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ईरानी बंदरगाहों की अमेरिकी नाकेबंदी से बढ़ा वैश्विक तनाव, होर्मुज के बाद मलक्का पर फोकस से बदल सकती है ताकत का संतुलन

अप्रैल के दूसरे सप्ताह में अमेरिका ने ईरान के बंदरगाहों पर नौसैनिक नाकेबंदी लागू कर वैश्विक स्तर पर हलचल तेज कर दी है। यह कदम तब उठाया गया जब पाकिस्तान में हुई अमेरिका-ईरान शांति वार्ता विफल हो गई। इसके बाद अमेरिकी सेंट्रल कमांड ने 13 अप्रैल से ईरानी बंदरगाहों में आने-जाने वाले जहाजों को रोकने का ऐलान किया। हालांकि सऊदी अरब, यूएई और कतर जैसे गैर-ईरानी बंदरगाहों से जुड़े जहाजों को आवाजाही की छूट दी गई है। इस पूरे घटनाक्रम के बीच अब अमेरिका का ध्यान होर्मुज के बाद मलक्का जलडमरूमध्य की ओर भी बढ़ता दिख रहा है।

नाकेबंदी का मकसद: ईरान की आर्थिक कमर तोड़ना
अमेरिकी प्रशासन का मुख्य उद्देश्य ईरान की अर्थव्यवस्था पर सीधा दबाव बनाना है। ईरान की आय का बड़ा हिस्सा तेल निर्यात से आता है, जो उसकी जीडीपी का करीब 13% माना जाता है। हालिया संघर्ष के दौरान ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित कर जहाजों से टोल वसूली शुरू कर दी थी, जिससे वैश्विक तेल आपूर्ति में लगभग 20% तक की कमी आई। अमेरिका का आरोप है कि ईरान इस रणनीति के जरिए दुनिया पर दबाव बना रहा है। ऐसे में बंदरगाहों की नाकेबंदी कर उसके रोजाना 1.5 से 2 मिलियन बैरल तेल निर्यात को रोकने की कोशिश की जा रही है, ताकि उसकी वित्तीय क्षमता कमजोर हो।

चीन पर सीधा असर, ऊर्जा संकट की आशंका
इस कदम का सबसे बड़ा असर चीन पर पड़ सकता है, जो ईरान के तेल का सबसे बड़ा खरीदार है और करीब 90% निर्यात वहीं जाता है। अमेरिकी रणनीति का एक बड़ा हिस्सा यह भी है कि चीन तक ईरानी तेल की आपूर्ति पूरी तरह रोकी जाए। ऐसे में चीन के सामने ऊर्जा संकट की स्थिति पैदा हो सकती है। हालांकि रूस ने संकेत दिए हैं कि वह चीन की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में मदद कर सकता है, जिससे वैश्विक समीकरण और जटिल हो सकते हैं।

होर्मुज जलडमरूमध्य: वैश्विक तेल सप्लाई की धुरी
होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया का सबसे अहम समुद्री ‘चोक पॉइंट’ माना जाता है, जो फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ता है। सामान्य परिस्थितियों में यहां से रोजाना 20 से 21 मिलियन बैरल कच्चा तेल और पेट्रोलियम उत्पाद गुजरते हैं, जो वैश्विक तेल व्यापार का लगभग 20% है। इसके अलावा बड़ी मात्रा में एलएनजी की आपूर्ति भी इसी रास्ते से होती है। एशियाई देशों—खासतौर पर भारत, चीन, जापान और दक्षिण कोरिया—की ऊर्जा जरूरतें काफी हद तक इसी मार्ग पर निर्भर हैं। ऐसे में यहां किसी भी तरह की रुकावट वैश्विक सप्लाई चेन को गहरा झटका दे सकती है।

भारत और दुनिया पर संभावित असर
भारत, जो दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक है, अपनी जरूरत का 85% से अधिक कच्चा तेल आयात करता है। हाल ही में भारत ने ईरान से सीमित मात्रा में तेल आयात फिर शुरू किया था, लेकिन मौजूदा स्थिति में इसका सीधा असर सीमित रह सकता है।
हालांकि अप्रत्यक्ष प्रभाव गंभीर हो सकता है, क्योंकि भारत का करीब 70% कच्चा तेल, 90% एलपीजी और लगभग 20% एलएनजी होर्मुज के रास्ते आता है। यदि नाकेबंदी और तनाव बढ़ता है, तो आपूर्ति बाधित हो सकती है। इससे पेट्रोल-डीजल, गैस सिलेंडर और परिवहन महंगा होगा, महंगाई बढ़ेगी और औद्योगिक उत्पादन पर भी असर पड़ेगा। अनुमान है कि यदि स्थिति और बिगड़ी तो कच्चे तेल की कीमतें 130 डॉलर प्रति बैरल या उससे ऊपर जा सकती हैं।

मलक्का जलडमरूमध्य पर बढ़ती अमेरिकी नजर
होर्मुज में बढ़ते तनाव के बीच अब अमेरिका का फोकस मलक्का जलडमरूमध्य पर भी बढ़ गया है। दक्षिण-पूर्व एशिया में स्थित यह संकरा समुद्री मार्ग मलेशिया और इंडोनेशिया के बीच है और सिंगापुर के पास से गुजरता है। यह हिंद महासागर को दक्षिण चीन सागर से जोड़ता है और दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री मार्गों में शामिल है।
यहां से हर साल 80 हजार से अधिक जहाज गुजरते हैं और वैश्विक व्यापार का करीब 40% इसी रास्ते से होता है। दुनिया का 25 से 30% तेल और बड़ी मात्रा में एलएनजी भी इसी मार्ग से गुजरता है। चीन, जापान, दक्षिण कोरिया और भारत जैसे देशों के लिए यह जीवनरेखा जैसा है।

रणनीतिक दबाव और इंडो-पैसिफिक समीकरण
मलक्का जलडमरूमध्य को लेकर अमेरिका की सक्रियता उसके व्यापक रणनीतिक लक्ष्य से जुड़ी है। हाल ही में इंडोनेशिया के साथ रक्षा समझौते के बाद अमेरिका को इस क्षेत्र में निगरानी क्षमता बढ़ाने का अवसर मिला है। इससे वह इस महत्वपूर्ण मार्ग पर 24 घंटे नजर रख सकता है।
अमेरिका का उद्देश्य एक ओर चीन की आपूर्ति श्रृंखला पर दबाव बनाए रखना है, तो दूसरी ओर इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में समुद्री मार्गों को खुला और सुरक्षित रखना भी है। इस रणनीति के तहत अमेरिकी युद्धपोत लगातार इस मार्ग से आवाजाही कर रहे हैं।

भारत के लिए भी रणनीतिक रूप से अहम क्षेत्र
मलक्का जलडमरूमध्य भारत के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि अंडमान-निकोबार द्वीप समूह इसके पश्चिमी छोर के पास स्थित है। ऐसे में इस क्षेत्र में बढ़ती गतिविधियां भारत की सुरक्षा और रणनीतिक नीतियों पर भी सीधा असर डाल सकती हैं।

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