दस्तक-विशेष

जज्बा हो तो मंच तैयार है

 

Captureखिलाड़ियों के लिए कॅरियर में कई बार ऐसे मौके आते हैं कि चोट और बीमारी से उनके सपने चूर-चूर हो जाते हैं, लेकिन कहते हैं कि जहां चाह-वहां राह। इसी तर्ज पर चोट और बीमारी के चलते प्रतिस्पर्धी खेल से दूर हो चुके खिलाड़ियों को फिर से पदक मंच पर पहुंचना बहुत आसान हो चुका है। हम बात कर रहे हैं वल्र्ड ट्रांसप्लांट गेम्स की, जहां उन खिलाड़ियों को अपनी प्रतिभा दिखाने का मौका मिलता है, जो अंग प्रत्यारोपण के बाद मैदान में उतरना चाहते हैं।

दस्तक ब्यूरो
न खिलाड़ियों को अपने किसी अंग का ट्रांसप्लांट करना पड़ता है उन्हें वापस खेलों की दुनिया से जोड़ने के लिए 35 साल पहले वल्र्ड ट्रांसप्लांट गेम्स फेडरेशन का गठन हुआ। फेडरेशन हर दो साल पर वल्र्ड गेम्स का आयोजन करती है। इस साल अर्जेंटीना में हुए गेम्स में 69 देशों के 1500 खिलाड़ियों ने हिस्सा लिया। वर्ष 2017 के ट्रांसप्लांट गेम्स स्पेन में होंगे। हालांकि इन खेलों को लेकर अभी देश में उतनी जागरूकता नहीं है, क्योंकि राष्ट्रीय स्तर पर इसकी एक ही इकाई काम कर रही है। इस बार के गेम्स अर्जेंटीना में हुए जहां भारत के खिलाड़ियों ने शानदार प्रदर्शन किया। फेडरेशन के अध्यक्ष थामस का मानना है कि खिलाड़ियों का कॅरियर ट्रांसप्लांट के बाद समाप्त नहीं होता, सिर्फ जज्बा और जुनून चाहिए। अगर आपमें जुनून है तो मंच तैयार है आपके लिए। इन गेम्स को अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति (आइओसी) से मान्यता हासिल है।
खिलाड़ियों को हालात से लड़ना आना चाहिए: सोती
अर्जेटीना में हुए वल्र्ड ट्रांसप्लांट गेम्स में शानदार प्रदर्शन करने वाले धर्मेद्र सोती कहते हैं किसी भी खिलाड़ी के लिए चोट और बीमारी एक झटका होती है, लेकिन खिलाड़ी को हालात से लड़ना आना चाहिए। केंद्रीय नारकोटिक्स ब्यूरो में उपाधीक्षक धर्मेंद्र सोती की किडनी खराब हो चुकी थी। उन्हें ट्रांसप्लांट से गुजरना पड़ा, लेकिन 41 साल के सोती ने पूरे जुनून के साथ खेलों की दुनिया में वापसी की। उन्होंने वर्ष 2013 और 2015 के वल्र्ड ट्रांसप्लांट गेम्स में पदक जीते। पेशेवर बैडमिंटन खिलाड़ी अपने शानदार कॅरियर में राष्ट्रीय स्तर पर धमाल मचाते हुए जबरदस्त कामयाबियां हासिल कीं। वर्ष 2000 में किडनी की बीमारी से घिर गए। सोती को हाई ब्लड प्रेशर के कारण एसजीपीजीआई में किडनी ट्रांसप्लांट के ऑपरेशन से गुजरना पड़ा। भाई ने किडनी देकर उनकी जान बचाई तो घर वालों ने दोबारा न खेलने की ताकीद की। इसके बावजूद उनका जुनून ही था कि उन्होंने ऑपरेशन के छह साल बाद बैडमिंटन कोर्ट में वापसी की और इस साल अर्जेंटीना में हुए वल्र्ड ट्रांसप्लांट गेम्स में डबल धमाल करते हुए स्वर्ण और रजत पदक जीते।
सोती ने बाराबंकी निवासी और ग्राम्य विकास विभाग में कार्यरत बलवीर सिंह के साथ मिलकर 24 से 30 अगस्त तक अर्जेंटीना के पार्टिडोस डि सबादो में हुए वल्र्ड ट्रांसप्लांट गेम्स के पुरुष डबल्स का फाइनल मुकाबला जीतकर स्वर्ण पदक हासिल किया, जबकि सिंगल्स में गैर वरीय सोती ने विश्व नंबर दो इंग्लैंड के टिम एंडरसन को सेमीफाइनल में मात देकर खिताबी मुकाबले में खेलने का अधिकार पाया। हालांकि उन्हें फाइनल में दक्षिण कोरिया के जोहानेस जैकब्स केलिंगफील्ड के हाथों मात मिली। एंडरसन के खिलाफ धर्मेन्द्र ने शानदार खेल दिखाते हुए उलटफेर कर दिखाया। सोती ने एंडरसन को 21-16, 21-16 से मात दी, जबकि फाइनल में उन्हें 11-21, 12-21 से मात मिली। वहीं डबल्स के फाइनल में सोती और बलबीर की जोड़ी ने इंग्लैंड के एलन एवॉन और नील मैक्डॉनाल्ड की जोड़ी को 21-2, 21-18 से मात दी। इससे पहले सोती ने 2013 के वल्र्ड ट्रांसप्लांट गेम्स में रजत पदक जीता। यह गेम्स दक्षिण अफ्रीका के डरबन शहर में आयोजित हुए थे। तब भी उन्होंने पुरुष डबल्स में रजत पदक जीता था। उनका मानना है कि हालात कैसे भी हों, हार नहीं माननी चाहिए । सोती ने कहा कि मैं यह साबित करना चाहता हूं कि ट्रांसप्लांट के बाद भी लोग सामान्य से बेहतर जीवन जी सकते हैं। मैंने अपने परिवार और विभाग के सहयोग से इसे कर दिखाया है। यही भावना इन गेम्स की भी है। खिलाड़ियों को हालात से लड़ना आना चाहिए। जीत के जज्बे से आधी समस्या दूर हो जाती है।
…लेकिन हिम्मत नहीं हारी
धर्मेन्द्र सोती ने 1998 के सीनियर ओपन बैडमिंटन टूर्नामेंट में हिस्सा लिया था। वह बताते हैं कि मुझे वर्ष 2000 की शुरुआत तक अंदाजा नहीं था कि मुझे इतनी गंभीर बीमारी है। चीजें तेजी से हुईं, लेकिन मैंने कभी हिम्मत नहीं हारी। कुछ साथियों से प्रेरणा और प्रोत्साहन मिला तो फिर से रैकेट पकड़ लिया। 

नहीं मिली मदद
देश का नाम रोशन करने के बावजूद धर्मेन्द सोती को अभी तक प्रदेश सरकार से किसी भी प्रकार की मदद नहीं मिली है। वह मुख्यमंत्री और खेल निदेशक से मिलकर अपने जैसे ही तमाम खिलाड़ियों के लिए एक उत्साहवर्धक माहौल तैयार करना चाहते हैं, ताकि वह अंग प्रत्यारोपण के बाद भी देश का नाम रोशन कर सकें।

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