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जीवाश्म ईंधन पर रोक से 10 लाख मौतें रोकी जा सकती थी, कोयला है काल

नई दिल्ली: दुनियाभर के शोधकर्ताओं के एक समूह ने हाल में नेचर कम्‍युनिकेशन में एक शोध पत्र प्रकाशित कर यह दावा किया है कि वैश्विक स्तर पर जीवाश्म ईंधन दहन को रोककर वर्ष 2017 में दस लाख मौतें रोकी जा सकती थीं। इनमें आधी से ज्यादा मौतें कोयला दहन से उत्पन्न प्रदूषण के कारण हुई हैं। यूनिवर्सिटी ऑफ ब्रिटिश कोलंबिया के स्कूल ऑफ पॉपुलेशन एंड पब्लिक हेल्थ में प्रोफेसर और इस अध्ययन रिपोर्ट के मुख्य लेखक डॉक्टर मिशाइल भावा ने कहा कि हम पिछले कुछ समय से यह बात जान गए हैं कि वायु प्रदूषण की वजह से बड़ी संख्या में लोगों की मौत होती है। यह अध्ययन विभिन्न स्रोतों के तुलनात्मक महत्व का एक वैश्विक परिप्रेक्ष्य मुहैया कराने के साथ-साथ दुनिया के उन विभिन्न देशों के लिए एक प्रारंभ बिंदु भी मुहैया कराता है, जिन्हें स्वास्थ्य संबंधी चिंता के तौर पर वायु प्रदूषण का हल निकालना अभी बाकी है।

अध्‍ययन के मुताबिक, वर्ष 2017 में वैश्विक स्‍तर पर पीएम 2.5 का औसत 41.7 μ माइक्रोग्राम क्यूबिक मीटर था। दुनिया की 91 फीसदी आबादी डब्ल्यूएचओ द्वारा निर्धारित 10  μमाइक्रोग्राम क्यूबिक मीटर की सालाना औसत से कहीं ज्‍यादा सालाना औसत संकेंद्रण का सामना कर रही थी। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि 65 फीसदी से ज्यादा उप राष्ट्रीय क्षेत्रों में पीएम 2.5 का संकेंद्रण उनसे संबंधित राष्ट्रीय औसत से ज्यादा पाया गया। कानपुर और सिंगरौली के आसपास के बेहद प्रदूषित क्षेत्रों में सालाना औसत पीएम 2.5 संकेंद्रण का स्तर 150 μमाइक्रोग्राम तक बढ़ गया जो केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा तय सुरक्षित सीमा से चार गुना ज्यादा और डब्ल्यूएचओ द्वारा तयशुदा ऐसे स्तर से 15 गुना ज्यादा था।

वायु प्रदूषण के कारण सबसे ज्यादा मौतों वाले शीर्ष नौ देशों पर नजर डालें तो चीन में इस तरह की मौतों में कोयला दहन का सबसे बड़ा योगदान है। वहां इसके कारण 3,15,000 मौतें हुई हैं, जो कुल का 22.7 प्रतिशत है। मिस्र, रूस तथा अमेरिका में तेल तथा प्राकृतिक गैस से होने वाला प्रदूषण वहां प्रदूषण के कारण होने वाली मौतों का सबसे बड़ा जिम्मेदार है। इन देशों में तेल और प्राकृतिक गैस से फैलने वाले प्रदूषण के कारण 27 फीसदी या 9000 से 13000 मौतें होती हैं। भारत, इंडोनेशिया, बांग्लादेश, पाकिस्तान और नाइजीरिया में ठोस जीवाश्‍म ईंधन प्रदूषण फैलाने वाला सबसे बड़ा स्रोत है। इन देशों में इसकी वजह से कुल की 36 फीसदी या ढाई लाख मौतें होती हैं।

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