एक गीगावाट सौर ऊर्जा का कीर्तिमान और पीएम सूर्यघर योजना की जमीनी हकीकत
देहरादून (गोपाल सिंह पोखरिया): पहाड़ों पर सूरज जल्दी उगता है। मैदानी शहरों में जब अंधेरा होता है, तब उत्तराखंड की चोटियां पहले ही सुनहरी रोशनी में नहा चुकी होती हैं। यह महज एक भौगोलिक तथ्य नहीं है। यह एक संभावना है, एक अवसर है, एक संदेश है और अब उत्तराखंड ने इस संदेश को समझा है। पहाड़ों पर पड़ने वाली सूर्य की किरणों को बिजली में बदलने की दिशा में राज्य ने जो प्रगति की है, वह देश के लिए एक मिसाल बन गई है।
वर्ष 2024 में उत्तराखंड में मात्र 9,500 रूफटाप सोलर कनेक्शन थे। वर्ष 2025 आते-आते यह संख्या 63,241 तक पहुंच गई यानी एक साल में 6.2 गुना की छलांग। देश के 26 राज्यों को पीछे छोड़ते हुए उत्तराखंड अब रूफटाप सोलर अपनाने में राष्ट्रीय स्तर पर नौवें स्थान पर आ गया है। और इतना ही नहीं कृ राज्य की कुल सौर ऊर्जा उत्पादन क्षमता ने एक गीगावाट (1000 मेगावाट) का ऐतिहासिक आंकड़ा पार कर 1027.87 मेगावाट का नया कीर्तिमान स्थापित किया है। यह कहानी सिर्फ मेगावाट और कनेक्शन की संख्या की नहीं है। यह कहानी है उस बदलाव की जो पहाड़ की छतों पर, खेतों की मेड़ों पर, नहरों के किनारों पर और सरकारी इमारतों की ऊपरी मंजिलों पर चुपचाप आकार ले रहा है। यह कहानी है उस उत्तराखंड की जो जलविद्युत परियोजनाओं के गढ़ से निकलकर सौर ऊर्जा के नए दौर में प्रवेश कर चुका है।
पीएम सूर्यघर योजनाः जन आंदोलन बनती एक सरकारी पहल
फरवरी 2024 में जब केंद्र सरकार ने पीएम सूर्य घर योजना की शुरुआत की, तो इसका लक्ष्य देश के एक करोड़ घरों में रूफटाप सोलर सिस्टम लगाना था। यह महत्त्वाकांक्षी योजना उन परिवारों के लिए वरदान बनकर आई जो बिजली के भारी बिलों से परेशान थे और एक स्थायी समाधान चाहते थे। योजना की शुरुआत के बाद से अब तक पूरे देश में 20 लाख 85 हजार 514 रूफटाप सोलर सिस्टम लग चुके हैं। इनमें उत्तराखंड की हिस्सेदारी पिछले एक साल में डेढ़ प्रतिशत से बढ़कर तीन प्रतिशत हो गई है यानी दोगुनी। जब पूरे देश में योजना का विस्तार हो रहा था, उत्तराखंड उससे भी तेज रफ्तार से आगे बढ़ रहा था। उत्तराखंड अक्षय ऊर्जा विकास एजेंसी (उरेडा) के मुख्य परियोजना अधिकारी मनोज कुमार के अनुसार राज्य ने पीएम सूर्यघर योजना में निर्धारित लक्ष्य के अनुरूप सकारात्मक प्रगति दर्ज की है। यह सफलता अचानक नहीं आई। इसके पीछे एक सुनियोजित रणनीति है सरल अनुमोदन प्रक्रिया, समय पर सब्सिडी का भुगतान, उरेडा की सक्रिय भूमिका और जन जागरूकता अभियान। उत्तराखंड में इस योजना की खास बात यह है कि यहाँ 63,241 रूफटाप सोलर सिस्टम के माध्यम से 63,403 परिवार मुफ्त बिजली का लाभ उठा रहे हैं। यानी लगभग प्रत्येक सिस्टम से एक परिवार लाभान्वित हो रहा है। छोटे-छोटे पहाड़ी घरों में, जहां बिजली बिल कई बार परिवार की मासिक आय का उल्लेखनीय हिस्सा होता था, वहाँ यह योजना आर्थिक राहत लेकर आई है।
छह गुना की छलांगः कैसे हुआ यह चमत्कार
2024 में 9,500 और 2025 में 63,241 कृ यह आंकड़ा सुनने में तो बड़ा लगता है, लेकिन इसके पीछे जो असली कहानी है वह और भी रोचक है। किसी भी सरकारी योजना में इतनी तेज प्रगति आमतौर पर नहीं होती। उत्तराखंड में यह संभव कैसे हुआ? पहली वजह है भौगोलिक अनुकूलता। उत्तराखंड के अधिकांश हिस्सों में वर्ष भर धूप की प्रचुरता रहती है। विशेषकर मध्य हिमालय के ढलानों पर, जहां न तो मैदानी इलाकों की तरह घना कोहरा होता है और न ही ऊंचाई पर बर्फ की निरंतर चादर। यह बेल्ट सौर ऊर्जा उत्पादन के लिए आदर्श है। दूसरी वजह है बिजली की जरूरत और लागत। पहाड़ी क्षेत्रों में बिजली की आपूर्ति अनियमित होती है। वोल्टेज उतार-चढ़ाव, बार-बार कटौती और मानसून में लंबे समय तक बिजली गुल रहना कृ ये समस्याएं उपभोक्ताओं को सोलर ऊर्जा की ओर धकेलती हैं। जब केंद्र सरकार की योजना में अच्छी सब्सिडी मिली और बैंकों से सरल कर्ज की सुविधा मिली, तो लोगों ने तेजी से रुचि दिखाई।
तीसरी वजह है उरेडा की जमीनी सक्रियता। उत्तराखंड अक्षय ऊर्जा विकास एजेंसी ने दूरस्थ और पर्वतीय क्षेत्रों तक पहुंचकर सोलर ऊर्जा को जन-जन से जोड़ा। जिला स्तर पर शिविर लगाए गए, लोगों को योजना की जानकारी दी गई और आवेदन प्रक्रिया को सरल बनाया गया। चौथी वजह है मुख्यमंत्री सौर स्वरोजगार योजना की पूरक भूमिका। इस योजना के माध्यम से राज्य के युवाओं और उद्यमियों को छोटे सोलर प्लांट लगाने के अवसर दिए गए, जिससे न केवल सोलर क्षमता बढ़ी बल्कि रोजगार भी सृजित हुए।

राष्ट्रीय तुलनाः 26 राज्यों से आगे क्यों है उत्तराखंड
रूफटाप सोलर कनेक्शन के मामले में उत्तराखंड के आंकड़े देखें और उनकी तुलना अन्य राज्यों से करें, तो एक रोचक तस्वीर सामने आती हैः तमिलनाडु, हरियाणा, कर्नाटक, बिहार, पंजाब ये सभी उत्तराखंड से बड़ी आबादी वाले राज्य हैं। दिल्ली जैसा देश का सबसे विकसित शहरी क्षेत्र उत्तराखंड से कहीं पीछे है। हिमाचल प्रदेश, जो भौगोलिक और जलवायु दृष्टि से उत्तराखंड जैसा ही है, के मुकाबले उत्तराखंड दस गुना से भी अधिक आगे है। यह तुलना यह भी बताती है कि कर्नाटक, जो देश का प्रमुख आईटी और औद्योगिक राज्य है और जहां सौर ऊर्जा का परंपरागत रूप से बड़ा बाजार रहा है, वहाँ भी उत्तराखंड ने बाजी मार ली है। बिहार और पंजाब जैसे कृषि प्रधान राज्य, जहां ग्रामीण आबादी अधिक है और जहां सोलर की संभावना अत्यधिक है, वे भी उत्तराखंड से पीछे हैं। यह उपलब्धि इसलिए और भी उल्लेखनीय है क्योंकि उत्तराखंड की कुल आबादी लगभग एक करोड़ पच्चीस लाख है कृ जो इन सभी बड़े राज्यों से बहुत कम है। प्रति व्यक्ति रूफटाप सोलर कनेक्शन के मामले में उत्तराखंड और भी ऊंचे पायदान पर होगा।
एक गीगावाट का कीर्तिमानः ऊर्जा आत्मनिर्भरता की नींव
रूफटाप सोलर की सफलता के साथ-साथ उत्तराखंड ने एक और ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की है राज्य की कुल स्थापित सौर ऊर्जा क्षमता 1 गीगावाट (1000 मेगावाट) के पार पहुंच गई है। वर्तमान में यह क्षमता 1027.87 मेगावाट है। यह एक प्रतीकात्मक पड़ाव है जो बताता है कि उत्तराखंड सौर ऊर्जा उत्पादन में एक परिपक्व खिलाड़ी बन चुका है। उत्तराखंड की सौर ऊर्जा की कहानी में मुख्यमंत्री सौर स्वरोजगार योजना का एक विशेष अध्याय है। इस योजना के माध्यम से राज्य ने एक अनोखा प्रयोग किया कृ सोलर ऊर्जा को रोजगार सृजन का माध्यम बना दिया। योजना के तहत बेरोजगार युवाओं, किसानों और उद्यमियों को छोटे-छोटे सोलर प्लांट लगाने के लिए सरल ऋण और सब्सिडी दी जाती है। ये लोग अपनी जमीन पर या लीज पर ली गई जमीन पर सोलर प्लांट लगाते हैं और उत्पादित बिजली को सरकार को बेचते हैं। इससे उनकी नियमित आय होती है।

अब तक इस योजना के तहत 137 मेगावाट की सोलर क्षमता स्थापित हो चुकी है और पाइपलाइन में 100 मेगावाट से अधिक के और संयंत्र स्थापना की प्रक्रिया में हैं। यह योजना उस युवा के लिए विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है जो पहाड़ छोड़कर शहर जाने की सोच रहा था। अपने गांव में, अपनी जमीन पर, सोलर प्लांट लगाकर वह मासिक आय कमा सकता है कृ यह पलायन रोकने का एक अनूठा उपाय भी है। उत्तराखंड के पर्वतीय जिलों में जहां खेती की जमीन कम है, वहाँ पड़ी बंजर और बेकार जमीन पर सोलर प्लांट लगाना एक व्यावहारिक समाधान है। एक किलोवाट के सोलर प्लांट के लिए मात्र 5-6 वर्गमीटर जमीन की जरूरत होती है। पहाड़ी ढलानों पर भी उचित तकनीक से सोलर पैनल लगाए जा सकते हैं।
2027 तक 2500 मेगावाट का लक्ष्यः क्या यह संभव है?
उत्तराखंड सरकार ने 2027 तक सौर ऊर्जा क्षमता को 2.5 गीगावाट (2500 मेगावाट) तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा है। वर्तमान में क्षमता 1027.87 मेगावाट है। इसका अर्थ है कि अगले दो साल में करीब डेढ़ गीगावाट की और क्षमता जोड़नी होगी कृ यानी अभी तक की पूरी क्षमता से डेढ़ गुना अधिक। यह लक्ष्य महत्त्वाकांक्षी है, लेकिन असंभव नहीं। पाइपलाइन में कई परियोजनाएं पहले से चल रही हैं। मुख्यमंत्री सौर स्वरोजगार योजना के तहत 100 मेगावाट से अधिक क्षमता स्थापना की प्रक्रिया में है। कैप्टिव सोलर पावर प्लांट के 30 मेगावाट और सरकारी भवनों पर 13.5 मेगावाट के नए संयंत्र स्थापित किए जा रहे हैं। इसके अलावा ग्राउंड माउंटेड परियोजनाओं के लिए नई निविदाएं जारी होनी हैं।
रूफटाप सोलर के क्षेत्र में भी विकास की गति जारी है। पीएम सूर्यघर योजना के लक्ष्य अभी पूरे नहीं हुए हैं और लाखों और परिवार योजना का लाभ लेने के लिए आवेदन कर सकते हैं। हालांकि इस लक्ष्य को हासिल करने में कुछ चुनौतियां भी हैं। बड़े ग्राउंड माउंटेड सोलर पार्क के लिए बड़ी जमीन की जरूरत होती है। पर्वतीय राज्य में समतल जमीन की उपलब्धता सीमित है। भूमि अधिग्रहण जटिल और समय लेने वाली प्रक्रिया है। पर्यावरणीय अनुमतियां और वन विभाग की मंजूरियां भी देरी का कारण बन सकती हैं। इन चुनौतियों से पार पाने के लिए सरकार को अपने नीतिगत ढांचे को और अधिक सुगम बनाना होगा।
42.28 लाख टन कार्बनः उत्तराखंड की हरित विरासत
सौर ऊर्जा की यह कहानी सिर्फ बिजली उत्पादन और आर्थिक बचत की नहीं है। इसका एक गहरा पर्यावरणीय आयाम भी है। नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय के अनुसार देशभर में एक करोड़ घरों में रूफटाप सोलर लगने से 1000 बिलियन यूनिट हरित बिजली पैदा होगी और आने वाले 25 वर्षों में लगभग 720 मिलियन टन कार्बन डाइ ऑक्साइड का उत्सर्जन कम होगा। इस अनुपात में गणना करें तो उत्तराखंड में अब तक लगे 63,241 रूफटाप सोलर सिस्टम के कारण अगले 25 वर्षों में लगभग 42.28 लाख टन कार्बन डाइ ऑक्साइड का उत्सर्जन कम होने का अनुमान है। यह एक विशाल संख्या है। इसे समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि एक पेड़ अपने जीवनकाल में लगभग एक टन कार्बन डाइ ऑक्साइड अवशोषित करता है। तो उत्तराखंड के रूफटाप सोलर सिस्टम का पर्यावरणीय प्रभाव 42 लाख से अधिक पेड़ लगाने के बराबर है।
उत्तराखंड के लिए यह विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है। हिमालय की यह भूमि पहले से ही पर्यावरण संरक्षण का केंद्र है। यहाँ के जंगल, नदियां और ग्लेशियर न केवल राज्य के बल्कि पूरे उत्तर भारत के पर्यावरण संतुलन के लिए अनिवार्य हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण हिमालय के ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं, मानसून की अनियमितता बढ़ रही है और आपदाओं की आवृत्ति भी बढ़ रही है। ऐसे में सौर ऊर्जा की ओर यह कदम न केवल आर्थिक बल्कि पर्यावरणीय दृष्टि से भी अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।

जब उत्तराखंड का कोई परिवार अपने घर की छत पर सोलर पैनल लगाता है, तो वह सिर्फ बिजली का बिल बचा नहीं रहा कृ वह उस हिमालय की रक्षा में भी अपना योगदान दे रहा है जो उसकी पहचान और जीवन दोनों का आधार है।
जलविद्युत से सौर ऊर्जा तकः उत्तराखंड की ऊर्जा यात्रा
उत्तराखंड की पहचान परंपरागत रूप से जलविद्युत परियोजनाओं से रही है। टिहरी बांध, विष्णुप्रयाग, मनेरी भाली इन नामों से ही राज्य की ऊर्जा पहचान बनती थी। राज्य की कुल विद्युत उत्पादन क्षमता में जल विद्युत का बड़ा हिस्सा है। लेकिन जलविद्युत परियोजनाओं की अपनी सीमाएं हैं। मानसून की अनिश्चितता, सूखे की स्थिति में उत्पादन में गिरावट, पर्यावरणीय और सामाजिक विवाद, भूस्खलन का खतरा और लंबी निर्माण समयसीमा कृ ये सब जलविद्युत की राह में बाधाएं हैं। इसीलिए सौर ऊर्जा एक पूरक और अनिवार्य विकल्प के रूप में उभरी है। सौर ऊर्जा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह मांग के अनुरूप, विकेंद्रीकृत तरीके से उत्पादित की जा सकती है। एक बड़े बांध के लिए हजारों करोड़ का निवेश और दशकों का समय चाहिए। लेकिन एक किलोवाट का रूफटाप सोलर सिस्टम चंद दिनों में लग जाता है। इसीलिए सौर ऊर्जा का विस्तार तेजी से हो सकता है और हो भी रहा है। उत्तराखंड का यह रूपांतरण जलविद्युत के गढ़ से सौर ऊर्जा के अग्रणी राज्य तक ऊर्जा क्षेत्र में एक बड़े बदलाव का प्रतीक है। यह बदलाव न केवल तकनीकी है बल्कि सामाजिक और आर्थिक भी है।
पहाड़ी परिवारों की जिंदगी में बदलाव
सरकारी आंकड़े और राष्ट्रीय तुलनाएं बड़ी और प्रभावशाली लगती हैं। लेकिन किसी योजना की असली सफलता तब मानी जाती है जब वह आम आदमी की रोजमर्रा की जिंदगी बदलती है। उत्तराखंड के पहाड़ी गांवों में रूफटाप सोलर के आने से एक छोटी लेकिन गहरी क्रांति आई है। किसान परिवार जो पहले बिजली बिल के बोझ तले दबे थे, अब मुफ्त बिजली का उपयोग कर रहे हैं। जिन घरों में बिजली कटौती के कारण बच्चे अंधेरे में पढ़ते थे, वहाँ अब सोलर से रात भर रोशनी रहती है। जो दुकानदार अनिश्चित बिजली के कारण अपने व्यापार में नुकसान उठाते थे, उन्हें अब निरंतर बिजली मिल रही है। एक और महत्त्वपूर्ण बदलाव है नेट मीटरिंग की सुविधा से जब सोलर सिस्टम जरूरत से अधिक बिजली बनाता है, तो वह अतिरिक्त बिजली ग्रिड में जाती है और परिवार को उसका पैसा मिलता है। यानी घर की छत न केवल बिजली का बिल बचाती है बल्कि आमदनी का जरिया भी बनती है। पर्यटन क्षेत्र के लिए भी यह बड़ा वरदान साबित हुआ है। होमस्टे और छोटे होटल जो पहले डीजल जेनरेटर पर निर्भर थे, अब सोलर से चल रहे हैं। इससे उनकी लागत कम हुई है और पर्यावरणीय प्रदूषण भी घटा है। पर्यटक भी ऐसे ईको-फ्रेंडली आवास को प्राथमिकता देते हैं।

उरेडा की भूमिकाः परदे के पीछे का नायक
उत्तराखंड की इस सौर सफलता में उत्तराखंड अक्षय ऊर्जा विकास एजेंसी (उरेडा) की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यह एजेंसी परदे के पीछे से काम करती है, लेकिन इसके बिना यह सफलता संभव नहीं थी। उरेडा ने कई मोर्चों पर एक साथ काम किया। जागरूकता के लिए जिला-जिला, ब्लॉक-ब्लॉक में शिविर लगाए। तकनीकी सहायता के लिए प्रशिक्षित इंजीनियरों की टीम तैयार की। आवेदन प्रक्रिया को डिजिटल बनाया ताकि दूरदराज के लोग भी आसानी से आवेदन कर सकें। सोलर इंस्टालर और वेंडर के लिए गुणवत्ता मानक तय किए ताकि लोगों को घटिया उत्पाद न मिले। उरेडा ने यह भी सुनिश्चित किया कि सब्सिडी का भुगतान समय पर हो। कई राज्यों में सब्सिडी में देरी के कारण सोलर की प्रगति धीमी रही। लेकिन उत्तराखंड में इस बाधा को दूर रखा गया। दूरस्थ पर्वतीय क्षेत्रों में सोलर ऊर्जा पहुंचाना एक अलग किस्म की चुनौती है। जहां सड़क नहीं है, वहाँ भारी-भरकम सोलर पैनल कैसे पहुंचाए जाएं? ऐसे स्थानों के लिए उरेडा ने हल्के और पोर्टेबल सोलर समाधान प्रोत्साहित किए। यह काम आसान नहीं था, लेकिन इसीलिए यह उपलब्धि अधिक मूल्यवान है।
योजना के प्रमुख लाभः एक समग्र दृष्टि
पीएम सूर्यघर योजना और उत्तराखंड की सौर नीति के परिणामों को समग्र दृष्टि से देखा जाए तो लाभों की एक विस्तृत श्रृंखला नजर आती है। परिवारों के लिए मुफ्त और सस्ती बिजली की उपलब्धता तो है ही कृ साथ ही सरकार पर बिजली सब्सिडी का बोझ भी कम होता है। जब घर सौर ऊर्जा से बिजली बनाते हैं तो सरकार को उन्हें बाजार मूल्य से कम दर पर बिजली नहीं देनी पड़ती। इससे राज्य की विद्युत वितरण कंपनियों पर वित्तीय दबाव घटता है। जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम होना भी एक बड़ा लाभ है। भारत अभी भी बिजली उत्पादन के लिए काफी हद तक कोयले पर निर्भर है। हर यूनिट सोलर बिजली कोयले की उस यूनिट की जगह लेती है जो अन्यथा जलाई जाती। इस प्रकार उत्तराखंड का सोलर विस्तार देश के कार्बन उत्सर्जन को कम करने में प्रत्यक्ष योगदान दे रहा है। स्थानीय रोजगार सृजन भी एक अनदेखा लाभ है। सोलर पैनल लगाने, उनकी सर्विसिंग करने, इंवर्टर और बैटरी की मरम्मत करने कृ इन सब कामों में स्थानीय युवाओं को रोजगार मिलता है। उत्तराखंड में जहां बेरोजगारी और पलायन बड़ी समस्याएं हैं, वहाँ सौर उद्योग एक नया रोजगार क्षेत्र बन रहा है।

चुनौतियां जो अभी भी बाकी हैं
इस सफलता की कहानी को पूरी तरह समझने के लिए उन चुनौतियों को भी देखना जरूरी है जो अभी भी बनी हुई हैं। पहली चुनौती है ग्रिड एकीकरण की। जब बड़ी मात्रा में सोलर बिजली ग्रिड में आती है, तो वितरण तंत्र को उसे संभालने के लिए अपग्रेड करना पड़ता है। उत्तराखंड के पुराने और जर्जर बिजली वितरण नेटवर्क में यह एक बड़ी तकनीकी और वित्तीय चुनौती है। सरकार को इस दिशा में निवेश करना होगा। दूसरी चुनौती है सोलर उपकरणों की गुणवत्ता की। बाजार में कई स्तर के उत्पाद उपलब्ध हैं। कुछ स्थानों पर घटिया पैनल और इनवर्टर लगाए जाने की शिकायतें भी आई हैं। यदि लोगों के सोलर सिस्टम जल्दी खराब होने लगें तो योजना की साख पर असर पड़ेगा। इसलिए गुणवत्ता नियंत्रण और उपभोक्ता शिक्षा अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। तीसरी चुनौती है दुर्गम क्षेत्रों तक पहुंच की। अब तक की अधिकांश सफलता अपेक्षाकृत सुगम क्षेत्रों में मिली है। सड़क से वंचित गांवों, ऊंचाई पर बसी बस्तियों और दूरदराज के इलाकों तक सोलर की पहुंच अभी भी सीमित है। इन क्षेत्रों में सोलर पहुंचाना ही सबसे बड़ी जरूरत और सबसे बड़ी चुनौती दोनों है। चौथी चुनौती है बैटरी स्टोरेज की। सोलर बिजली दिन में बनती है लेकिन रात में जरूरत अधिक होती है। उचित बैटरी स्टोरेज के बिना सोलर सिस्टम की उपयोगिता सीमित है। बैटरियां महंगी हैं और उनकी आयु सीमित है। यह आर्थिक बाधा गरीब परिवारों के लिए विशेष रूप से बड़ी है।

नवाचार के नए रास्तेः आगे क्या होगा
उत्तराखंड की सौर यात्रा अभी खत्म नहीं हुई कृ बल्कि यह कहें कि अभी शुरू हुई है। आगे के रास्ते पर कई नए अवसर और संभावनाएं दिख रही हैं। कृषि-सौर (एग्रो-सोलर) एक ऐसा क्षेत्र है जिसमें उत्तराखंड को अभी तक पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया है। सोलर पैनलों के नीचे खेती करना संभव है पैनल छाया देते हैं जो कुछ फसलों के लिए फायदेमंद होती है और मिट्टी की नमी बनाए रखने में भी मदद करती है। उत्तराखंड के खेतों में इस मॉडल को अपनाया जाए तो किसान की आमदनी दोगुनी हो सकती है। सौर ऊर्जा से चलने वाले पंप (सोलर पंप) पहाड़ी खेती के लिए क्रांतिकारी साबित हो सकते हैं। पहाड़ में सिंचाई की समस्या पुरानी है। बिजली की अनिश्चितता के कारण इलेक्ट्रिक पंप भरोसेमंद नहीं रहते। सोलर पंप इस समस्या का स्थायी समाधान है। ग्रीन हाइड्रोजन एक भविष्य की संभावना है। जब सौर ऊर्जा अधिशेष हो तो उससे पानी को विद्युत अपघटन द्वारा हाइड्रोजन और ऑक्सीजन में तोड़ा जा सकता है। यह हाइड्रोजन एक स्वच्छ ईंधन है जिसका उपयोग वाहनों से लेकर उद्योगों तक में हो सकता है। उत्तराखंड में जब सौर क्षमता 2.5 गीगावाट तक पहुंचेगी, तो ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन एक व्यावसायिक विकल्प बन सकता है।
सौर ऊर्जा और स्मार्ट गांवः एक दृष्टिकोण
उत्तराखंड में सौर ऊर्जा का विस्तार सिर्फ बिजली उत्पादन का मामला नहीं है कृ यह एक समग्र ग्रामीण विकास के अवसर के रूप में देखा जाना चाहिए। कल्पना करें एक ऐसे पहाड़ी गांव की जहां हर घर की छत पर सोलर पैनल हों, जहां गांव का जल स्रोत सोलर पंप से भरता हो, जहां स्कूल और स्वास्थ्य केंद्र सोलर से रोशन हों, जहां सड़क किनारे सोलर स्ट्रीट लाइट हों और जहां किसान के खेत में सोलर फेंसिंग जंगली जानवरों से फसल बचाती हो। ऐसा गांव न केवल ऊर्जा में आत्मनिर्भर होगा बल्कि आकर्षक भी होगा रहने के लिए, काम करने के लिए और पर्यटन के लिए भी। यह वह गांव होगा जहां से पलायन करने की जरूरत नहीं पड़ेगी।
उत्तराखंड सरकार को सौर ऊर्जा को इस व्यापक ग्रामीण विकास दृष्टिकोण के साथ जोड़ना होगा। अलग-अलग योजनाओं के बजाय एक समन्वित ’सोलर विलेज’ अभियान चलाया जाए जिसमें एक पूरे गांव को एक साथ सोलर आत्मनिर्भर बनाया जाए। इससे पैमाने की अर्थव्यवस्था भी काम करेगी और समुदाय में सामूहिक स्वामित्व की भावना भी बनेगी।
निवेश की संभावनाएंः उत्तराखंड का उभरता सौर बाजार
उत्तराखंड की सौर उपलब्धियों ने देश और दुनिया के निवेशकों का ध्यान खींचा है। जब एक राज्य में सौर ऊर्जा क्षमता 1 गीगावाट पार करती है, तो यह संदेश जाता है कि यहाँ का नीतिगत माहौल अनुकूल है, तकनीकी क्षमता है और बाजार उपलब्ध है। निजी निवेशकों के लिए उत्तराखंड में कई अवसर हैं। बड़े सोलर पार्क के लिए तराई क्षेत्र में जमीन उपलब्ध है। उद्योगों के लिए कैप्टिव सोलर प्लांट की मांग बढ़ रही है। होटल और रिसोर्ट उद्योग के लिए सोलर एक लागत-कटौती का साधन है। और पूरे राज्य में रूफटाप सोलर के लिए अभी भी बड़ी संभावनाएं हैं। सरकार ने इस निवेश को आकर्षित करने के लिए नीतिगत प्रोत्साहन दिए हैं कृ सिंगल विंडो क्लियरेंस, बैंकों से सुलभ ऋण, सब्सिडी और कर लाभ। आगे यदि ग्रिड अपग्रेडेशन और बैटरी स्टोरेज नीति भी बने, तो निवेश का प्रवाह और तेज होगा।

उत्तराखंड की सौर ऊर्जा की यह कहानी कई स्तरों पर पढ़ी जा सकती है। एक स्तर पर यह तकनीकी प्रगति की कहानी है मेगावाट बढ़ रहे हैं, कनेक्शन बढ़ रहे हैं, क्षमता बढ़ रही है। दूसरे स्तर पर यह नीतिगत सफलता की कहानी है कृ जब सही योजना, सही एजेंसी और सही प्रोत्साहन मिलते हैं तो नतीजे तेज आते हैं। तीसरे स्तर पर यह सामाजिक-आर्थिक बदलाव की कहानी है कृ परिवारों की बचत, युवाओं को रोजगार और गांवों की आत्मनिर्भरता। लेकिन शायद सबसे गहरे स्तर पर यह पर्यावरण और विकास के उस पुराने विरोधाभास को तोड़ने की कहानी है जो कहता था कि विकास करना होगा तो पर्यावरण की कीमत चुकानी पड़ेगी। उत्तराखंड यह साबित कर रहा है कि सौर ऊर्जा के माध्यम से विकास और पर्यावरण संरक्षण साथ-साथ चल सकते हैं बल्कि एक-दूसरे को मजबूत करते हुए।
26 राज्यों को पीछे छोड़ना, एक गीगावाट पार करना और 63 हजार से अधिक घरों में सौर उजाला पहुंचाना कृ ये संख्याएं बड़ी हैं। लेकिन इससे भी बड़ी बात यह है कि जब उत्तरकाशी के किसी गांव में रात को बच्चा सोलर की रोशनी में पढ़ता है, जब चमोली के किसी घर में बिजली का बिल शून्य आता है, जब पिथौरागढ़ का कोई युवा अपने सोलर प्लांट से मासिक आय कमाता है तो असली सफलता वहीं है। पहाड़ पर सूरज जल्दी उगता है। उत्तराखंड ने इस सूरज की ताकत को पहचाना है। अब बस यह सुनिश्चित करना है कि यह ताकत हर घर, हर गांव और हर परिवार तक पहुंचे तब उत्तराखंड की सौर क्रांति सच्चे अर्थों में पूरी होगी।





