देहरादून (मुरारी सिंह पहाडी): उत्तराखंड कांग्रेस में क्या चल रहा है? एक जनवरी को खबर आई कि प्रदेश के कांग्रेस नेताओं को आला कमान ने दिल्ली तलब किया है, जहां राहुल गाँधी और खरगे जैसे बड़े नेताओं के साथ मंथन होगा कि 2027 में चुनाव कैसे जीता जाए? फिर खबर आई कि प्रदेश कांग्रेस पार्टी अपनी कार्यकारिणी बनाने वाली है। लिस्ट आला कमान के पास गयी है। उसकी मोहर लगते ही घोषित हो जायेगी। पहली खबर के कुछ फोटो बाहर आये हैं और अखबारों में भी छपे हैं, लेकिन मंथन क्या हुआ, इसका खुलासा नहीं हुआ है। सिर्फ यही कहा गया है कि 27 में विधान सभा चुनाव जीतना है। दूसरी योजना अर्थात कार्यकारिणी वाली सूची अभी आला कमान की दराज में ही पडी हुई है। लगता नहीं कि कांग्रेस कोई कार्यकारिणी घोषित भी कर पाएगी! जब करन महरा ही बिना कार्यकारिणी के तीन साल खींच ले गए, तो गोदियाल किस मिटटी के बने हैं, जो बना ले जायेंगे? महरा तो फिर भी सोबर स्वभाव के माने जाते हैं, गोदियाल तो इतना चिल्लाकर बोलते हैं कि कार्यकारिणी सदस्य क्या, आम कार्यकर्ता ही उनसे बिदकने लगता है।

हरीश रावत को किनारे लगाकर जब मुम्बई से आए गणेश गोदियाल को अध्यक्ष बनाया गया और उनके साथ प्रीतम सिंह और हरक सिंह को लगाया गया तो तभी लगने लगा था कि यह तीन बैलों की जोड़ी कांग्रेस के हल को क्या ही खींच पाएगी? इन लोगों ने भी आते ही सबसे पहले हरीश रावत जैसे वयोवृद्ध नेता को ही बेइज्जत करना शुरू कर दिया। उन्हें बूथ स्तर पर धकेलने की बात कह कर गोदियाल ने साबित कर दिया कि उनमें सभी नेताओं को साथ लेकर चलने की क्षमता तो कतई नहीं है।

आखिर कांग्रेस की खूबी क्या है? सबसे पहली तो यह कि वह विचार विहीन पार्टी है। जिस तरह से उसके केन्द्रीय नेता राहुल गाँधी अपने पिता, दादी और परनाना के विचारों से दूर उग्र वामपंथियों की शरण में चले गए हैं। यहाँ राज्य के कांग्रेसियों ने अपनी विचारधारा को बरसों पहले त्याग दिया था। इसलिए पार्टी को जोड़ने वाली कोई विचार धारा है ही नहीं। न कोई ऐसा नेता है जो सबको बाँध कर रख सके। राज्य स्तर पर हरीश रावत थे, तो उन्हें सब धकियाने में लगे हैं। केंद्र में राहुल गाँधी हैं, जो कब क्या बोल दें पता ही नहीं चलता। इसलिए अब तो लोग उन्हें चुनाव प्रचार तक में बुलाने से डरते हैं। कहीं लेने के देने न पड़ जाएँ! इसलिए यदि कोई एक चीज समान है तो वह है, स्वार्थ। जो कभी मिल नहीं सकते। वे हमेशा टकराते रहते हैं।
इसलिए उत्तराखंड कांग्रेस में सबसे चतुर नेता हैं प्रीतम सिंह, जो कभी कुछ बोलते ही नहीं। शुरू में हरक सिंह कुछ ज्यादा ही चूं-चपड़ कर रहे थे तो गोदियाल को लगा कि कहीं उसके नम्बर ना बढ़ जाएं! इसलिए आला कमान से शिकायत कर डाली और सुना है कि हरक को आला कमान से पड़ी डांट के बाद वो चुप हो गए। इसलिए प्रीतम सही हैं। कौन अपने से बहुत जूनियर रहे नेता की सुने! इसलिए कहा यही जा रहा है कि कांग्रेस अभी मित्र विपक्ष की भूमिका में ही रहेगी।





