कार्य करना पड़ता है।
दस्तक के प्रथम अंक की आवरण कथा- ‘जंग मीडिया में’ वरिष्ठ पत्रकार ज्ञानेन्द्र शर्मा की टिप्पणी मीडिया में बढ़ते अपराध के प्रचार पर रोक लगाने की दस्तक थी।
उन दिनों उत्तर प्रदेश में बाहुबलियों का बोलबाला था। मीडिया में इस बात की चर्चा रहती थी कि कौन बाहुबली कितनी और किस रंग की गाड़ियों के काफिले में चलता है और उसके अंगरक्षक किस तरह के असलहों के साथ उनकी छाया बनकर रहते हैं। मीडिया इन बातों को अपने समाचारों में विशेष स्थान देता था। हम लोगों की चिंता इस बात पर थी कि बाहुबली अपने आतंक के प्रचार के लिए यह सब करते हैं तो मीडिया इन बातों को समाचारों में प्रमुख स्थान देकर उनका सहयोग ही कर रहा है। उसी के बाद से मीडिया में यह चिंतन और मंथन हुआ और सभी समाचार पत्रों और चैनलों ने बाहुबलियों को महिमामंडित करने वाली खबरों को प्रकाशित करना कम कर दिया। यह पहले अंक की मीडिया के क्षेत्र में सफल दस्तक थी।
दस्तक की एक और महत्वपूर्ण आवरण कथा- ‘मंडी में बिकता मीडिया’थी। उन दिनों मीडिया का एक बड़ा वर्ग पेड न्यूज की महामारी का शिकार था। दस्तक ने मीडिया की कुरीतियों को पहली बार सबके सामने रखने काम कर पेड न्यूज पर पूरे देश में एक बड़ी बहस खड़ी कर दी। प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया तथा अन्य संस्थाओं के दबाव में पेड न्यूज को बंद करना पड़ा और सभी बड़े मीडिया संस्थानों को इस पर अपनी सफाई देनी पड़ी। ऐसे बहुत से प्रमुख मुद्दों पर दस्तक हमेशा से अपनी आवाज बुलंद करती रही। दस्तक ने कभी भी खबर से समझौता नहीं किया। हमने अपने पाठकों को परदे के पीछे की महत्वपूर्ण बातों से रूबरू कराया। घटनाओं का असर आगे किस रूप में होने वाला है, इस पर भी हम अपने पाठकों को हमेशा अवगत कराते रहते हैं और समस्याओं को उजागर करने के साथ-साथ उसके समाधान की बात भी करते हैं।
दस्तक के कुछ विशेष अंकों में आप इसकी झलक देख चुके हैं- जैसे अमर कथा में नाजुक मोड़, क्यों मिलती है लाल बत्ती, अंत:खाने के तीर, क्यों बनती हैं कविताएं मधुमिताएं और नौकरशाही पर कटाक्ष करती- जी हुजूर, चन्द्रशेखर जी के व्यक्तित्व पर आधारित अजात शत्रु का प्रस्थान, विपक्ष बनता लेखक, व्हिसिल ब्लोअर या महत्वाकांक्षी जैसे महत्वपूर्ण अंकों को पाठकों के रुचि के अनुरूप प्रकाशित कर सही समय और परिवेश के अनुसार दस्तक देते रहे हैं।
आज दस्तक के दस साल पूरे होने पर यह विशेषांक प्रकाशित हो रहा है और इसमें भी हमने मीडिया में आयी गिरावट के कारणों पर प्रकाश डालती इलेक्ट्रानिक मीडिया के वरिष्ठ पत्रकार पंकज श्रीवास्तव की डायरी प्रकाशित की है, जो मीडिया में आती गिरावट के कारणों से पाठकों को अवगत करायेगी। मीडिया को व्यापार बनाने वाले लोगों के द्वारा अपरिपक्व लोगों को संवाददाता बनाकर अपने व्यापारिक हित साधने के कारण पत्रकारिता को रसातल में पहुंचाने का काम किया जा रहा है। हम अपने पाठकों को आश्वस्त करना चाहते हैं कि देश और समाज की हर वह खबर जो सामाजिक, राजनीतिक, आपराधिक, आर्थिक, सांस्कृतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, उसके परदे के पीछे की कहानी हम उजागर करते रहेंगे।

मैं लखनऊ विश्वविद्यालय में बी.ए. का छात्र था। बैडमिंटन का खिलाड़ी होने के नाते मेरा चयन इंटर यूनिवर्सिटी की टीम में हुआ और उसी वर्ष हमारी टीम को नार्थ जोन में जीत हासिल हुई। मैं उदयपुर में आयोजित आल इंडिया यूनिवर्सिटी खेलने का अवसर पा गया। यह अवसर लखनऊ विश्वविद्यालय की टीम को लगभग 25 वर्षों के बाद प्राप्त हुआ था। खेल में मिलती सफलताओं, खेल प्रेमियों और साथियों का उत्साहवर्धन हमें छात्र राजनीति में ले गया। मैं उत्साहित होकर लखनऊ विश्वविद्यालय के छात्रसंघ का चुनाव लड़ गया, लेकिन जल्द ही हमारी यह खुमारी उतर गयी। चुनाव में हार के बाद राजनीति से मोह भंग हो गया और उसी दिन छात्रसंघ भवन पर यह शपथ ली कि जीवन में कभी भी कोई चुनाव नहीं लड़ूंगा। उन्हीं दिनों लखनऊ विश्वविद्यालय में एम.ए. इन जर्नलिज्म की डिग्री का कोर्स प्रारंभ हुआ था। साथी सहपाठियों की चर्चा से जर्नलिज्म की ओर आकर्षण बढ़ा। फार्म भरकर इंट्रेस एक्जाम दे दिया और परिणाम जानने की उत्सुकता लिये रिजल्ट देखने जर्नलिज्म डिपार्टमेंट पहुंच गया। वहां एक लड़की मुझे ढूंढ़ते हुए आयी और मेरा नाम पूछकर लड़ने लगी। मैं अवाक था, समझ नहीं पा रहा था कि यह लड़की मेरी किस गलती की वजह से लड़ रही है? वह चिल्लाये जा रही थी कि तुम लोग गलत तरीके से खेल का सर्टिफिकेट बनवा कर स्पोट्र्स कोटा ले लेते हो। पूरा माजरा समझने में कुछ देर लगी, फिर जब बात समझ में आयी तो पता यह लगा कि इंट्रेंस एक्जाम में हमारे और उस लड़की के नंबर बराबर थे, लेकिन स्पोट्र्स कोटे से मुझे राष्ट्रीय स्तर का खिलाड़ी होने के नाते ढाई पर्सेंट का वेटेज अधिक मिला था। जिसकी वजह से मैं इंट्रेंस एक्जाम में फस्र्ट रैंक हासिल कर गया था और उन मोहतरमा को द्वितीय स्थान से संतोष करना पड़ा था। फिर मैंने जब उनको यह समझाया कि मैंने कोई फर्जी सर्टिफिकेट का इस्तेमाल नहीं किया है, सच में राष्ट्रीय स्तर का खिलाड़ी हूं जिसका मुझे वेटेज मिला है तो वह कुछ नरम पड़ी, फिर भी गुस्से में बड़बड़ाती हुई चली गयीं और मैं एम.ए. इन जर्नलिज्म का छात्र बन गया।
यहीं से पत्रकारिता के क्षेत्र में जाने का बीजारोपण हो गया। जो जनवरी 2006 में दस्तक टाइम्स मासिक पत्रिका के प्रथम अंक के प्रकाशन के साथ कोमल पौधे के रूप में स्फुटित हुआ। जो अपने जीवन का दस साल पूरा कर पौधे से वृक्ष बनने की ओर अग्रसर है। दस्तक की दस सालों की यात्रा खट्टे-मीठे अनुभवों से भरी हुई है।
प्रथम अंक की तैयारियां चल रही थीं। कुछ वरिष्ठ साथी हमारा उत्साहवर्धन कर रहे थे। वरिष्ठ महिला पत्रकार सुश्री अमिता वर्मा का योगदान दस्तक प्रकाशन के प्रारंभ में बहुत ही महत्वपूर्ण रहा। यहां तक कि पत्रिका का टाइटिल दस्तक तय करने में उन्हीं की भूमिका रही। पहला अंक चौथा पन्ना के नाम से प्रकाशित होने की तैयारियां कर रहा था कि तभी अमिता जी ने यह सलाह दी कि पत्रिका का टाइटिल अगर दस्तक रखा जाय तो ज्यादा उचित होगा और हम सभी लोगों ने सर्वसम्मति से उसे मानकर दस्तक टाइटिल के लिए प्रार्थना पत्र प्रेषित कर दिया। दस्तक टाइम्स के नाम से पूरा टाइटिल स्वीकृत हुआ।
प्रकाशन के प्रारंभ में वरिष्ठ पत्रकार सुरेश बहादुर सिंह को संपादक बनाने की इच्छा रखते हुए कुछ दिन प्रकाशक के रूप में अपनी भूमिका देख रहा था किन्तु सुरेश बहादुर जी ने जिद करके मुझे ही संपादक बना दिया। प्रकाशन/संपादन के क्षेत्र में अनुभवहीनता के प्रश्न पर उन्होंने हर पल सहयोग करने का वादा किया। इसी क्रम में उन्होंने वरिष्ठ पत्रकार घनश्याम पंकज और वरिष्ठ पत्रकार ज्ञानेन्द्र शर्मा जैसे दिग्गजों से हमारा परिचय कराया और स्वयं व अन्य वरिष्ठ पत्रकारों द्वारा दस्तक प्रकाशन को लाभान्वित करते रहे। दस्तक के प्रथम अंक के प्रकाशन के दौरान उन्हीं के घर में बदायूं से आये हुए एक पत्रकार संजय शर्मा से हमारी मुलाकात हुई और पहली ही मुलाकात में व्यक्ति को अपना बना लेने वाले संजय शर्मा ने अपने सहयोग का कायल बना दिया। उन्होंने प्रथम अंक को प्रकाशित करने में जीतोड़ मेहनत की। संजय शर्मा का पूर्व में प्रकाशन का अनुभव हमारे बहुत काम आया। उन्होंने अपने एक सहयोगी मुकेश सिंह को पत्रिका के प्रथम अंक की छपाई के लिए दिल्ली भेजकर दस्तक टाइम्स को प्रकाशित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
आज वरिष्ठ पत्रकार घनश्याम पंकज जी हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन दस्तक के प्रथम अंक के बाद से जब तक वे जीवित थे दस्तक को महत्वपूर्ण योगदान देते रहे। यहां तक कि हर लेख की हेडिंग वे स्वयं अपने हाथों से लगाया करते थे। हिन्दी पत्रकारिता में उनके संपादन की तारीफ उनके विरोधी भी करते रहे। उनकी जगह दस्तक प्रकाशन के हृदय में हमेशा बनी रहेगी।
ज्ञानेन्द्र शर्मा दस्तक प्रकाशन की नींव के एक ऐसे पत्थर साबित हुए जिन्होंने निरंतर दस वर्षों से स्नेह और आशीर्वाद से लबरेज कर रखा है। लखनऊ के प्रथम श्रेणी के पत्रकार ज्ञानेन्द्र शर्मा ने स्वयं अपनी खबर टाइप करने की परम्परा डाली। वे ऐसे पत्रकार हैं जो टाइप राइटर, टेली प्रिंटर और अब कम्प्यूटर पर लगातार स्वयं ही अपनी खबरें टाइप करते आ रहे हैं। ऐसे कम ही पत्रकार होंगे जिन्होंने अपनी लेखनी में इतने लम्बे समय तक निरंतरता बनाये रखी हो। आज भी हमें उनसे हर मुलाकात में पत्रकारिता के कुछ न कुछ गुर सीखने को मिल जाते हैं। उनका साथ और मार्गदर्शन हमारे लिए किसी बेशकीमती तोहफे से कम नहीं।
दस्तक के एक दशक पूरा करते-करते वरिष्ठ पत्रकार नवीन जोशी जो दस्तक को पत्रकारिता की नई ऊंचाइयां तय करने में एक सशक्त स्तम्भ साबित हो रहे हैं। हम सौभाग्यशाली हैं कि उनके जैसे वरिष्ठ व्यक्ति का सहयोग, स्नेह और आशीर्वाद हमें प्राप्त है।
दस्तक प्रकाशन के प्रथम अंक से निरंतर अपनी सेवाएं दे रहे जुझारू पत्रकार जितेन्द्र शुक्ला का योगदान महत्वपूर्ण है। दस्तक के हर अच्छे-बुरे समय पर साथ खड़े रहना ही उनकी खूबी है।
2007 में वरिष्ठ पत्रकार उदय यादव ने दस्तक टाइम्स के सहयोगी संपादक और कुछ दिनों तक कार्यकारी संपादक के रूप में अपनी सेवाएं दीं। उनकी बेबाक टिप्पणियां और स्पष्टवादिता बहुतों को उनकी आलोचना करने के लिए उकसाने का माध्यम बनी किन्तु उन्होंने दस्तक प्रकाशन को धारदार बनाने में कभी भी समझौता नहीं किया। पिछले एक साल से वे किडनी की बीमारी से पीजीआई में एडमिट हैं और उनका इलाज चल रहा है। हम जब दस्तक प्रकाशन के दस वर्ष पर एक विशेषांक प्रकाशित कर रहे हैं तो उनकी कमी हर पल हमें कचोटती रहती है। पर इन्हीं दुखद पहलुओं के बीच कुछ रोज पहले ही पीजीआई के वरिष्ठ डाक्टर नारायन प्रसाद द्वारा सफल किडनी ट्रांसप्लांट होने की सूचना उन्होंने स्वयं फोन कर के बतायी। यह सूचना सुनकर मन खुशी से भर उठा। दस्तक समूह उनके किडनी ट्रांसप्लांट के खर्च को मुख्यमंत्री कोष से वहन करने के लिए युवा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का आभार प्रकट करता है।
शिक्षक से पत्रकारिता के क्षेत्र में स्थापित होने वाले डॉ. रहीस सिंह विदेशी और आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ, जिन्होंने उत्तर भारतीय पट्टी के सभी महत्वपूर्ण प्रकाशनों में अपनी लेखनी का योगदान दिया। दस्तक के साथ उनका रिश्ता बहुत गहरा है। प्रदेश की राजधानी के लेखकों पर जब नजर डालिए तो विदेशी मामलों में उनकी समझ और समयबद्ध तरीके से प्रकाशनों को प्रेषित कर देने वाली रिपोर्ट का कोई दूसरा विकल्प नहीं है।
दस्तक प्रकाशन के दस वर्षों की यात्रा का संदर्भ चल रहा हो और बात भाई अनिल यादव की न हो तो सब कुछ अधूरा ही रह जायेगा।
अनिल यादव जो एक युवा साहित्यकारऔर समकालीन पत्रकारिता के बहुत ही शानदार लेखक एवं पत्रकार हैं। उनकी लेखनी से रचित साहित्य और खबरों में समाज में व्याप्त बुराइयों पर निर्भीक और मर्यादित टिप्पणियां पत्रकारिता के क्षेत्र में कुंद पड़ती कलम की धार को हमेशा पैनी करती नजर आती हैं।
दस्तक प्रकाशन में उनका योगदान बहुत ही दिलचस्प है। उनकी स्पष्टवादिता और मुंह पर कटु वचन बोलने की अदा विचारों में मतभेद होने के बावजूद भी उनके साथ रहने को मजबूर करती है। पत्रकारिता में फैली कुरीतियों और उसमें व्याप्त बुराइयों से लड़ने की ललक के कारण उन्हें एक अच्छे पत्रकार के रूप में पहचाना जाता है। उनकी इसी खूबी से प्रभावित होकर दस्तक के दस साल पर प्रकाशित होने वाले विशेषांक में उन्हें अतिथि संपादक बनाने की इच्छा हुई जिसे उन्होंने सहर्ष स्वीकार कर दस्तक के प्रति अपने प्रेम और लगाव का इजहार कर दिया।
दस्तक की दस वर्षों की यात्रा में भोपाल से सरीथा अरगरे जी के योगदान को हम नहीं भुला सकते।
पिछले दस वर्षों से उन्होंने दस्तक को नि:शुल्क और बिना शर्त समयबद्ध सेवाएं दी हैं। जिसके लिए दस्तक परिवार उनका आभारी है। उनके बहुमूल्य समय और योगदान की भरपाई तो नहीं की जा सकती, लेकिन दस्तक के प्रति उनका स्नेह यह दर्शाता है कि आज के परिवेश में भी कोई लेखक कितना धैर्यशील और उदार हो सकता है। इस रोमांचक यात्रा में अगर कुछ मार्गदर्शकों, साथियों के नाम छूट रहे हैं तो उसका कारण स्थान की सीमा है वरना हृदय में उनके लिए स्थान की कमी नहीं, सबका आभार। 

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